अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमें दिगम्बर वृत्तियुक्त से बुद्ध वृत्तियुक्त और अन्य श्वेताम्बर युक्त रूप में तथा कहीं- कहीं नीलाम्बर रूप में कलियुग में दिखाई देंगे। केवलिन चतुर्विंशतितीर्थङ्कराः — जिनोक्ताः केवलिनश्च चतुर्विंशतितीर्थगाः ₂₄ । अनन्तरं चर्षभाद्याश्चतुर्विंशति ₂₄ रेव च ॥ ५ ॥ हुताशनः पद्मनाभो जिनानां तु च सङ्ख्यया। उक्ताः शासनदेव्यश्च यक्षाणां च तथैव च ॥ ६ ॥ पृथगेकैकशः प्रोक्ता अष्टौ ₈ वै प्रतिहारिणः। (इनके अतिरिक्त मायामोह के रूप के ही अनुयायी ऐसे अन्य धार्मिक जन) जिन कहलाएँगे। वे केवली भी कहलाएँगे और चौबीस तीर्थङ्करों को मानने वाले होंगे। इनके ऋषभादि नाम वाले चौबीस तीर्थङ्कर हैं। उन सभी जिन तीर्थङ्करों की अपनी चौबीस संख्या के अनुसार अपने-अपने हुताशन, पद्मनाभ, शासनदेवियाँ, यक्षगण आदि कहे गए हैं। इसी प्रकार उनके एक-एक के पृथक्-पृथक् आठ- आठ प्रतिहारीगण भी होते हैं। तस्यानुयायी कथनं — वणिग्धर्मेण मुदिता ज्ञानार्णव उदाहृताः ॥ ७ ॥ तेषां न स्नानहोमानि पितृपिण्डो न दीयते। पाखण्डिनो विकर्मस्थाः पाणिपात्रेषु भक्षकाः ॥ ८ ॥ इनके अनुयायी सभी वणिक् धर्म को मानने वाले मुनियों द्वारा मात्र कथा, प्रवचन सुनने के ज्ञानसागर में उदारता से लीन रहने और प्रसन्न रहने वाले होंगे। इनके अतिरिक्त उनमें स्नान, ध्यान, होम, पिण्डदान आदि का पूर्णतः लोप हो जाएगा। वे (परम्परित) धर्म के विपरीत और विकर्म या नहीं करने योग्य कर्मों में लिप्त रहेंगे और करपात्री या हथेली में लेकर अन्नाहार करने वाले होंगे। दर्शनेऽपण्डिताश्चैव गमिष्यन्ति च नारकान्। तेषां दत्तं च भुक्तं च भस्मीभवति काष्ठवत् ॥ ९॥ स्वाध्याये चैव सीदन्ति ब्राह्मणाः शौचवर्जिताः। वेदविक्रयिणश्चैव लोभिनोऽस्थिरचेतसः ॥ १० ॥ उनके दर्शनशास्त्र का आधार नहीं, इस दृष्टि से वे अपण्डित होंगे और दुष्कर्मों से नरकगामी होंगे क्योंकि उनके द्वारा दिया गया दान और उस दान का भोग करने वाले सभी काष्ठ की राख के समान निष्फल होंगे। वे अपना प्रभाव इस कलिकाल में इतना