भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 182, कुल 535 में से

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पृष्ठ 182

134 अपराजितपृच्छा विष्णोर्जन्मरहस्यदशमोऽवतारो नाम नवविंशं सूत्रम् ॥ २९॥ विश्वकर्मोवाच — कलौ युगे तु सम्प्राप्ते आश्विने कृष्णपक्षके। नवम्यां च तिथौ चैव मृगान्ते सुमुहूर्तके ॥ १ ॥ शुद्धोदनसुतो भूत्वा मोहयिष्यामि मानवम्। युगे तत्र भविष्यन्ति मुण्डाः काषायवाससः ॥ २॥ विश्वकर्मा बोले— कलियुग के आ जाने पर आश्विन मास के कृष्णपक्ष की नवमी तिथि को मृग (मृगशिरा) नक्षत्र के अन्तिम चरण व शुभ मुहूर्त में, राजा शुद्धोदन का पुत्र होकर, मैं बुद्ध का अवतार लेकर संसार के मानवों को मोहित कर लूँगा अर्थात् उनको धर्म सम्बन्धी विवेकहीन कर लूँगा।¹ तब कलियुग के ऐसे समय में काषाय गेरुए वस्त्रधारी केशमुण्डित बौद्ध संन्यासी होने लगेंगे। शूद्राः शूद्रेषु दास्यन्ति विष्णौ बुद्धत्वमागते। तेषामल्पतरो धर्म इह लोके परत्र च ॥ ३॥ दिगम्बरवृत्तिकास्तत्र बुद्धयुक्तकलौ युगे। श्वेताम्बरास्तथान्ये च तथा नीलाम्बराः क्वचित् ॥ ४॥ इस प्रकार विष्णु के बुद्धत्व अवतार लेने पर उस युग में शूद्र शूद्रों को दीक्षा देंगे जिससे उनमें धर्म अल्पतर होता जाएगा और वे इस मृत्युलोक में और परलोक

  1. इतिहास में वैशाख पूर्णिमा बुद्ध जयन्ती के रूप में मान्य है जबकि काशीनाथोपाध्याय कृत 'धर्मसिन्धु' में दशावतार जयंती निर्णय प्रकरण में आश्विन शुक्ल दशमी तिथि को सन्ध्या में बुद्धावतार होने की बात लिखी है— आश्विनशुक्लदशम्यां सायं बुद्धोऽभूत्। विष्णुपुराण में इस अवतार को मायामोह कहा गया है। मायामोह के जैन और अन्य रूप धारण करने के प्रसङ्ग में बौद्धधर्म का उल्लेख है। वह जितेन्द्रिय मायामोह रक्तवस्त्र धारण कर अन्यान्य असुरों के पास पहुँचा और उनसे मृदु, अल्प और मधुर वाणी में बोला कि हे असुरगण ! यदि तुम लोगों को स्वर्ग या मोक्ष की इच्छा है तो पशुहिंसा आदि दुष्टकर्मों का त्याग कर तुम बोध को प्राप्त करो— पुनश्च रक्ताम्बरधृङ् मायामोहो जितेन्द्रियः । अन्यानाहासुरान् गत्वा मृद्वल्पमधुराक्षरम् ॥ स्वर्गार्थं यदि वो वाञ्छा निर्वाणार्थमथासुराः । तदलं पशुघातादिदुष्टधर्मैर्निबोधत ॥ (विष्णु. 3.18.16-17) रक्ताम्बरधारी मायामोह ने कहा कि यह सम्पूर्ण जगत् विज्ञानमय है— ऐसा जानो। मेरे वाक्यों पर पूरी तरह ध्यान दो। इस प्रसङ्ग में बुधजनों का ऐसा ही कहना है कि यह संसार अनाधार है, भ्रमजन्य पदार्थों की प्रतीति पर ही स्थिर है और रागादि दोषों से दूषित है। इस संसार-सङ्कट में जीव निरन्तर भटकता रहता है। इस प्रकार बुद्ध के ज्ञानसूचक शब्द भी पुराणकार ने दिए हैं- बुध्यत (जानिये), बुध्यध्वम् (समझिये), बुध्यत (जानिये)— विज्ञानमयमेवैतदशेषमवगच्छ ॥ बुध्यध्वं मे वचः सम्यग्बुधैरैवमिहोदितम् ॥ जगदेतदनाधारं भ्रान्तिज्ञानार्थ तत्परम्। रागादि दुष्टमत्यर्थं भ्राम्यते भव सङ्कटे ॥ (तत्रैव 3. 18.18-19)