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अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

154 अपराजितपृच्छा पुष्पकस्य च स्रष्टा वै स्वयं त्वं सृष्टिसम्भवः । पुष्पविमानमारूढश् छत्रादिझल्लरीयुत् ॥ 7-1 ॥ कलशकनकदण्डै रत्नैर्नैकेर्विभूषितम् । घण्टारवकोपेतं वै नैकविद्याधराकुलम् ॥ 7-2 ॥ तरुणादित्यसङ्काशं तप्तकाञ्चनसप्रभम् । प्रभासक्षेत्रसम्भूतं द्वितीयमिव भास्करम् ॥ 8 ॥ पुष्पक विमान के स्रष्टा तो आप स्वयं हैं जिनसे समस्त सृष्टि रचना सम्भव होती है। पुष्पक विमान में आरूढ़ होने योग्य छत्रादि और झल्लरीयुक्त कलश, स्वर्णदण्ड, अनेकों रत्नों से विभूषित सजावट, घण्टाघोष आदि ध्वन्योपस्कर और अनेक विद्याधरों के समूह तरुण सूर्य के समान प्रकाशमान, जगमगाते हुए तथा तपाए गए सोने की चमक के समान, प्रभास क्षेत्र में उत्पन्न हुए। ऐसा लगता था कि दूसरे भास्कर ही हों। विष्णुः शक्रश्च सूर्यश्च स्वामी चैव गणाधिपः । रुद्रतेजः समुद्भूताः स्वयं वा सृष्टिकर्मणा ॥ 9 ॥ जटामुकुटशोभाढ्यः कुण्डलाभ्यालङ्कृतः । चतुर्भुजो महातेजा दिव्यहंसकवाहनः ॥ 10 ॥ अक्षसूत्रं करे याम्ये वामे चैव कमण्डलुः । पुस्तकं वामहस्तोर्ध्वे दक्षोर्ध्वे कम्बिका तथा ॥ 11 ॥ वे विष्णु, इन्द्र, सूर्य, कार्तिकस्वामी, गणाधिप और रुद्र के तेज से समुद्भूत स्वयं सृष्टि कर्म करने वाले विश्वकर्मा जयमुकुट की शोभा से भरपूर और कानों में सुन्दर कुण्डलों से अलङ्कृत चतुर्भुज स्वरूप, महातेजस्वी, दिव्य हंस पर सवारी करने वाले, हाथों में अक्षमाला और सूत्र दाहिने हाथ में धारण किए हुए और बायें हाथ में कमण्डलु धारण किए हुए तथा बायें ऊपरी हाथ में पुस्तक (शिल्पवेद) तथा दायें ऊपर के हाथ में कम्बिका या हस्त-गज धारण किए हुए। विश्वकर्मा सदागौरस्तेजः पुञ्जसमुद्भवः । बृहस्पतेर्भागिनेयस्तेजः कूट इवापरः ॥ 12 ॥ सम्प्राप्तो ब्रह्मलोके तु महौजा विश्वकर्मकः । ब्रह्मणो चासनं त्यक्त्वा करयुग्मं च योजितम् ॥ 13 ॥ भगवान् विश्वकर्मा सदा गौरवर्ण और तेजस्विता के पुञ्जरूप उत्पन्न होकर बृहस्पति के भानजे तेजस्विता के शिखर के समान होकर यहाँ से आगे ब्रह्मलोक में

सूत्र-३२ 155 पधारे जिनको आदर देने हेतु स्वयं ब्रह्मा भी आसन त्याग करबद्ध होकर खड़े हो गए। तस्मै तदासनं दत्त्वा स्थितावासनयोरुभौ । चत्वारो मानसाः पुत्रा विश्वकृत्पार्श्वतः स्थिताः ॥ 14 ॥ एकैके च यथाशक्ति स्वयं वै सृष्टिकारकाः । जयो विजय आख्याताः सिद्धार्थश्चापराजितः ॥ 15 ॥ ब्रह्मा ने उन विश्वकर्मा को वह आसन दिया और दोनों ही एक साथ बैठे। अपने पास में ही विश्वकर्मा के उन चारों मानसपुत्रों को भी खड़ा किया जो अपने आपमें एक-एक भी स्वयं सृष्टिकर्ता के रूप में विख्यात हैं। वे जय, विजय, सिद्धार्थ और अपराजित नाम से विख्यात् हैं। ब्रह्मोवाच — स्वयं रुद्रस्त्वमाख्यातो मया सृष्टो महेश्वरः । न्यूनाधिकां तथा सृष्टिं पूरयामि च साम्प्रतम् ॥ 16 ॥ स्वयं रुद्रो विष्णुः शिवो मम सृष्टिकृतोऽभिधाः । त्रैलोक्येऽमरपदं च सृष्टव्यं विश्वकर्मणा ॥ 17 ॥ (इसके बाद ब्रह्मा कहने लगे कि) स्वयं महेश्वर ने आपको कहा है कि उन्होंने ही मेरी सृष्टि की है उसमें जो भी कमी-वेशी है, मैं उसे अब पूरी कर दूँगा। स्वयं रुद्र (का मत है कि) विष्णु, शिव भी मेरी ही सृष्टि के नामधारी है। अब तीनों लोकों में अमरपद देवताओं की सृष्टि विश्वकर्मा द्वारा होनी है। त्रैलोक्ये चामरपदं सृष्टव्यं विश्वकर्मणा। जानासि त्वं विश्वकर्मन् न किं ब्रह्मसमुद्भवम् ॥ 18 ॥ तीनों लोकों के अमरपद देवता स्वयं विश्वकर्मा के द्वारा की जाने वाली सृष्टि में होते हैं। हे विश्वकर्मा ! आप यह सब जानते हैं। यह ब्रह्म किसी से उत्पन्न नहीं हुआ। यह सब आप ही की सृष्टि है अर्थात् आपसे ही उत्पन्न हुई है। भुवनसृष्ट्यादिदेवो भुवर्देवस्स उच्यते। समीपगताथ तत्र पृथिवी तु भयातुरा । तत्पृष्ठतश्चागतो वै पृथुश्च पृथिवीपतिः ॥ 19 ॥ इस भुवनमय सृष्टि का आदिदेव भुवनदेव विश्वकर्मा को ही कहते हैं। एक बार पृथ्वी भयातुरा होकर भगवान् विश्वकर्मा के समीप पहुँची और उसके पीछे के पीछे पृथ्वीपति राजाधिराज पृथु भी पहुँच गया।

156 अपराजितपृच्छा इत्युक्त विष्णुमाख्यातं विश्वकर्म प्रकथ्यते । पक्षिराजं समारुह्य शङ्खशाङ्गिदिधारिणम् ॥ २० ॥ सप्तकोटिगणैर्युक्तविमानैश्च सङ्कुलम्। सिद्धचारणगन्धर्वैर्ऋषिभिः परिवेष्टितम् ॥ २१ ॥ सुरदुन्दुभिसंनादैर्नैकवादित्रसङ्कुलम्। पुष्यकैश्छत्रमाच्छाद्यं पृथिव्यान्तक्षीरार्णवम् ॥ २२ ॥ अकस्मादागतो विष्णुर्ब्रह्मलोकेऽमृतार्णवात्। गन्धमादनशैलेन्द्रे विश्वकर्मा जगत्पतिः ॥ २३ ॥ ऐसा विष्णु द्वारा कहा प्रसिद्ध है।¹ विश्वकर्मा इसको ही पुनः कहते हैं कि विष्णु भगवान् शङ्ख-शार्ङ्गधनुषादि धारण करके पक्षीराज गरुड़ पर आरूढ़ होकर सात करोड़ गणों को साथ लेकर, जो कि विमानों के समूहों में आए थे और जिनमें सिद्ध, चारण, गन्धर्व ऋषिगण बैठे हुए थे और उन सबसे घिरे हुए स्वर्ग के दुन्दुभि आदि के निनाद से और अनेकानेक वाद्यों के समूह पुष्पक विमान के छत्र के नीचे आच्छादित होकर पृथिवी के अन्त में क्षीरसागर में अकस्मात् आ गए। इस प्रकार विष्णु और ब्रह्मलोक के अमृतसागर से विश्वकर्मा जगत्पति के प्रभाव से पुष्पक विमान द्वारा तत्काल पृथिवी के अन्तिम क्षेत्र में स्थित सागर में गन्धमादन पर्वत पर आकर उतरे। पुनः पृच्छति तं पुत्रः कनिष्ठस्त्वपराजितः । विश्वकर्मा पुनर्वाक्यं श्रुत्वोवाच मुनीन्द्रकः ॥ २४ ॥ तब उन्हें पुनः उनके कनिष्ठपुत्र अपराजित ने प्रश्न प्रारम्भ किए और विश्वकर्मा ने उनको सुनकर हे मुनीन्द्रक ! पुनः उत्तर देने आरम्भ किए। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां विश्वकर्मावतारधिकारो नाम द्वात्रिंशत्तमं सूत्रम् ॥ ३२ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में विश्वकर्मा अवतार नामक बत्तीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ३२ ॥

  1. यहाँ सम्भवतः 'विष्णुपुराण' की ओर सङ्केत है। पराशरकृत इस पुराण में कहा गया है कि महाराज पृथु अपरा आजगव नामक दिव्य धनुष और दिव्य बाण लेकर क्रुद्ध होते हुए पृथ्वी के पीछे दौड़े। तब भय से व्याकुल होकर पृथ्वी गौ का रूप धारण कर भागी और ब्रह्मलोकादि में पहुँची— ततस्तु नृपतिर्दिव्यमादायाजगवं धनुः । शरांश्च दिव्यान्कुपितः सोन्वधावद्वसुन्धराम् ॥ ततो ननाश त्वरिता गौर्भूत्वा च वसुन्धरा । सा लोकान्ब्रह्मलोकादीनान् सन्त्रासादगमन्मही । यत्र यत्र ययौ देवी सा तदा भूतधारिणी । तत्र तत्र तु सा वैन्यं ददृशेऽभ्युद्यतायुधम् ॥ (विष्णु. 1, 13, 69-71)

सूत्र- ३३ 157 पृथुपृथिवीसंवादे भूर्लोके विश्वकर्मागमनं त्रयस्त्रिंशं सूत्रम् ॥ ३३ ॥ विश्वकर्मोवाच — शृणु वत्स महाप्राज्ञं संवादं च पृथोः क्षितेः । जम्बूद्वीपे पृथो राज्यमेकच्छत्रं समस्तकम् ॥ १॥ तेनावलोकिता चैव समुद्रान्ता च मेदिनी । पर्वतैः स्थलजैः सर्वैः सूत्रारम्भे समीकृता ॥ २॥ रसवा सर्वबीजानि ह्यात्मन्येव धृतानि च। प्रजाश्च क्लेशितास्तस्माद् गृहीतात्मेच्छया तु सा ॥ ३॥ तदुच्छेदे समारब्धे निःसृता सा भयातुरा । ततः पृथ्वी भयोद्विग्ना पृथोश्च पृथिवीपतेः ॥ ४॥ विश्वकर्मा बोले — हे महाप्रज्ञ बुद्धिमान वत्स! पृथुराज का संवाद सुनो। समस्त जम्बूद्वीप पर पृथुराजा का एकछत्र सार्वभौमिक राज था। उनकी देखी गई समस्त भूमि को समुद्रान्त तक पर्वतों-पहाड़ियों की उबड़-खाबड़ स्थिति को सूत्रता, समतलता, समान सतह की बना दी गई थी (ताकि वहाँ कृषि-कार्य सरलता से हो सके) ।¹ उस धरा पर सब प्रकार के बीजों को स्वयं अपने हाथ में लेकर प्रजा के क्लेश निवारणार्थ उन्होंने पृथ्वी को अपनी इच्छा के वशीभूत कर उसको इकसार करने को प्रवृत्त हुए तो वह पृथ्वी निःश्वास छोड़ते हुए भयातुर होकर और भय से उद्विग्न होकर पृथुराजा के पास पहुँची। पृथ्वी उवाच — तथागताऽब्रवीत्तत्र यत्र तौ परमेश्वरौ । रक्ष रक्ष महाभूत त्वमेव शरणं प्रभो ॥ ५॥ पास आकर पृथ्वी बोली— आप मेरे परमेश्वर हो, मेरी रक्षा करो, रक्षा करो। हे प्रभु ! आप ही मेरे लिए उपयुक्त शरण स्थल हो।

  1. विष्णुपुराण में कहा गया है कि पृथु ने अपने धनुष की कोटि से सैकड़ों-हजारों पर्वतों को उखाड़ा व उन्हें एक ही स्थान पर इकट्ठा कर दिया। इससे पूर्व पृथ्वी के समतल न होने से पुर और ग्राम आदि का कोई नियमित विभाग नहीं था। उस समय अन्न, गोरक्षा, कृषि और व्यापार का कोई क्रम नहीं था। यह सब वेनपुत्र पृथु के समय से ही आरम्भ हुआ है— तत उत्सारयामास शैलान् शतसहस्रशः। धनुष्कोट्या तदा वैन्यस्तेन शैला विवर्द्धिताः ॥ न हि पूर्वविसर्गे वै विषमे पृथिवीतले । प्रविभागः पुराणां वा ग्रामाणां वा पुराऽभवत् ॥ न सस्यानि न गोरक्ष्यं न कृषिर्न वणिक्पथः। वैन्यात्प्रभृति मैत्रेय सर्वस्यैतस्य सम्भवः ॥ (विष्णु. 1, 13, 82-84)

158 अपराजितपृच्छा पृष्ठतश्च ततः प्राप्तः पृथुर्बाणधनुर्धरः । ब्रह्मणश्चाग्रतः स्थित्वा धनुर्बाणौ निवेदितौ ॥ ६ ॥ भूराज्यं च समस्तं च ह्यर्पितं ते हितैषिणः । अस्माभिश्च परित्यक्ता सम्प्राप्ता चाऽत्र मेदिनी ॥ ७ ॥ धनुर्बाणौ स्वर्पयित्वा पृथुस्त्वं पृथिविपतिः । मा भीस्त्वं वत्स राजेन्द्र राज्यं च तव मेदिनी ॥ ८ ॥ राजा पृथ्वी के पीछे (आजगव नामक) धनुष-बाण लिए आ रहे थे परन्तु उन्होंने ब्रह्माजी को आगे खड़ा हुए देखा तो अपने धनुर्बाण ब्रह्मा को समर्पित कर दिए तब उन्होंने पृथुराजा से कहा कि तुम्हारे हितैषी होकर ही तो समस्त भू राज्य को हमने परित्याग करके तुम्हें अर्पित कर दिया था। इसी कारण यह मेदिनी तुम्हें आज तुम्हें प्राप्त हुई है। इसलिए हे पृथुराजा, तुम धनुष-बाण को समर्पित करके भयभीत मत होना क्योंकि हे वत्स ! राजेन्द्र पृथु अभी भी तेरा यह राज्य और तेरी ये पृथ्वी तेरी ही है। धरित्री कम्पिता तत्र ब्रह्मा प्रोवाच सान्त्वयन् । मा भीर्धरे च पुत्री त्वं ज्ञातं कष्टं निवेदितम् ॥ ९ ॥ पृथो शृणु त्वं राजेन्द्र स्वयं रुद्रस्तु विश्वकृत् । करिष्यति द्वयोर्योग्यं धात्री स्यादमरावती ॥ १० ॥ इस पर ब्रह्मा ने धरती को कम्पायमान देखकर उसे ढाढ़स बंधाते हुए कहा कि हे पुत्री धरा ! डरो मत। तुम्हें जो भी कष्ट हो, वह पूरी तक मुझसे कहो। हे राजेन्द्र पृथु ! तुम सुनो कि स्वयं रुद्रावतार विश्वकृत विश्वकर्माजी तुम्हारे और पृथ्वी के दोनों के बीच का निस्तारण बड़ी चतुराई के साथ करवा देंगे जिससे तुम्हारी यह धरती अमरावती (इन्द्रपुरी) के समान हो जाएगी। त्वत्पार्श्वे पुत्रि बीजानि तिष्ठन्त्वाकल्पमेव च । विषया रक्षणीयाश्च विश्वेश्वर तथा त्वया ॥ ११ ॥ पालनीयावुभौ त्वेवं पृथू राजा च मेदिनी । विश्वज्ञ हस्तकर्तस्त्वं श्रियमाधत्स्व चेतयोः ॥ १२ ॥ इसके बाद, उन्होंने धरती को सम्बोधित करते हुए उसे आश्वस्त किया कि हे पुत्री ! तेरे पास रखे गए समस्त बीज कल्पों तक विद्यमान रहेंगे।¹ इसलिए ये कृषि

  1. अराजकता की स्थिति में पृथ्वी ने समस्त ओषधियों, बीजों को अपने में लीन कर लिया था, ऐसे में प्रजा क्षीणकाय हो गई— अराजके नृपश्रेष्ठ धरित्या सकलौषधीः । प्रस्तास्ततः क्षयं यान्ति प्रजाः सर्वाः प्रजेश्वर। त्वत्तो वृत्तिप्रदो धात्रा प्रजापालो निरूपितः । देहि नः क्षुत्परीतानां प्रजानां जीवनौषधीः ॥ (विष्णु. 1, 13, 67-68)

सूत्र-३३ 159 के समस्त विषय विश्वेश्वर विश्वकर्मा तथा तुम्हारे द्वारा भी रक्षणीय है। पृथिवीपति पृथुराजा और मेदिनी पृथ्वी तुम दोनों को यह मेरा आदेश पालनीय होना चाहिए जिससे कि विश्वज्ञ विश्वकर्मा के हाथ से किए गए तुम दोनों के कल्याण कार्य को चित्त लगाकर पूरा कर सको। इसलिए तुम दोनों ही मिलकर विश्वकर्मा जगतपति को इस प्रकार स्थापित कर दो, यह कहते हुए ब्रह्माजी ने उन दोनों को हस्त मिलाप करवाकर परस्पर प्रतिबद्ध कर दिया।¹ उभावेवं च स्थाप्येतां विश्वकर्मन् जगत्पते । ब्रह्मणे च तथोभाभ्यां करयुग्मे च योजिते ॥ 13 ॥ विश्वकर्मा समुत्थाय चतुर्भिर्मानसैः सुतैः । संस्थितः पुष्पविमाने पृथु धरे च मानसे ? ॥ 14 ॥ जयो विजय आख्याताः सिद्धार्थस्त्वपराजितः । ततो हिमवतः पृष्ठे भूर्लोके तु समागताः ॥ 15 ॥ इसके साथ ही विश्वकर्मा को भी अपने चारों मानस पुत्रों के साथ उठने का कहकर पुष्पक विमान में राजा पृथु, धरा व मानस पुत्रों को उसमें बिठाया जिससे वे

  1. समराङ्गणसूत्रधार में आया है कि ब्रह्मा ने पृथ्वी को अभयदान देते हुए पृथु से कहा कि यह पृथ्वी तुम्हारे द्वारा विधिपूर्वक पालन किए जाने पर ही उपायों के सहारे से धान्यादि से तुम्हारी भोग्या बनेगी और जो अभीष्ट स्थानादि निवेश का कार्य है, उसको त्रिदशाचार्य, सर्वसिद्धि प्रवर्तक, प्रभासवसु के पुत्र, बृहस्पति के भानजे, सम्पूर्ण विश्व में महाप्राज्ञ विश्वकर्मा महाराज सम्पादित करेंगे— अथैकदा जगज्जन्महेतुमम्बुरुहासनम्। पृथ्वी पृथुभ्रान्ता चकिताक्षी समाययौ ॥ प्रणम्य प्रणतिपह्वनिखिलत्रिदशेश्वरम्। सगद्गदमुवाचेति भूतधात्री पितामहम् ॥ भगवन्नहमेतेन पृथुना पृथुतेजसा। उप (द्र? द्रु) ता त्वां शरणं प्राप्ता त्रायस्व मां ततः ॥ वदन्त्यामिति मेदिन्यामाविरासीदथो पृथुः। संरम्भमुक्तहृदयो ब्रह्माणं प्रणनाम च ॥ जगादैनमथ स्निग्धध्वनिगम्भीरया गिरा। कुर्वंस्तद्वाहनंसानां पयोदध्वनिशङ्कितम् ॥ त्वयास्मि जगतां नाथ जगतोऽधिपतिः कृतः । स्थापितानि च भूतानि सर्वाण्यपि वशे मम ॥ तेष्वियं मम विश्वेश कदाचिद् वशवर्तिनी। समीकरोमि पाषाणजालादस्याः किलाधुना ॥ व्यस्तानि धनुषा तावद् गौर्भूत्वेयं पलायिता। दोग्धुकामोऽहमप्येनां चिरमन्वगमं महीम् ॥ यत्रक्वापि प्रयात्येषा तत्र मामेव पश्यति। अपश्यन्त्यन्यतस्त्राणमुग्धा त्वामुपस्थिता ॥ अस्यां वर्णाश्रमस्थानविभागश्च विधास्यते। इयं च दुर्गमानेकक्षोणीधर कुलाकुला ॥ विधास्येऽस्यां कथं त्वेतदिति मे शङ्कितं मनः। पृथुनेत्यथ विज्ञप्तो भगवानब्जसम्भवः ॥ उवाच बोधयन्नेनं कृत्वा भूमिं च निर्भयाम्। इयं मही महीपाल विधिवत् पालिता सती ॥ सस्यैरुत्पाद्य निष्पन्नैस्तव भोग्या भविष्यति। यच्च ते स्यादभिप्रेतं स्थानादिविनिवेशनम् ॥ तदेष त्रिदशाचार्यः सर्वसिद्धिप्रवर्तकः । सुतः प्रभासस्य विभोः स्वस्त्रीयश्च बृहस्पतेः ॥ विद्याभिशायिधीः सर्वं विश्वकर्मा करिष्यति। राजन्रेष महेन्द्रस्य विदधादमरावतीम् ॥ अन्या अप्यमुना रम्याः पुर्यो लोकभृतां कृताः। त्वया क्षेत्रीकृतां मूर्त्तिं दृष्ट्वा साद्रिद्रुमामसौ ॥ सन्निवेशान् पुरग्रामनगराणां विधास्यति। तद् गच्छ वत्स लोकानामितस्त्वं हितकाम्या ॥ भयोर्ज्जिता त्वमप्युर्वि पृथोः प्रियकरी भव। काले स्मृतः स्मृतः पुण्यो राज्ञः प्रियचिकीर्षया ॥ इत्युक्तत्वा गमनमुपेयुषि प्रदेशे स्वं स्थानं क्षितिभुजि चाश्रिते मुदोर्व्याम्। प्रालेयावनिभृतमाजगाम खेलत्सिद्धस्त्रीपरिगतमाशु विश्वकर्मा ॥ (समराङ्गण. 1, 6-24)

160 अपराजितपृच्छा जय, विजय, सिद्धार्थ और अपराजित नाम से आख्यात मानस पुत्र हिमालय के पार्श्व में भूलोक में आ गए। पृथिवी प्रेषिता स्थाने सम्बोध्य भूतधारिणि । विना कष्टं त्वया ग्राह्यं कारयिष्ये तु निश्चलाम् ॥ 16 ॥ इसके बाद, पृथ्वी को उस प्रेषित स्थान में सम्बोधित किया कि हे पृथ्वी ! तुम प्राणिमात्र को धारण करने वाली हो, यह बात तुम्हें बिना किसी कष्ट के ग्राह्य होनी चाहिए अर्थात् तुम्हें स्वीकार लेनी चाहिए इसका तुम निश्चलमना होकर पालन करोगी। नृपश्च प्रेषितः स्थाने पृथुः सम्बोधितस्तथा । यथामरावती चैव त्वदर्थे मेदिनी कृता ॥ 17 ॥ पृथो चागम्य स्वस्थाने यावत्त्वं पालयेर्महीम् । निर्जलान् सजलान् देशांस्तावत्त्वमवलोकय ॥ 18 ॥ पुष्पकेऽस्माकमारुह्य मेरुमावृत्य दक्षिणम् । आलोकय भूतधात्रीमासमुद्रान्तमेदिनी ॥ 19 ॥ राजा पृथु को भी प्रेषित स्थान पर पहुँचने पर ब्रह्मा ने सम्बोधित करते हुए कहा कि हे पृथुराजा ! तुम्हारे लिए ही आज हमने इस मेदिनी को अमरावती के समान बना दिया है इसलिए हे पृथु अब तुम स्वस्थान को जाओ और जब तक तुम इस पृथ्वी का पालन करते रहोगे, तब तक तुम पाओगे कि तुम्हारे जो स्थान निर्जल थे, वे सजल हो गए हैं। अब तुम हम सब लोगों को पुष्पक विमान पर आरूढ़कर मेरुपर्वत के चारों ओर घूमकर दक्षिण की ओर ले चलो और इस समस्त पृथ्वी को, जो कि प्राणीमात्र की माता के रूप में आसमुद्रान्त विस्तृत है, देख सको। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां पृथुपृथिवीसंवादे विश्वकर्मभूलोकागमनाधिकारो नाम त्रयस्त्रिंशत्तमं सूत्रम् ॥ 33 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में पृथु-पृथ्वी संवाद में विश्वकर्मा के भूलोकगमन अधिकार नामक तैंतीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 33 ॥ जयविजयसिद्धार्थपृच्छा नाम चतुस्त्रिंशं सूत्रम् ॥ 34 ॥ अपराजित उवाच - जयपृच्छागमश्चैव कस्मिन् स्थाने जगत्यते । विजयपृच्छागमश्च कुत्रस्थाने बभूव च ॥ 1 ॥ सिद्धार्थपृच्छागमश्च किं स्थाने च तथाभवत् ।

सूत्र-३४ 161 एवमस्मत् प्रसादं तु कुरु शास्त्रार्थकौशल ॥ २॥ (शिल्पादि आगम शास्त्रों की उत्पत्ति के प्रसङ्ग में कहा गया है) अपराजित बोले— हे जगत्पते ! जयपृच्छागम किस स्थान पर और विजयपृच्छागम किस स्थान पर हुए। इसी प्रकार सिद्धार्थपृच्छागम भी किस स्थान पर हुआ। इस विषय में हे शास्त्रार्थ कौशल गुरुदेव ! हमें आप कृपाकर बताइए। विश्वकर्मोवाच — ततो हिमवतः पृष्ठे ब्रह्मलोकात्समागतौ । शृङ्गाकुले घवनाकीर्णे हिमवन्तश्रीयोद्गवे ॥ ३॥ नैकगुहाश्रमरम्ये गन्धर्वगणसेविते । सिद्धामरकुलाकीर्णे क्रीडामणिगुहागृहे ॥ ४॥ जयः पृच्छति तत्रेदां वास्तुविद्योद्भवं तदा। तदिदं कथनीयं च शृणु संवादमुत्तमम् ॥ ५॥ उस समय हिमालय पर्वत की पीठ पर, पार्श्वभाग पर ब्रह्मलोक से आए हुए (देवादि से), मेघों के समूह से आच्छादित शिखरों के समूहों की शोभा से हिमालय पर्वत की श्रीवृद्धि हो रही थी। वहाँ पर गन्धर्वगणों से सेवित अनेकों रम्य गुहाश्रयों का समूह था जिनमें सिद्धगण, देवतागणों के कुलों के समूह उन मणिगुहागृहों में क्रीड़ा कर रहे थे। ऐसे में वहाँ जय ने वास्तुविद्या के उद्भव के विषय में प्रश्न किया जो यहाँ कहना प्रासङ्गिक है। इसलिए इस संवाद को सम्यक् प्रकार से सुनो। जयपृच्छादीनां परिचयमाह— चतुर्विंशति₂₄ साहस्त्रसङ्ख्यग्रन्थस्तथा कृतः । लिङ्गपीठाचार्चानिलयवेश्मराजवेश्मादिकम् ॥ ६॥ पुरप्राकारपरिखाप्रतोलीमार्गगोपुरम् । अन्योपस्करजातानि वास्तुवेदोद्भवानि च ॥ ७॥ जयपृच्छादिशास्त्रं च विश्वकर्मप्रभाषितम् । जयस्य कथितं चैतद् भक्तित्वात्सल्यतः पुरा ॥ ८॥ (उस ग्रन्थ के विषय में कहा गया है कि) उक्त वास्तुविषयक ग्रन्थ की ग्रन्थ संख्या 24 हजार थी। उसमें लिङ्ग, पीठ, प्रतिमा या अर्च्चा, निलय, वेश्म, राजवेश्मादि, पुर, प्राकार, परिखा, प्रतोली, मार्ग, गोपुर और भी अनेक उपकरण सामग्री जो कि वास्तुवेद के उद्भव में आवश्यक होती है, वे सब जयपृच्छादि शास्त्र

162 अपराजितपृच्छा में भगवान् विश्वकर्मा द्वारा कही गई है।¹ यह विषय-वर्णन पूर्वकाल में जय के भक्तिवात्सल्य के कारण कहा गया था। हेमकृटे महाशैले शतयोजनमुच्छ्रिते । विरूपाख्याश्रमे रम्ये विचित्रशिखरोद्भवे ॥ ९ ॥ नानाद्रुमलताकीर्णो रत्नधातुपशोभिते। सुरविद्याधरारम्ये गन्धर्वगणसेविते ॥ १० ॥ विजयेन ततः पृष्टो वत्साहं भक्तवत्सलः। श्लोका विजयपृच्छायां सहस्राणि च द्वादश₁₂ ॥ ११ ॥ हेमकूट महापर्वत पर, जो कि सौ योजन की ऊँचाई वाला है, उस पर विचित्र मनोहर शिखरों के बीच बना हुआ विरूपाख्य नामक आश्रम बड़ा ही सुन्दर है। वहाँ नाना वृक्ष, लतादि की भरमार है और तरह-तरह के रत्नों, धातुओं से शोभायमान है। वहाँ विजय ने भक्तवत्सल भगवान् विश्वकर्मा से प्रश्न किया कि हे प्रभु! आपका वत्स हूँ। आप मुझे उपदेश करे। इस पर विश्वकर्मा ने जो उपदेश किया, उससे विजयपृच्छा शास्त्र निर्मित हुआ इसमें बारह हजार श्लोक हैं। ततघनमुरजादिवादित्रैर्विविधैस्तथा। लास्यहास्यताण्डवाद्यैस्तालमूलसमुद्भवाः !' ౨ ॥ सप्तस्वरास्त्रयो ग्रामा मूर्च्छनास्त्वेकविंशतिः । ताना एकोनपञ्चाशदित्येतत्स्वरमण्डलम् ॥ १३ ॥ रागाः षट् समुत्पन्नाः षट्त्रिंशच्चैव तत्स्त्रियम्। एतत्सर्वं विजयस्य कथितं भरताभिधम् ॥ 14 ॥

  1. इस ग्रन्थ का खण्डित पाठ वर्तमान में उपलब्ध है। हेमाद्रि कृत चतुर्वर्गचिन्तामणि में जयोपदिष्ट वास्तु, मूर्ति विषयक श्लोक उपलब्ध होते हैं। जयपृच्छा ग्रन्थ का सम्पादन प्रभाशङ्कर ओघड़भाई सोमपुरा ने किया है किन्तु वह पूर्ण नहीं है। लगभग समस्त श्लोक भ्रष्ट हैं। 'देवतामूर्तिप्रकरण' भी जय-विश्वकर्मा संवाद के रूप में लिखा गया है जिसका सम्पादन डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू' ने किया है। इससे यह सङ्केत मिलता है कि यह ग्रन्थ जयपृच्छा के ही मूर्ति विषयक अधिकार या रूपाधिकार का अङ्ग है। 16वीं सदी में इसके पुनर्सम्पादन का श्रेय चित्तौड़गढ़-कुम्भलगढ़ के सूत्रधार मण्डन के पिता सूत्रधार खेता को दिया जाता है क्योंकि इसमें मस्जिद (रहमानप्रासाद) निर्माण तक के निर्देश मिलते हैं। जयपृच्छा नाम से ही एक अन्य पाठ भी मिलता है, इसका प्रचलन मालवा से हुआ माना जाता है। इसका खण्डित पाठ मिलता है। धाराधिप भोजराज के सूत्रधार मल्लकृत 'प्रमाणमञ्जरी' में उक्त ग्रन्थ का सङ्केत आया है— अथोच्यते सारतरस्य सारं काश्योदयालिन्दसमुद्भवं तम्। मानं समस्तं जयवीक्षदृष्टं सुशिल्पिकं सर्वजनोपकृत्यम्॥ (प्रमाणमञ्जरी 2) चित्तौड़गढ़ के महाराणा कुम्भा (1433-68 ई.) ने कीर्तिस्तम्भ की एक शिला पर स्तम्भराज को उत्कीर्ण करवाया था जिसमें जयकृत ग्रन्थ का उल्लेख है— स्तम्भस्य लक्ष्मानुते नृपालः श्रीकुम्भकर्णो जयभाषितेन॥ (डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू' : प्रासादमण्डनम् की भूमिका)

सूत्र-३४ 163 (इस शास्त्र का सम्बन्ध सङ्गीत विद्या से है जिसमें) तत्, घन, मुरजादि विविध प्रकार के वाद्यों, नृत्य सम्बन्धी लास्य, हास्य, ताण्डव आदि तालमूल से उत्पन्न होने वाले ससस्वर, तीन ग्राम, इक्कीस मूर्च्छना, उनचास तान व स्वरमण्डल, छह राग, छत्तीस रागिनियों का वर्णन किया गया है। यह वर्णन विजय के प्रति 'भरत' के नाम से कहा गया था।¹ मन्दरस्थं सुखासीनं सिद्धार्थः पृष्टवान् पुरा। तालुकण्ठस्वरशास्त्रं गणितं ज्योतिषं तथा ॥ 15 ॥ निघण्टुश्च व्याकरणं छन्दोलङ्कारसंयुतम् । मनुसाध्यसमुद्भूतं संसारपाशछेदनम् ॥ 16 ॥ मुक्तिमार्गरहस्यं च कथितं भक्तवत्सलैः। तुर्योऽयं मानसः पुत्रः पृच्छति त्वराजितः ॥ 17 ॥ पूर्वकाल में मन्दर पर्वत पर सुखासन पर बैठे हुए सिद्धार्थ ने प्रश्न किया था। इस पर जिस ग्रन्थ का कथन हुआ² उसमें तालुकण्ठ से सम्बद्ध स्वरशास्त्र, गणितशास्त्र, ज्योतिषशास्त्र, निघण्टु-शब्दकोष, व्याकरण, छन्दालङ्कार भी रहे हैं। यह ग्रन्थ (सिद्धार्थ पृच्छा) मनुओं, साध्यों द्वारा संसार के सम्बन्धों को काटने (संसारपाश के छेदन) के प्रयोजन से रचा गया। इनमें इन भक्तिवत्सल भक्तों पर कृपा करने वाले महापुरुषों ने मुक्तिमार्ग का रहस्य भी कहकर समझाया है। अब चौथा मानसपुत्र अपराजित यह प्रश्न करता है। ग्रन्थोत्पत्तिवर्णनं, अपराजित उवाच — अस्मच्चित्ते प्रबोद्धव्यं जयाय पृच्छते च यत्। विजयश्च सिद्धार्थश्च पृच्छायां यत्तथैतयोः ॥ 18 ॥ भवान् पुष्पकमारुह्य प्रोक्तवान् यदनुग्रहात्। पूर्वं सर्वं प्रसादेन कथयस्व जगत्पते ॥ 19 ॥ अपराजित ने कहा— आपने कृपाकर मेरे चित्त को प्रबोध किया है। आपने पूर्व में कथित जयपृच्छा और उसी प्रकार विजयपृच्छा तथा सिद्धार्थपृच्छा के विषय

  1. विजयपृच्छा नामक यह मूल ग्रन्थ वर्तमान में अनुपलब्ध हैं किन्तु नाट्यशास्त्र व उसकी वृत्ति, विष्णुधर्मोत्तर पुराणोक्त नृत्तसूत्राध्याय, सङ्गीतरत्नाकर, सङ्गीतराज, सङ्गीतमकरन्द आदि में उक्त समस्त विषय मिलते हैं।
  2. सिद्धार्थपृच्छा संज्ञक ग्रन्थ अद्यावधि अनुपलब्ध, असूचित है। ये अधिकांश विषय नारदपुराण के पूर्वभाग में प्रकीर्णित हैं और अग्निपुराण में भी आए हैं। हेमाद्रि के व्रतखण्ड में सिद्धार्थपृच्छा के श्लोक मूर्तिलक्षणों के प्रसंग में उद्धृत हैं।

164 अपराजितपृच्छा में भी मुझे समझाया है। अब हे जगत्पते ! आप पुष्पक विमान पर आरूढ़ हो जाएँ और मेरे पर अनुग्रह कर जो कुछ आपने पूर्व में कहा है, उस सब विषयों को मेरे प्रति यहाँ (इस ग्रन्थ के प्रयोजन से) पुनः कृपाकर कहें।¹ पुष्पकं तु समारुह्य मेरुमार्गप्रदक्षिणम्। अवालोकि तथा चैषा समुद्रान्ता च मेदिनी ॥ २० ॥ इस पर पुष्पक विमान पर आरूढ़ होकर मेरुपर्वत के मार्ग से प्रदक्षिणा करते हुए समस्त पृथ्वी को समुद्रपर्यन्त देखते हुए विश्वकर्मा आगे बढ़े। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां जयविजयसिद्धार्थपृच्छाधिकारो नाम चतुस्त्रिंशं सूत्रम् ॥ ३४ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में जय- विजय-सिद्धार्थपृच्छा अधिकार नामक चौंतीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ३४ ॥ एकविंशतिस्वर्गा नाम पञ्चत्रिंशं सूत्रम् ॥ ३५ ॥ विश्वकर्मोवाच — पुष्पकं तु समारुह्य मेरुमाश्रित्य दक्षिणम्। विलोकिता भूतधात्री समुद्रान्ता च मेदिनी ॥ १ ॥ अथातो भूतधात्रीणां प्रमाणं च प्रवक्ष्यते । विष्कम्भः परिधिश्चैव बाहुल्यं (क्षेत्राणां) शृणु ॥ २ ॥ पुष्पक विमान पर आरूढ़ हो, सुमेरु पर्वत के आश्रय से प्रदक्षिणा करते हुए और समुद्रान्त तक के प्राणियों को धारण करने वाली धरती को देखते हुए भगवान् विश्वकर्मा ने कहा कि अब मैं प्राणीमात्र को धारण करने वाली इस पृथ्वी का प्रमाण बताता हूँ। तुम इसके विष्कम्भ या व्यास, परिधि और क्षेत्र के बाहुल्य के बारे में सुनो। पृथ्वीप्रमाणमाह — योजनानि तु विष्कम्भो दशकोट्यः प्रकीर्तितः । लक्षस्याग्रे सहस्राणामेकोनाविंशतिस्तथा ॥ ३ ॥

  1. इस प्रकार इस ग्रन्थ में जयपृच्छा, विजयपृच्छा, सिद्धार्थपृच्छा के समस्त विषयों का वर्णन होना सिद्ध होता है। विमानारूढ़ होकर विषय वर्णन करने से यहाँ आशय ग्रन्थकार के यायावर होकर ग्रन्थ विषयों की संग्राहानुभूति भी सम्भव है। वैसे ग्रन्थकार ने एकाधिक देशों की यात्रा की और वहाँ के भूगोल, परम्पराओं को स्वयं जाना व तदोपरान्त ही उन्हें लिखित रूप दिया।

सूत्र-३५ 165 विष्कम्भे च त्रिगुणिते तद्दशांशसमन्विते । परिधिश्च समस्तोऽसौ समुद्रान्तक्षितेः स्मृतः ॥ ४ ॥ एकविंशतिकोटीनां समलक्षाणि चाग्रतः । ततः परं सहस्राणि सङ्ख्यया सप्तविंशतिः ॥ ५ ॥ एवं समस्तपरिधिर्वृत्ताकारा च मेदिनी । त्रैलोक्यमध्ये चैवं सा तलाद्याश्चैव बाह्यतः ॥ ६ ॥ इसका व्यास दस करोड़ योजनों का बताया गया है और एक लाख उन्नीस हजार विष्कम्भ के तिगुने तथा उसके समांश युक्त परिधि की समुद्रान्ता पृथ्वी की कही गई है अर्थात् विष्कम्भ से 3¹/⁷ परिधि है। इक्कीस करोड़, सात लाख, एक हजार- इस प्रकार समस्त परिधियुक्त वृत्ताकार में यह पृथ्वी है जो तीनों ही लोकों के मध्य में तलादि पातालों के बाहर है। स्वर्गपातालनामादीनां — एकविंशतिस्वर्गांश्च मेरुमावृत्य दक्षिणम् । परितश्चार्णवाः सप्त रचिताश्च समस्तकाः ॥ ७ ॥ तलश्च वितलश्चैव सुतलो नितलस्तथा । तलातलो रसातलः पातालः सप्तमस्तथा ॥ ८ ॥ इस प्रकार मेरु को आवृत्त करते हुए दक्षिण की ओर इक्कीस स्वर्ग है जिनके बाद में सात महासागर रचे गए हैं। अब पाताललोक के नाम सुनो जो इस प्रकार हैं— (1.) तल, (2.) वितल, (3.) सुतल, (4.) नितल, (5.) तलातल, (6.) रसातल और सातवाँ (7.) पाताल। आदौ मेरुः कमोद्भूताः पात्रे पात्रमिवापरम् । एते च सप्तपातालाः सृष्टिकालसमुद्भवाः ॥ ९ ॥ उद्भूतश्चादितो मेरूर्द्विसहस्रैश्च योजनैः । द्विद्विसहस्रान्ते पुनः पातालाः सप्तधोदिताः ॥ १० ॥ आदि में तो यह मेरु उत्पन्न हुआ और बाद के क्रम में जैसे घड़े-पर-घड़े रखे जाते हैं, वैसे ही एक दूसरे पर ये सातों पाताल भी क्रमानुसार सृष्टिकाल में उत्पन्न हुए। आदि में मेरु पर्वत पृथ्वी में से दो हजार योजन ऊँचा ऊठा और इसी प्रकार दो-दो हजार योजनों के अन्तर पर उसमें सातों पाताल नीचे की ओर से उठते चले गए।

166 अपराजितपृच्छा अधस्तात्तु तथा द्व्यष्टसहस्रैर्योजनैर्गतः । मेरुर्वै चतुरशीतिसहस्रयोजनोच्छ्रितः ॥ 11 ॥ पृथगेकैकपाताले नवनागकुलानि च। नवकानि सप्त चेत्थं त्रिषष्टिः₆₃ कुलपन्नगाः ॥ 12 ॥ इन नीचे वाले पातालों में सोलह हजार योजन तक जाने पर मेरु चौरासी हजार योजन ऊँचा उठा। इन पातालों में भी एक-एक पृथक् पाताल में नौ नागों के कुल कहे गए हैं और इनके भी इसी तरह सातों पातालों में 9 × 7 के हिसाब से नागों के कुल 63 कुल होते हैं। नागकुलनामश्च — प्रोक्तानि पृथगेवं च नवनागकुलानि च। उरगाः सप्तपातालसंस्थिताः सप्त₇ वै क्रमात् ॥ 13 ॥ पद्मः कर्कोटकश्चैव पुण्डरीकोऽथ तक्षकः । आनकः शङ्खचूडश्च वासुकिः सप्तमस्तथा ॥ 14 ॥ इस प्रकार पृथक् रूप में नौ नागकुल कहे गए हैं। सात पातालों में संस्थित सात उरग या नागों के क्रमानुसार नाम हैं— (1.) पद्म, (2.) कर्कोटक, (3.) पुण्डरिक, (4.) तक्षक, (5.) आनक, (6.) शङ्खचूड और सातवाँ (7.) वासुकि। सप्तपातालाधिराजा महोत्कटमहाबलाः । रौद्राश्च विद्रुताः सर्व्वे ह्यगम्या वीरविक्रमाः ॥ 15 ॥ उक्त सभी सातों ही पातालों के अधिराज है और बड़े ही विकट, महाबलवान हैं। ये सभी बड़े भयानक, बड़े तीव्रगामी और इतने वीर विक्रम हैं कि इनको कोई पार नहीं पा सकता। तले तु पद्मको राजा वितले स्यात्कर्कोटकः । सुतले पुण्डरीकश्च नितले स्यात्तु तक्षकः ॥ 16 ॥ तलातले आनकश्च शङ्खचूडो रसातले। वासुकिर्नागराजन्द्रः पाताले सर्वतोऽधिपः ॥ 17 ॥ एकैके नवकुलकास्त्रिषष्टिः₆₃ कुलपन्नगाः । तल का राजा पद्मक₁ है, वितल का राजा कर्कोटक₂, सुतल का पुण्डरिक₃, नितल का तक्षक₄, तलातल का आनक₅, रसातल का शङ्खचूड़₆ तथा वासुकि, नाग राजेन्द्र पाताल में सबके अधिपति कहे गए हैं। इस प्रकार एक-एक नौकुलों के तिरेसठ नागकुल होते हैं।

सूत्र-३५ 167 धरत्र्यां द्वीपनामानि — सप्तपातालतश्चोर्ध्वं द्वीपाः स्युर्द्वीपतः परे ॥ 18 ॥ जम्बूः प्लक्षः कुशः क्रौञ्चः शाकः शाल्मलिकस्तथा । सप्तमः पुष्कराख्यश्च सप्तद्वीपा तु मेदिनी ॥ 19 ॥ इन सात पातालों के ऊपर कई द्वीप हैं और इन द्वीपों के ऊपर ( 1. ) जम्बू, ( 2. ) प्लक्ष, ( 3. ) कुश, ( 4. ) क्रौञ्च, ( 5. ) शाक, ( 6. ) शाल्मलि तथा ( 7. ) पुष्कर द्वीप है। इसी प्रकार यह पृथ्वी सप्तद्वीपा कही गई है। नृपाभिधानतः प्रोक्तं सप्तद्वीपाभिधानकम् । पुष्कराख्यो महाराजा द्वीपे सप्तमकेऽधिपः ॥ 20 ॥ गोमेदेशश्च गोमेदः शाल्मलिके च शाल्मलिः । शाकस्तु शाकद्वीपेशः क्रौञ्चः क्रौञ्चाधिपस्तथा ॥ 21 ॥ कुशेशस्तु कुशः प्रोक्ता महोत्कटो महाबलः । अब इन सात द्वीपों के क्रमवार नृपों के नामों के विषय में कहता हूँ। सातवाँ द्वीप पुष्कर नाम का है जिसके अधिपति महाराज पुष्कर है। गोमेद द्वीप के राजा गोमेद, शाल्मलि द्वीप के शाल्मलि, शाक द्वीप के शाक और क्रौञ्च द्वीप के क्रौञ्च अधिपति है। कुशद्वीप का अधिपति कुश नाम से है जो बड़ा ही विकट और महाबलवान है। महाविक्रमभूपालाः संस्थिता मेरुदक्षिणम् ॥ 22 ॥ मेरुदक्षिणकुक्षौ च महाजम्बुतरूद्भवः । यस्य नाम्ना तु विख्यातो जम्बुद्वीपः स उच्यते ॥ 23 ॥ इस मेरु के दक्षिण कुक्षों में महापराक्रमी राजा बसे हुए हैं। मेरु के दक्षिण में एक महान् जम्बूतरी या जामुन का वृक्ष है। इसी के नाम से विख्यात् होने से इसको जम्बू द्वीप कहा जाता है (जैसा कि वायुपुराण में भी आया है)। एकछत्रं पृथो राज्यं जम्बुद्वीपे प्रकीर्तितम् । क्षीरार्णवमध्ये चेवं पृथुत्वं लक्षयोजनः ॥ 24 ॥ इस जम्बू द्वीप का एक छत्र राजा पृथु के नाम से विख्यात है। यह जम्बू द्वीप क्षीरार्णव के बीच में एक लाख योजन के विस्तार वाला है। समस्ताः समभूयास्तु प्रयुक्ता द्वीपसागराः । अभिधानानि चैतेषां कथ्यन्ते त्वपराजित ॥ 25 ॥

१७७ अपराजितपृच्छा ये समस्त सातों ही द्वीप समान भाव से सागरों में फैले हुए हैं जिनके नाम हे अपराजित! अब मैं तुम्हें कहता हूँ। सागरनामानि — क्षारोदं चैव क्षीरोदं सागरौ दधिसर्पिषोः । मध्विक्षूदं तथा ख्यातं रसोदं सप्तमं तथा ॥ २६ ॥ सप्तैते द्वीपान्तरेषु स्थिता मेरुप्रदक्षिणम्। सप्तद्वीपार्णवाश्चैवं सृष्टिकाले समुद्भवाः ॥ २७ ॥ (१.) क्षारोद, (२.) क्षीरोद, (३.) दधि, (४.) सर्पि, (५.) मधु, (६.) इक्षु तथा (७.) रसोद— ये सात सागरों के नाम विख्यात हैं। ये सभी सातों द्वीपान्तरों पर मेरु के प्रदक्षिण क्रम में बने हुए सप्तद्वीपार्णव सृष्टिकाल में ही उत्पन्न हुए थे। स्वर्गनामानि — भुवर्लोकश्च स्वर्लोको महर्लोकस्तथा जनः। तपश्च सत्यलोकश्च ज्ञानलोकश्च सप्तमः ॥ २८ ॥ इत्येकविंशतिस्वर्गा₂₁ अधिरचित ? शम्भूद्भवाः। (अब सात स्वर्गों के नाम सुनो) इनमें पहला (१.) भुवर्लोक, (२.) स्वर्लोक, (३.) महर्लोक, (४.) जनलोक, (५.) तपलोक, (६.) सत्यलोक और (७.) ज्ञानलोक है। ये सब इक्कीस स्वर्ग विधिरचित है और स्वयंभू है, शम्भु के द्वारा उद्भूत हुए हैं। सृष्टिकाले सुदृष्टाश्च स्वर्गाणामेकविंशतिः ॥ २९ ॥ पातालाश्च ब्रह्मभागे सप्तैवं तु सुसंस्थिताः । तदूर्ध्वे सप्त चाख्याता विष्णुभागे द्वीपार्णवाः ॥ ३० ॥ सृष्टिकाल से ही ये भली प्रकार से देखे गए इक्कीस स्वर्ग है। सातों पाताल भी ब्रह्मभाग में इसी प्रकार सुसंस्थित है। इनके ऊपर विख्यात सात द्वीपार्णव विष्णुभाग में स्थित हैं। पुष्करोर्ध्वे भुवर्लोकः स्वर्लोकश्च तदूर्ध्वतः । तथा चैवानन्यलोकाः शम्भुभागे व्यवस्थिताः ॥ ३१ ॥ बाह्यतः सप्तलोकानां शिवलोकस्तदूर्ध्वतः । इत्युच्छ्रिते महामेरो स्वर्गा एवं सुसंस्थिताः ॥ ३२ ॥ पुष्कर के ऊपर ही भुवर्लोक है, इसके ऊपर स्वर्लोक है। इसी प्रकार अन्य सभी लोक शम्भुभाग में व्यवस्थित हैं। इन सात लोक के बाहर शिवलोक इनसे ऊपर है,

सूत्र-३६ 169 इससे भी ऊँचा महामेरु है जहाँ स्वर्ग इसी प्रकार सम्यक् प्रकार से स्थित है। लोकाश्च सप्त चाख्याता मृत्युलोके द्वीपार्णवाः । पातालाः सप्तधा चैव त्रैलोक्यमिति प्रोच्यते ॥ ३३ ॥ एकविंशतिस्त्रैलोक्ये स्थिताः स्वर्गा यथाक्रमम् । ऊर्ध्व चैव भवस्थानं पात्रे पात्रमिवापरम् ॥ ३४ ॥ सात लोक विख्यात् है। मृत्युलोक में द्वीपार्णवों में पाताल भी सात और इन सबको त्रैलोक्य कहते हैं। इन इक्कीस त्रिलोकों में स्वर्ग क्रमवार स्थित है। ये सभी भवस्थान से ऊपर की ओर ऊपरोपरि इसी प्रकार स्थित हैं जैसे कि कलशों पर कलश होते हैं।¹ मध्ये च जम्बुद्वीपस्य प्रमाणमपि कथ्यते । मेर्वाद्या मुख्यशैलाश्च क्षेत्राणि च समासतः ॥ ३५ ॥ इस जम्बू द्वीप के मध्य का प्रमाण भी कहता हूँ। मेरु से लेकर मुख्य-मुख्य पर्वतों और क्षेत्रों के बारे में भी मैं आगे संक्षेप से कहूँगा। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां मेकविंशतिस्वर्गाधिकारो नाम पञ्चत्रिंशत्तमं सूत्रम् ॥ ३५ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में इक्कीस स्वर्गाधिकार नामक पैंतीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ३५ ॥ महापर्वतप्रमाणं षट्त्रिंशं सूत्रम् ॥ ३६ ॥ विश्वकर्मावाच — जम्बूद्वीपप्रमाणं च विस्तारे लक्षयोजनैः । तस्यान्ते वृत्तपरिधौ समस्तं च क्षीरार्णवम् ॥ १ ॥ विश्वकर्मा बोले— जम्बूद्वीप का प्रमाणतः विस्तार एक लाख योजन का है। इसके अन्तमें चारों ओर वृत्त की परिधि रूप में समस्त क्षीरार्णव है। क्षेत्राणां क्षेत्रमानं च पर्वताश्च मेधोपमाः । महापर्वतोद्द्भवाश्चाप्रमाणा मानवर्जिताः ॥ २ ॥

  1. यही वर्णन ग्रन्थ के चौथे व अन्य सूत्रों में भी आया है— सप्तोर्ध्वलोकाश्च ख्याता रुद्रभागसमुद्भवाः । स्वर्गश्च मर्त्यपातालौ स्वर्गाणां त्वेकविंशतिः ॥ (अपराजित. 4, 5) अर्थात्— सात ऊर्ध्वलोक जो विख्यात हैं, उनको स्वयं भगवान रुद्र ने ही उत्पन्न किया। इससे हम पाते हैं कि स्वर्गलोक, मृत्युलोक और पाताललोकादि स्वर्गों की संख्या इक्कीस है।

170 अपराजितपृच्छा इसके क्षेत्रों का क्षेत्रमान तथा इसके पर्वत विशाल मेघों, बादलों जितने बड़े हैं जिनका प्रमाण और उद्भव का मान बताना अत्यन्त दुष्कर है अर्थात् इनका अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता है। जम्बूद्वीपस्य मध्ये तु मेरुश्च पर्वतो महान्। स्थितौ मेरोः पूर्वतश्च मन्दरो गन्धमादनः ॥ ३ ॥ इस जम्बूद्वीप के मध्य में स्थित है महान मेरुपर्वत जिसके पूर्व की ओर मन्दर और गन्धमादन पर्वत है। हिमवान् हेमकूटश्च महोशैलस्य दक्षिणे । पश्चिमे पर्वतौ रम्यौ निषधो नील एव च ॥ ४ ॥ इसी तरह हिमवान, हेमकूट नामक महापर्वत मेरु के दक्षिणी ओर है और मेरु के ही पश्चिम में बड़े सुन्दर निषध और नील पर्वत हैं। श्वेतश्च शृङ्गवांश्चैव मेरोरुत्तरतः स्थितौ । एते चाष्टकुला रम्या दिक्षु चैवं व्यवस्थिताः ॥ ५ ॥ श्वेत और शृङ्गवान पर्वत मेरु के उत्तर में स्थित है। ये सभी पर्वतों के आठों ही कुल बड़े सुन्दर है और अपनी-अपनी दिशाओं में व्यवस्थित है। देशे समुद्रापकण्ठे महाशैलाः पुरोभवाः । उदयाद्रिर्मलाशैलः पूर्वायां च बलादिषु ? ॥ ६ ॥ जम्बूद्वीप के समुद्रों के उपकण्ठ अर्थात् किनारे के प्रदेश में जो महान पर्वत पहले उत्पन्न हुए हैं, उनमें उदयाद्रि नामक जो महाशैल है, वह पूर्व दिशा की ओर विस्तृत है (चलादिषु ?)। वारुण्यां तु महावृद्धस्त्रिकूटाख्यश्च दक्षिणे । उत्तरे द्विपशैलाख्यः संस्थिताः स्युरनुक्रमैः ॥ ७ ॥ जम्बूद्वीप की वारुणी दिशा में महावृद्ध और दक्षिणी दिशा में त्रिकूट पर्वत है तथा उत्तर में द्विपशैलाख्य अर्थात् हाथियों का कदली वन वाला पर्वत है। ये सब अनुक्रम में स्थित है अर्थात् दिशावार अवस्थित है। द्वयष्टसहस्रमध्यस्थः सप्तपातालतो भवः । सपद्मकर्णकाकारैर्मेरुः काञ्चनकन्दरैः ॥ ४ ॥ सोलह हजार के मध्य में सप्तपाताल से उत्पन्न पद्म के सहित कर्णिका दण्डी के आकार में मेरु पर्वत सोने की-सी कन्दरों से युक्त है।

सूत्र- ३६ 171 योजनैर्दशसाहस्रैः पृथुत्वं मेरुमस्तके। द्वात्रिंशद्भिः सहस्त्रैश्च जम्बूद्वीपस्य मस्तके ॥ ९ ॥ वह दस हजार योजन के विस्तार वाला, मोटाई लिए हुए मस्तक अर्थात् शिखर वाला है और यह जम्बूद्वीप के मस्तक पर बत्तीस हजार योजन में फैला हुआ है। मन्दरो हेमकूटश्च निषधश्च श्वेताचलः । भूदण्डवत्प्रमाणाश्च सहस्त्रयोजनोच्छ्रिताः ॥ १० ॥ इस जम्बूद्वीप. में मन्दर, हेमकूट, निषध तथा श्वेताचल इस भूमि को नापने वाले दण्ड की भाँति है और प्रमाण में एक हजार योजन ऊँचाई के हैं। हिमवान् शृङ्गवांश्चैव नीलो वै गन्धमादनः । प्रमाणं योजनैः ख्यातं सार्धद्वयं समुच्छ्रितेः ॥ ११ ॥ इसी प्रकार हिमवान, शृङ्गवान, नील और गन्धमादन भी प्रमाण में ढाई हजार योजन ऊँचे हैं। मन्दरस्य तुलोदयाक्ष चतुराशी त्रिकूटो द्युतः ?। महाविन्ध्योदयतुल्यः शैलोऽन्यस्त्रिकूटस्तथा ॥ १२ ॥ उच्छ्रयो द्विगुणस्तारात् तदर्ध मध्यतुङ्गता । एवं मानं च शैलानां कथितं त्वपराजित ॥ १३ ॥ मन्दर के तुलोदयाक्ष, चतुराशी, त्रिकूट और द्यूत हैं जो महा विन्ध्योदय के समान है और अन्य पर्वत त्रिकूट तथा ऐसे अन्य ऊँचाई में उनसे दुगुने हैं और ऊँचाई में उनसे आधे हैं। वे मध्यम तुङ्ग अर्थात् मध्यम ऊँचाई के पर्वत है। हे अपराजित ! इस प्रकार का मान मैंने इन पर्वतों का कहा है। मन्दरो गन्धमादश्च याम्योत्तरे च दण्डवत् । हिमवान् हेमकूटश्च पूर्वापरे स्थितौ तथा ॥ १४ ॥ मन्दर, गन्धमादन याम्योत्तर दिशा में लम्बाई में दण्डवत फैले हुए हैं और हिमवान, हेमकूट पूर्वापर लम्बाई में दण्डवत स्थित है। उत्तरे ? नीलनिशधौ श्वेतशृङ्गी पूर्वापरौ ? । कुलाचलाश्च कर्णस्था विदिशोद्भवसागरेः ? ॥ १५ ॥ उत्तर की ओर नील और निषध; श्वेत और शृङ्गी पूर्व व पश्चिम की ओर; कुलाचल और कर्ण विदिशोद्भव होकर सागर के किनारे पर स्थित है। इत्यमनन्तर क्षेत्रसीमाविस्तारमाह — क्षेत्रसीमा प्रमाणाख्यं मेरुमावृत्य दक्षिणेः ।

172 अपराजितपृच्छा शैलान्तरेषु क्षेत्राणि कथयामि समासतः ॥ 16 ॥ अब मैं क्षेत्र सीमाओं का प्रमाण मेरु के चारों ओर दक्षिण के पहाड़ों के अन्तर में पड़ने वाले क्षेत्रों आदि का संक्षेप में कहता हूँ। उदयाद्रिश्च पूर्वे तु त्रिकूटः स्यात्तु दक्षिणे। महाविन्ध्योऽपरे चैवं द्वीपशैलाः पूर्वोत्तरे ॥ 17 ॥ पूर्व की ओर जो उदयाद्रि है और दक्षिण की ओर त्रिकूट पर्वत है तथा महाविन्ध्यों परे भी द्वीपशैल पर्वत पूर्वोत्तर दिशा में है। तेषामन्ते समुद्राश्च संस्थिताः स्युः प्रदक्षिणम्। तेषामन्ते पुनर्द्वीपो द्वीपान्ते चैव सागराः ॥ 18 ॥ इन सब के अन्त में समुद्र संस्थित है जो प्रदक्षिणा करता हुआ-सा प्रतीत होता है। इसके अन्त में पुनः द्वीप है और उन द्वीपों के अन्त में पुनः सागर है। सप्तद्वीपाः समुद्राश्च क्रमेणापि सुसंस्थिताः। जम्बूद्वीपप्रमाणेन द्विगुणा द्विगुणोत्तराः ॥ 19 ॥ इस तरह सात द्वीप और सात सागर क्रमवार बने हुए हैं जो जम्बूद्वीप के प्रमाण से प्रत्येक एक दूसरे से दुगुने होते जाते हैं। इयं युक्तिर्विधातव्या द्वीपे द्वीपे तु शैलजाः ? । संस्थिताः क्रमयोगेन पूर्वापरयाम्योत्तरे ॥ 20 ॥ इस युक्ति से द्वीप-द्वीप में शैल बने हुए हैं जो क्रमवार स्थित है। एक दूसरे के बाद दक्षिण से उत्तर दिशा तक विस्तार में फैले हुए हैं। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां महापर्वतप्रमाणाधिकारो नाम षट्त्रिंशं सूत्रम् ॥ 36 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में महापर्वत प्रमाण अधिकार नामक छत्तीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 36 ॥ विश्वकर्मोवलोकितपृथ्वीनवखण्डानिं सप्तत्रिंश सूत्रम् ॥ 37 ॥ विश्वकर्मोवाच — राजेन्द्रस्य पृथोः पूर्वमष्ट₈ पुत्रा प्रकीर्तिताः । अष्टवर्षाधिपतय आत्मराज्यं तु मध्यतः ॥ 1 ॥ विश्वकर्मा बोले कि पृथु राजा के आठ पुत्र पूर्वकाल में कहे गए हैं जो आठ प्रदेशों के अधिपति बनाए गए और राजा पृथु ने अपना राज्य उन प्रदेशों के

सूत्र-३७ 173 मध्यवाले प्रदेश में रखा था। तद्विभक्तानि क्षेत्राणि क्षारार्णवस्य मध्यतः। शैलान्तरेषु ख्यातानि क्षेत्राणि नव सङ्ख्यया ॥ २ ॥ क्षारार्णव या लवण सागर के मध्य के इन क्षेत्रों को उन पुत्रों में विभक्त करके अलग-अलग पहाड़ों के अन्तर से सीमाबद्ध करके इस प्रकार से अपने राज्य सहित कुल नौ संख्या में क्षेत्रों का निर्माण किया। इलाक्षं दिव्यकं चैव भारतं हरिवर्षकम्। किम्पुरुषः केतुमालः सम्भवो मानदण्डकः ॥ ३ ॥ रम्यकं मध्यक्षेत्रं च मेरुमावृत्य दक्षिणम्। एतानि नवक्षेत्राणि जम्बूद्वीपस्य मध्यतः ॥ ४ ॥ इलाक्ष, दिव्यक, भारत, हरिवर्ष, किंपुरुष, केतुमाल, सम्भव, मानदण्ड और नवाँ रम्यक— इस प्रकार ये सभी मध्य क्षेत्र और मेरु पर्वत की परिक्रमा करके दक्षिण में स्थित थे। ये सभी नवक्षेत्र जम्बूद्वीप के मध्य में थे।¹ मन्दरो हेमकूटाख्यो निषधः श्वेतपर्वतः। एतन्मध्ये रम्यकं च मेरुमावृत्य दक्षिणम् ॥ ५ ॥ मन्दर, हेमकूट, निषध, श्वेतपर्वत और इनके मध्य में रम्यक है। ये सभी मेरुपर्वत के चारों ओर वृत्ताकार होते हुए दक्षिण में स्थित पर्वत है। मन्दरगन्धमादनमध्ये चेलावृतोद्भवः। गन्धमादनोदयाद्रिमध्ये दिव्यकमुच्यते ॥ ६ ॥ मन्दर और गन्धमादन के मध्य में इलावर्त तथा गन्धमादन और उदयाद्रि के मध्य दिव्यक है। हिमवद्धेमकूटान्तर्वर्षो नाम्ना हरिस्तथा। त्रिकूटहिमवन्तर्वर्षो भारत उच्यते ॥ ७ ॥ हिमवत् और हेमकूट के बीच के वर्ष अर्थात् क्षेत्र का नाम हरि है तथा त्रिकूट और हिमवन्त के बीच के वर्ष अर्थात् क्षेत्र का नाम भारत कहा जाता है। निषधनीलयोर्मध्ये किम्पुरुषो नाम्नोत्तमः। नीलाम्बुध्योर्मध्यतश्च केतुमालश्च नामतः ॥ ८ ॥

  1. विष्णुपुराण में आया है— इन्द्रद्वीपः कसेरुश्च ताम्रपर्णो गभस्तिमान् ॥ नागद्वीपस्तथा सौम्यो गन्धर्वस्त्वथ वारुणः। अयं तु नवमस्तेषां द्वीपः सागरसंवृतः॥ (2, 3, 6-7)