भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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सूत्र-३७ 173 मध्यवाले प्रदेश में रखा था। तद्विभक्तानि क्षेत्राणि क्षारार्णवस्य मध्यतः। शैलान्तरेषु ख्यातानि क्षेत्राणि नव सङ्ख्यया ॥ २ ॥ क्षारार्णव या लवण सागर के मध्य के इन क्षेत्रों को उन पुत्रों में विभक्त करके अलग-अलग पहाड़ों के अन्तर से सीमाबद्ध करके इस प्रकार से अपने राज्य सहित कुल नौ संख्या में क्षेत्रों का निर्माण किया। इलाक्षं दिव्यकं चैव भारतं हरिवर्षकम्। किम्पुरुषः केतुमालः सम्भवो मानदण्डकः ॥ ३ ॥ रम्यकं मध्यक्षेत्रं च मेरुमावृत्य दक्षिणम्। एतानि नवक्षेत्राणि जम्बूद्वीपस्य मध्यतः ॥ ४ ॥ इलाक्ष, दिव्यक, भारत, हरिवर्ष, किंपुरुष, केतुमाल, सम्भव, मानदण्ड और नवाँ रम्यक— इस प्रकार ये सभी मध्य क्षेत्र और मेरु पर्वत की परिक्रमा करके दक्षिण में स्थित थे। ये सभी नवक्षेत्र जम्बूद्वीप के मध्य में थे।¹ मन्दरो हेमकूटाख्यो निषधः श्वेतपर्वतः। एतन्मध्ये रम्यकं च मेरुमावृत्य दक्षिणम् ॥ ५ ॥ मन्दर, हेमकूट, निषध, श्वेतपर्वत और इनके मध्य में रम्यक है। ये सभी मेरुपर्वत के चारों ओर वृत्ताकार होते हुए दक्षिण में स्थित पर्वत है। मन्दरगन्धमादनमध्ये चेलावृतोद्भवः। गन्धमादनोदयाद्रिमध्ये दिव्यकमुच्यते ॥ ६ ॥ मन्दर और गन्धमादन के मध्य में इलावर्त तथा गन्धमादन और उदयाद्रि के मध्य दिव्यक है। हिमवद्धेमकूटान्तर्वर्षो नाम्ना हरिस्तथा। त्रिकूटहिमवन्तर्वर्षो भारत उच्यते ॥ ७ ॥ हिमवत् और हेमकूट के बीच के वर्ष अर्थात् क्षेत्र का नाम हरि है तथा त्रिकूट और हिमवन्त के बीच के वर्ष अर्थात् क्षेत्र का नाम भारत कहा जाता है। निषधनीलयोर्मध्ये किम्पुरुषो नाम्नोत्तमः। नीलाम्बुध्योर्मध्यतश्च केतुमालश्च नामतः ॥ ८ ॥

  1. विष्णुपुराण में आया है— इन्द्रद्वीपः कसेरुश्च ताम्रपर्णो गभस्तिमान् ॥ नागद्वीपस्तथा सौम्यो गन्धर्वस्त्वथ वारुणः। अयं तु नवमस्तेषां द्वीपः सागरसंवृतः॥ (2, 3, 6-7)