अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
पृष्ठ 178, कुल 535 में से
संदर्भ में पढ़ें130 अपराजितपृच्छा तत्राष्टादशकोटीनां निवासाश्च महोत्सवाः। वहाँ देवराज इन्द्र ने सहायता की और कुबेर ने निधियाँ अर्पित कीं। वहाँ भी सृष्टि से पूर्व सञ्चित रत्न और स्वर्ण सभी यादव कुलों के सामूहिक प्रयास से इक्कीस दिनों में बाहर निकला। इसी के बल पर वहाँ अठारह करोड़ निवास गृह बनाए गए और महोत्सव रखा गया। अथ द्वारकापुरीवर्णनं — सा पुरी च महारम्या हेमप्राकारसम्भवा ॥ 22 ॥ पुर-प्राकार-परिखा-प्रतोली-मार्ग-गोपुरम्। प्रासाद-प्रतिमा-सद्ममाडोत्तुङ्गमहोत्सवम् ॥ 23 ॥ उस द्वारकापुरी की बसावट बहुत रमणीक थी जिसमें स्वर्ण से निर्मित परकोटे थे। उसकी रचना में पुर, प्राकार, परिक्खा (खाई), प्रतोली (लघु द्वार), महापथ, गोपुर, प्रासाद और उनमें प्रतिमाएँ, भवन, माड बहुत उन्नत थे जिनमें महोत्सव का माहौल था। हिन्दोलकैस्तोरणैश्च रत्नैश्चैव विभूषिता। रत्नोद्योतकुलाकीर्णा हेमरौप्यादितो भवा ॥ 24 ॥ स्फटिकैर्दिव्यसोपानैस्तडागैर्विविधैस्तथा। पुष्परागेन्द्रनीलाढ्यपदकैः सूर्यरश्मिभिः ॥ 25 ॥ द्वारका नगरी को हिन्दोलों, तोरणों और नाना रत्नों से सजाया गया था जिससे असंख्य रत्नों के पुञ्ज की और सोने-चाँदी के उपकरणों की चारों ओर चमक-ही- चमक प्रसारित हो गई थी। द्वारका नगरी के तरह-तरह के जलाशयों के सोपान, स्फटिक से निर्मित बड़े दिव्य बने हुए थे जिन पर सूर्य की किरणों से पुष्पराग (पुखराज), इन्द्रनीलमणि (नीलम) आदि की शोभायुक्त छवि देखते ही बनती थी। श्वेतरक्तहरित्पीतैः प्राकारैरिन्द्रकोपमैः। अनेकोद्यानवाटीभिर्दिव्यवृक्षलतागृहैः ॥ 26 ॥ एकोद्येकविंशत्यन्तभूम्युद्भवगृहाणि च। मालमौलिशुद्धशृङ्गहर्म्याणि च तथैव च ॥ 27 ॥ श्वेत, रक्त, पीत, हरित रङ्ग के परकोटे इन्द्रधनुष की छटा बिखरते थे। द्वारकापुरी में अनेकों उद्यान, वाटिकाएँ थीं जिनमें दिव्य वृक्ष और नाना कुञ्ज बने हुए थे। द्वारकापुरी के भवन एक तल से लेकर इक्कीस तल तक के थे। इनमें माल- मौली (पङ्क्तियों की कतारों) से शुद्ध कँगूरों वाली बड़ी-बड़ी हवेलियाँ थीं।