अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
पृष्ठ 201, कुल 535 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-३२ 153 विश्वकर्मावतारो नाम द्वात्रिंशं सूत्रम् ॥ 32 ॥ विश्वकर्मोवाच — नमस्कृत्वा सोमनाथमज्ञानां ज्ञानदो भवान् । तव प्रसादाद् देवेश तथाऽस्माभिश्च दृश्यते ॥ 1 ॥ कथं चान्यब्रह्माण्डसृष्ट्युत्पत्तिप्रलयादिकम् । ब्रह्मा विष्णुः शशी सूर्य इन्द्राग्नी चान्यसम्भवः ॥ 2 ॥ कुर्वेतं देवदेवेश प्रसादं पार्वतीपते । ज्ञानोपदेशं सन्देहच्छेदनं च जगत्प्रभोः ॥ 3 ॥ विश्वकर्मा बोले — हे सोमनाथ ! आप अज्ञानियों को भी ज्ञान प्रदान करने वाले हैं, मैं आपको नमस्कार करके प्रार्थना करता हूँ कि आप अपने ज्ञानरूपी प्रसाद से हमें दिखाएँ कि किस प्रकार इन अन्य ब्रह्माण्डों की उत्पत्ति और प्रलय होता है और ब्रह्मा, विष्णु, शशि-सूर्य-इन्द्र-अग्नि और अन्य देवता कैसे उत्पन्न हुए ? हे पार्वतीपति देव-देवेश ! कृपा करके हे जगत्प्रभो हमारे सन्देह का निवारण कीजिए। ईश्वर उवाच — पूर्वं ब्रह्मभवा सृष्टिर्जगत्स्थावरजङ्गमम् । समांशेन समुत्पन्नावुभौ ब्रह्मा तथा हरिः ॥ 4 ॥ ब्रह्मा तु सृष्टिकर्ता च पालकस्तु जनार्दनः । तस्मात्तथाऽपरे नैव ब्रह्माविष्णुसदाशिवाः ॥ 5 ॥ पूर्व ब्रह्म में होने वाली यह सृष्टि जगत में स्थावर, जङ्गमयुक्त हुई और समान अंशों से दोनों ही ब्रह्मा और विष्णु उत्पन्न हुए। ब्रह्मा तो सृष्टिकर्ता हुए और इसके पालनकर्ता जनार्दन विष्णु हुए। इनसे बाद में इसी प्रकार ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव हुए। गन्तव्यं ब्रह्मलोकेषु यत्र तौ परमेष्ठिनौ । तत्रोद्भूता च या सृष्टिस्त्वमवाग्रतो भवेत् ? ॥ 6 ॥ पुष्पकारूढः स्रष्टा च युक्तः पुत्रैश्च मानसैः । जयश्च विजयश्चैव सिद्धार्थश्चापराजितः ॥ 7 ॥ (उक्त तीनों ही) परमेष्ठिगण जब ब्रह्मलोक की ओर जाने को तत्पर हुए तब आप ही इस सृष्टि के रचनार्थ उनके साथ अग्रसर हुए और पुष्पक विमान में आरूढ़ होकर स्रष्टा के पद से युक्त होकर अपने मानस पुत्रों— जय, विजय, सिद्धार्थ और अपराजित को साथ ले गए।