अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
पृष्ठ 202, कुल 535 में से
संदर्भ में पढ़ें154 अपराजितपृच्छा पुष्पकस्य च स्रष्टा वै स्वयं त्वं सृष्टिसम्भवः । पुष्पविमानमारूढश् छत्रादिझल्लरीयुत् ॥ 7-1 ॥ कलशकनकदण्डै रत्नैर्नैकेर्विभूषितम् । घण्टारवकोपेतं वै नैकविद्याधराकुलम् ॥ 7-2 ॥ तरुणादित्यसङ्काशं तप्तकाञ्चनसप्रभम् । प्रभासक्षेत्रसम्भूतं द्वितीयमिव भास्करम् ॥ 8 ॥ पुष्पक विमान के स्रष्टा तो आप स्वयं हैं जिनसे समस्त सृष्टि रचना सम्भव होती है। पुष्पक विमान में आरूढ़ होने योग्य छत्रादि और झल्लरीयुक्त कलश, स्वर्णदण्ड, अनेकों रत्नों से विभूषित सजावट, घण्टाघोष आदि ध्वन्योपस्कर और अनेक विद्याधरों के समूह तरुण सूर्य के समान प्रकाशमान, जगमगाते हुए तथा तपाए गए सोने की चमक के समान, प्रभास क्षेत्र में उत्पन्न हुए। ऐसा लगता था कि दूसरे भास्कर ही हों। विष्णुः शक्रश्च सूर्यश्च स्वामी चैव गणाधिपः । रुद्रतेजः समुद्भूताः स्वयं वा सृष्टिकर्मणा ॥ 9 ॥ जटामुकुटशोभाढ्यः कुण्डलाभ्यालङ्कृतः । चतुर्भुजो महातेजा दिव्यहंसकवाहनः ॥ 10 ॥ अक्षसूत्रं करे याम्ये वामे चैव कमण्डलुः । पुस्तकं वामहस्तोर्ध्वे दक्षोर्ध्वे कम्बिका तथा ॥ 11 ॥ वे विष्णु, इन्द्र, सूर्य, कार्तिकस्वामी, गणाधिप और रुद्र के तेज से समुद्भूत स्वयं सृष्टि कर्म करने वाले विश्वकर्मा जयमुकुट की शोभा से भरपूर और कानों में सुन्दर कुण्डलों से अलङ्कृत चतुर्भुज स्वरूप, महातेजस्वी, दिव्य हंस पर सवारी करने वाले, हाथों में अक्षमाला और सूत्र दाहिने हाथ में धारण किए हुए और बायें हाथ में कमण्डलु धारण किए हुए तथा बायें ऊपरी हाथ में पुस्तक (शिल्पवेद) तथा दायें ऊपर के हाथ में कम्बिका या हस्त-गज धारण किए हुए। विश्वकर्मा सदागौरस्तेजः पुञ्जसमुद्भवः । बृहस्पतेर्भागिनेयस्तेजः कूट इवापरः ॥ 12 ॥ सम्प्राप्तो ब्रह्मलोके तु महौजा विश्वकर्मकः । ब्रह्मणो चासनं त्यक्त्वा करयुग्मं च योजितम् ॥ 13 ॥ भगवान् विश्वकर्मा सदा गौरवर्ण और तेजस्विता के पुञ्जरूप उत्पन्न होकर बृहस्पति के भानजे तेजस्विता के शिखर के समान होकर यहाँ से आगे ब्रह्मलोक में