अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-२८ १२९ इसी बीच कृष्णकुल (ब्रज में) अन्तराल हुआ। यादवजनों में विछोह शुरू हुआ। वहाँ कपट की चिता की ज्वाला प्रज्वलित हुई जिसको विद्वानों ने दैव (दैवक्लेश) नाम से कहा है।¹ उस क्षेत्र में काल का प्रतिज्ञान रखने वाला (कालयवन) महारथी चढ़ आया (?)। शेषाश्च विनिवर्तन्ते जरासन्धभयार्दिताः ॥ 17 ॥ ये देवगिरिमाश्चित्य सौराष्ट्रदेशवासिनः । वारुण्यां च दिशायां च प्रभासक्षेत्रमागताः ॥ 18 ॥ (वहाँ से) शेष सभी जन जरासन्ध के भय से दुखी होकर लौट गए जो देवगिरि होते हुए सौराष्ट्र के निवासी हुए और पश्चिम दिशा में प्रभास क्षेत्र तक पहुँचे।² समुद्राभ्यर्थनं कृत्वा कृष्णो वा बलदेवकः । सद्यो (द्रो ?) गेन्द्र भूमिसैना स्थितावुभौ दन्तकाष्ठादिभिः ॥ 19 ॥ वरुणेषु यत्र द्वारं चतुर्विंशति²⁴ योजनैः । वहाँ श्रीकृष्ण और बलदेव ने समुद्र की पूजा की। दोनों ने अपनी पैदल सेना व गजों को ध्यान पूर्वक देखा अर्थात् सेना का निरीक्षण किया। वरुण या पश्चिम दिशा में जहाँ द्वार (समुद्र के बाद देश का द्वार होने से द्वारका की पहचान, समुद्र-द्वार) था, भूमि चौबीस योजन विस्तार था। शक्रेण प्रेषितास्तत्र निधयो धनदेव च ॥ 20 ॥ तेभ्यः समुद्भवा सृष्टिः काञ्चनै रत्नसञ्चितैः । दिनानां त्वेकविंशत्या²¹ ³सम्भवाः कुलयादवाः ॥ 21 ॥
- हरिवंश में यवनाधिपति के लिए 'दैवादपुत्रः' शब्द का प्रयोग हुआ है जो देवयोग से पुत्र विहीन था और पुत्र की कामना रखता था। (हरिवंश विष्णुपर्व 57, 12) महारथी कालयवन गोपाली नामक अप्सरा से तपस्वी गार्ग्यमुनि के द्वारा नियोग से उत्पन्न हुआ— मानुष्यां गार्ग्यभार्यायां नियोगाच्छूलपाणिना । स कालयवनो नाम जज्ञे शूरो महाबलः ॥ (तत्रैव 57, 15) कृष्ण ने मथुरा में वैर का अन्त कर डालने की इच्छा से द्वारकापुरी बसाकर वृष्णिवंशियों को आश्वासन दिया था— वैरस्यान्तं विधित्संस्तु वासुदेवो महायशाः । निवेश्य द्वारकां राजन् वृष्णीनाभास्य चैव ह ॥ (तत्रैव 57, 39)
- हरिवंश आदि में लोगों के उत्तर क्षेत्र से पलायन कर पश्चिम दिशावर्ती क्षेत्रों में जाकर बसने का वर्णन मिलता है। 'अन्तर्गिरिद्रोणी' सङ्केत पर विद्वानों ने विचार करते हुए कहा है कि लोग देश की सीमाओं पर स्थित पहाड़ी प्रदेशों की घाटियों की ओर पलायन करेंगे। लोग वनाञ्चलों, राजस्थान की लूणी नदी के तटवर्ती क्षेत्रों और हिमालय के पार्श्व में जाकर म्लेच्छों के साथ बस जाएँगे—कृत्स्नं वा हिमवत्पार्श्वे कूलं च लवणाम्भसः । अरण्येषु च वत्स्यन्ति नराः म्लेच्छगणैः सह ॥ (हरिवंशपुराण भविष्यपर्व 3, 4, 32)
- 'सम्बद्धाः कुलयादवाः ?' इति प्रकाशित पाठः । विशेष— महाभारत के खिल हरिवंश, ब्रह्मवैवर्तपुराण में द्वारकापुरी की रचना का विशेष वर्णन मिलता है।