अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें172 अपराजितपृच्छा शैलान्तरेषु क्षेत्राणि कथयामि समासतः ॥ 16 ॥ अब मैं क्षेत्र सीमाओं का प्रमाण मेरु के चारों ओर दक्षिण के पहाड़ों के अन्तर में पड़ने वाले क्षेत्रों आदि का संक्षेप में कहता हूँ। उदयाद्रिश्च पूर्वे तु त्रिकूटः स्यात्तु दक्षिणे। महाविन्ध्योऽपरे चैवं द्वीपशैलाः पूर्वोत्तरे ॥ 17 ॥ पूर्व की ओर जो उदयाद्रि है और दक्षिण की ओर त्रिकूट पर्वत है तथा महाविन्ध्यों परे भी द्वीपशैल पर्वत पूर्वोत्तर दिशा में है। तेषामन्ते समुद्राश्च संस्थिताः स्युः प्रदक्षिणम्। तेषामन्ते पुनर्द्वीपो द्वीपान्ते चैव सागराः ॥ 18 ॥ इन सब के अन्त में समुद्र संस्थित है जो प्रदक्षिणा करता हुआ-सा प्रतीत होता है। इसके अन्त में पुनः द्वीप है और उन द्वीपों के अन्त में पुनः सागर है। सप्तद्वीपाः समुद्राश्च क्रमेणापि सुसंस्थिताः। जम्बूद्वीपप्रमाणेन द्विगुणा द्विगुणोत्तराः ॥ 19 ॥ इस तरह सात द्वीप और सात सागर क्रमवार बने हुए हैं जो जम्बूद्वीप के प्रमाण से प्रत्येक एक दूसरे से दुगुने होते जाते हैं। इयं युक्तिर्विधातव्या द्वीपे द्वीपे तु शैलजाः ? । संस्थिताः क्रमयोगेन पूर्वापरयाम्योत्तरे ॥ 20 ॥ इस युक्ति से द्वीप-द्वीप में शैल बने हुए हैं जो क्रमवार स्थित है। एक दूसरे के बाद दक्षिण से उत्तर दिशा तक विस्तार में फैले हुए हैं। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां महापर्वतप्रमाणाधिकारो नाम षट्त्रिंशं सूत्रम् ॥ 36 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में महापर्वत प्रमाण अधिकार नामक छत्तीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 36 ॥ विश्वकर्मोवलोकितपृथ्वीनवखण्डानिं सप्तत्रिंश सूत्रम् ॥ 37 ॥ विश्वकर्मोवाच — राजेन्द्रस्य पृथोः पूर्वमष्ट₈ पुत्रा प्रकीर्तिताः । अष्टवर्षाधिपतय आत्मराज्यं तु मध्यतः ॥ 1 ॥ विश्वकर्मा बोले कि पृथु राजा के आठ पुत्र पूर्वकाल में कहे गए हैं जो आठ प्रदेशों के अधिपति बनाए गए और राजा पृथु ने अपना राज्य उन प्रदेशों के