अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
पृष्ठ 180, कुल 535 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्लक्षाणि सङ्ख्ययाता अश्वास्तेजस्विनस्तथा। रथाः सपादकोट्यश्च चोष्ट्राः सार्धत्रिकोटिकाः ॥ 34 ॥ तथाष्टादशकोट्यश्च यादवाश्च महाबलाः। सुभटाश्च महावीरा असङ्ख्ययाताः पदातयः ॥ 35 ॥ इस द्वारकापुरी में चालीस हजार महोत्कट अर्थात् महाबलवान दुर्दभ हाथी हैं और चार लाख की संख्या में बड़े तेजस्वी अश्व भी हैं। इसके अतिरिक्त सवा करोड़ रथ और साढ़े तीन करोड़ ऊँट हैं। इस नगरी के निवासी यादवगण महाबलवान हैं जिनकी संख्या अठारह करोड़ हैं, ये सब के सब वीर योद्धा हैं और उनके साथ असंख्य पैदल सैनिक भी हैं। द्वारिका या पुरी ख्याता पूज्या सुरनरोरगैः। सिद्धचारणसङ्गीता ह्याप्सरोगणसेविता ॥ 36 ॥ विद्याधरैश्च गन्धर्वैर्नागेन्द्रैश्चोपसेविता। तपोधनैश्च दिव्यैश्च ऋषिवृन्दैः समावृता ॥ 37 ॥ माया च मथुरा चैवायोध्या वाराणसी तथा। काञ्ची जयन्ती द्वारका ह्येता मुक्तिप्रदायिका ॥ 38 ॥ सुर, नर और उरग-नागों के द्वारा पूजित यह द्वारकापुरी बहुत प्रसिद्ध है। सिद्ध, चारणों द्वारा इसकी महिमा गायी गई है तथा अप्सरा व गणों के द्वारा यह सेवित है। विद्याधरों, गन्धर्वों, नागराजाओं आदि से यह उपसेवित है और यहाँ तपोधनी, दिव्य ऋषिगणों के समूहों की बहुतायत है। इसीलिए मुक्तिप्रदायिका नगरियों¹ में द्वारका भी माया, मथुरा, अयोध्या, वाराणसी, काञ्चीपुर, जयन्ती (अमरावती) इन सात पुरियों के साथ स्मरण योग्य है। जरासन्धं वधिष्यामि हेतुमात्रेण भीमतः। शिशुपालं वधिष्यामि यज्ञे धर्मसुतस्य वै ॥ 39 ॥ ततः पश्चात्करिष्यामि साहाय्यमर्जुनस्य च। विष्णोर्वाक्यसहायेन हनिष्यामि कुरून् रणे ॥ 40 ॥ (कृष्ण पुनः स्मरण कराते हैं कि) मैं भीम के बहाने से जरासन्ध को मारूँगा और शिशुपाल को धर्मराज युधिष्ठिर के यज्ञ के बहाने मारूँगा। इसके बाद, मैं अर्जुन का सहायक बनकर भगवान् विष्णु के वचनों के सहाय (श्रीमद्भगवद्गीता के
- अन्यत्र 1. अयोध्या, 2. मथुरा, 3. माया, 4. वाराणसी, 5. काञ्ची, 6. अवन्ती और 7. द्वारका- सप्तपुरियों का यह क्रम मिलता है।