अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
पृष्ठ 200, कुल 535 में से
संदर्भ में पढ़ें152 अपराजितपृच्छा इन सभी चतुर्दशियों में समस्त देशों में दीपोत्सव मनाए जाते हैं जो कैलाश में, नगरों में और पृथ्वीतल पर सर्वत्र विख्यात हैं। शिवरात्रिमाहात्म्यमाह — शिवरात्रिसमं पुण्यं नास्ति यज्ञसहस्रकैः ।¹ मासे मासे कृष्णपक्षे या भवेच्चं चतुर्दशी ॥ 39 ॥ शिवरात्रिस्तु सा ज्ञेया व्रतानामुत्तमोत्तमा। शिवरात्रि के समान कोई भी पुण्य हजारों यज्ञ करने पर भी नहीं मिल सकता अतः प्रत्येक मास में जब-जब कृष्णपक्ष की चतुर्दशी हो, उसको शिवरात्रि के रूप में जाने (और व्रत करें) जो व्रतों में उत्तम व्रत है। अन्यदप्याह — त्रिरूपा कृष्णवर्णा सा देवी कल्याणवर्द्धिनी ॥ 40 ॥ ललाटे मुकुटे लिङ्गे कर्णयोः स्कन्धयोस्तथा। प्रकोष्ठे मणिबन्धे च कण्ठे ऊर्वोः स्तने तथा ॥ 41 ॥ मेखलायां कटिसूत्रं कटिमालादितस्तथा। लिङ्गाधारमयाः सर्वे ऊर्ध्वाः करपुटैः कृताः ॥ 42 ॥ तंद्रूपा शिवसामर्थ्यात् शिवरात्रिः शिवशासना। द्वादशोद्भवन्ति मर्त्ये नाम्नैवं शिवरात्रयः ॥ 43 ॥ वह देवी तीन रूपों वाली, कृष्णवर्ण की है और कल्याणवर्द्धिनी है। उसके ललाट पर, सिर, कानों, स्कन्धों, प्रकोष्ठ, मणिबन्ध, कण्ठ, वक्ष, स्तनों पर मेखलाएँ हैं। वह कटिसूत्र व कटिमालादि सहित शिवलिङ्गाधारमय होती है। इसके करपुट ऊर्ध्वस्थ कल्पित किए जाएँगे। इस रूप में शिव के सामर्थ्यवशात् शिवरात्रि से शिवशासन सिद्धि होगी। (इस प्रकार यहाँ) बारह शिवरात्रियों को नामानुसार कहा गया जो कि मर्त्यलोक में होती है। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां विष्णुवाक्योद्भवसोमनाथोक्तद्वादशशिवरात्रिनिर्णयाधिकारो नामैकत्रिंश सूत्रम् ॥ 31 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में विष्णु के वाक्यानुसार उद्भूत सोमनाथोक्त बारह शिवरात्रि निर्णय अधिकार नामक इकतीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 31 ॥
- यह श्लोक हेमाद्रि के निम्न श्लोक से तुलनीय है— शिवरात्रिसमं नास्ति कृत्वा यज्ञसहस्रकम् ॥ न ते यमपुरस्थास्तेयैः कृतेयं शिवप्रदा। भुक्तिमुक्तिप्रदा देवि सत्यं सत्यं वरानने ॥ (चतुर्वर्गचिन्तामणि व्रतखण्ड भाग 2, पृष्ठ 88)