अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
पृष्ठ 181, कुल 535 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-२८ 133 वचनानुसार) से अर्जुन को तैयार कर कौरवों का रणाङ्गन में संहार करूँगा। शस्त्रहस्ता मृता ये ऽत्र स्वर्गं यास्यन्ति क्षत्रियाः। कलौ च समनुप्राप्ते चतुर्थे युगपर्यये ॥ ४१ ॥ नेमिनाथाभिधानस्तु समुद्रविजयात्मजः। गिरिमस्तकसम्भूतो द्वाविंशश्च₂₂ तीर्थङ्करः ॥ ४२ ॥ (उक्त महाभारत के रण में) जो क्षत्रिय हाथ में शस्त्र लिए हुए मरेंगे, वे सीधे स्वर्ग में जाएँगे। यह सब घटना कलियुग, चतुर्थ युग आते-आते ही हो जाएगी। इसके उपरान्त मैं समुद्रविजय राजा के पुत्र के रूप में नेमिनाथ नाम धारण करके गिरिनार पर्वत के मस्तक पर बाईसवाँ तीर्थङ्कर बनकर उत्पन्न होऊँगा। पाण्डवांश्च करिष्यामि केदारे तु हिमाश्रयान्। गमयिष्यति स्वर्गे तान् केदारः प्रकटीकृतः ॥ ४३ ॥ मैं पाण्डवों को हिमालय के आश्रय में भेजकर उन्हें केदार की ओर जाने को कहूँगा और वहाँ से जब वे स्वर्ग को जाएँगे, तो केदार तीर्थ को प्रकट करूँगा। अथ केदारमाहात्म्य — पृथिव्यां यानि तीर्थानि यानि तिष्ठन्ति भूतले। केदारं प्रति गत्वा च तदनुग्रहदायकम् ॥ ४४ ॥ भारते च महापुण्यं न तीर्थं केदारात्परम्। यदिच्छन्ति नरा मोक्षमाश्रयन्तु हिमाचलम् ॥ ४५ ॥ पृथ्वी पर जितने भी तीर्थ हैं और भूतल पर जितने भी तीर्थ हैं, उन सबमें से जो भी केदार तीर्थ की ओर जाएगा, उस पर केदार का अनुग्रह दान सदा ही बरसता रहेगा। समस्त भारत में केदारसे अधिक पुण्यवान् कोई तीर्थ नहीं है। जो भी व्यक्ति मोक्ष प्राप्ति की इच्छा रखता हो, उसे हिमाचल का आश्रय लेकर केदार तीर्थ में अवश्य आना चाहिए। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां हरेरष्टमः कृष्णावतारनिर्णयाधिकारो नामाष्टाविंशं सूत्रम् ॥ २८ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में हरि का आठवाँ कृष्णावतार निर्णय अधिकार नामक अठाईसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ २८ ॥