अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें150 अपराजितपृच्छा भाव का आचरण करता रहे। दन्तधावन, स्नान, अर्चा-पूजादि महोत्सव करता हुआ हवन करे और पञ्चक आहुति प्रदान करें। इसके लिए घर में, घर के मध्य में अथवा घर के बाहर दो-दो मण्डल बनाए। (भोजन से पूर्व) पहले अपने पाँवों का प्रक्षालन करे। तदोपरान्त इस अवसर पर आमन्त्रित तपस्वी साधुओं के पाँवों का प्रक्षालन करके उन्हें घर मध्य में भोजनशाला में भोज-प्राङ्गण में ले जाना चाहिए। सम्प्राश्य शिवनैवेद्यं ततो दद्यातु भोजनम्। भोजनानन्तरं दद्याद् दक्षिणां वस्त्रसंयुताम् ॥ २७ ॥ यज्ञोपवीतं पट्टं च पादुकां छत्रसंयुताम्। क्षमापयेच्छिवं देवं मठं सम्प्राप्य तापसम् ॥ २८ ॥ (इसके बाद) उन तपस्वीगणों को शिव-नैवेद्य का प्रसाद प्रदान कर बाद में सन्तोषपूर्वक भोजन करवाएँ और भोजनोपरान्त उन्हें वस्त्र के साथ दक्षिणा भी प्रदान करे। यज्ञोपवीत, पट्टवस्त्र, पादुका, छाता भेंटकर भगवान् शिव से क्षमापन करते हुए उन समस्त आगन्तुक तपस्वियों को उनके मठ तक आदरपूर्वक पहुँचाने जाए। द्वादशोत्सवनामानि — एवमुक्ता कृष्णचतुर्दशी मार्गशिरादिका। मार्गादि कार्तिकान्तं च तासां नामानि द्वादश₁₂ ॥ २९ ॥ इस प्रकार से मृगशिरादिक कृष्णपक्ष की चतुर्दशी के विषय में कहा गया है। यहाँ कहे गए मार्गादि से कार्तिकान्त तक आने वाले बारहौं चतुर्दशी उत्सवों (शैवव्रतों) की नामावली इस प्रकार है— शिवा शान्ता सिद्धिदा च जया चैव मनोरमा। कान्ताह्लादा च सौम्या च शुभा स्यात्तु मणिप्रभा ॥ ३० ॥ विश्वा विश्वकृदुद्भावा चेत्थं नामानि द्वादश₁₂। मार्गादि कार्तिकान्तं च कृष्णपक्षे चतुर्दशी ॥ ३१ ॥ (1.) शिवा, (2.) शान्ता, (3.) सिद्धिदा, (4.) जया, (5.) मनोरमा, (6.) कान्ता, (7.) आह्लादा, (8.) सौम्या, (9.) शुभा, (10.) मणिप्रभा, (11.) विश्वा और (12.) विश्वकृदुद्भवा— ये मार्गादि से आरम्भ होकर कार्तिक के अन्त तक, कृष्ण पक्ष की चतुर्दशियों के नाम हैं। अथ मासानुसार चतुर्दश्यां फलञ्च — मार्गपौषयोर्मध्ये च शिवा स्वर्गादिभोगदा। पौषमाघयोर्मध्ये च शान्ता कल्याणकारिणी ॥ ३२ ॥