भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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सूत्र-३१ 149 मार्गशीर्ष मास की कृष्णपक्ष की चतुर्दशी तिथि आद्या होती है और उसके लिए त्रयोदशी को एकासन रखे तथा चतुर्दशी को उसका पारणा करें। जल से स्नान करके शिवलिङ्ग के आश्रय में रहे और दिन के अन्त में आने पर दन्तधावन करें। ततः शिवालये गत्वा पुष्पधूपादिसंयुतः। पञ्चामृतैः स्नापयित्वा धूपैर्वै लेपनादिभिः ॥ २० ॥ पूजां कृत्वा त्रिरात्र्यन्तं स्तोत्रमन्त्रकगीतकैः । वादित्रैर्विविधैश्चैव स्वेच्छया चात्मशक्तितः ॥ २१॥ स्वयंभुवि तथा बाणे घाट्ये स्वगृहलिङ्गे । यामे यामे गते रात्रौ पूजां कृत्वा महोत्सवम् ॥ २२ ॥ इसके बाद शिवालय में जाकर पुष्प, धूपादि से संयुक्त होकर, पञ्चामृत और धूप लेपनादि से स्नान कराके अपने सामर्थ्य के अनुसार पूरी श्रद्धा से तरह-तरह के स्तोत्र मन्त्र, गीत आदि वाद्यों से तीन रात्रियों के अन्त तक पूजा करके स्वयंभुवि लिङ्ग अथवा बाणलिङ्ग या फिर घड़े हुए अपने-अपने घर में पूजार्थ रखे शिवलिङ्ग की रात्रि के प्रत्येक प्रहर बीतने पर पूजा करते हुए यह महोत्सव मनाया करे। शिवरात्र्योत्सवविधिं- शिवरात्र्युत्सवे चाल्यं शिवं स्तुत्वा समस्तकम्। पुराणश्रवणं कृत्वा दानं चैव समानयेत् ॥ २३ ॥ प्रतियामोत्सवं कृत्वा स्वगृहं भावतो व्रजेत्। दन्तधावनस्नानार्चाः कृत्वा चैव महोत्सवम् ॥ २४ ॥ अग्निपूजां ततः कृत्वा दत्त्वा चाहुतिपञ्चकम्। द्वे द्वे कृत्वा मण्डले च बाह्ये मध्ये गृहेऽथवा ॥ २५ ॥ आत्मपादौ च प्रक्षाल्य तापसानां तथैव च। भुक्तिस्थानं गृहमध्ये मण्डलेषु प्रदीयते ॥ २६ ॥ शिवरात्रि के उत्सव में चलकर जाना चाहिए और शिव की स्तुति करके साष्टाङ्ग प्रणाम करें, पुराण (वायुपुराण, लिङ्गपुराण, शिवपुराणादि कथा) का श्रवण करना चाहिए। दानपुण्य भी करने चाहिए। प्रतिदिन भी अपने घर में हर प्रहर इसी

जाबालश्रुति के दस शैवव्रतों का वर्णन शिवपुराण की कोटिरुद्रसंहिता के अध्याय 37 में आया है। वहाँ पर माघ मास के कृष्णपक्ष में शिवरात्रि तिथि का विशेष महत्व बताया गया है। जिस दिन आधी रात के समय तक वह तिथि विद्यमान हो, उसी दिन उसे व्रत के लिए ग्रहण करना चाहिए। शुक्लपक्ष से मास का आरम्भ मानने से फाल्गुन मास की कृष्णपक्ष की त्रयोदशी माघ मास की कही जाती है।