अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें174 निषध और नील के मध्य के क्षेत्र को भी किम्पुरुष उत्तम नाम से जाना जाता है। नीलम्बुध के मध्य में केतुमाल नाम से जाना जाता है। निषधनीलयोर्मध्ये किम्पुरुषः नाम्नोत्तमः । नीलाम्बुध्योर्मध्यतश्च केतुमालश्च नामतः ॥ 9 ॥ उक्त श्लोक पुनर्प्रकाशित हुआ है। श्वेतशृङ्गवतोर्मध्येप्रम्प्यको नाम नामतः । शृङ्गवद् द्वीपशैलान्तर्मानदण्डसमुद्भवः ॥ 10 ॥ श्वेत और शृङ्गव के मध्य क्षेत्र को रम्यक् नाम दिया गया है। शृङ्गवद और द्वीप शैलान्त के बीच मानदण्ड का उद्भव हुआ। शुद्धस्फाटिकसङ्काशा दिव्याभरणभूषिताः । चन्द्रकान्त्यमृताहारा नरा नार्योऽयुतायुषः ॥ 11 ॥ इलावर्ते ज्ञानयुता नरनारीस्वरूपिणः । इन सभी क्षेत्रों के अरबों की संख्या में नर-नारी निवास करते हैं जो सब शुद्ध स्फटिक के समान गौर वर्ण के हैं और ये सभी जन दिव्याभरणों से विभूषित हैं तथा चन्द्रमा के समान शीतल कान्ति युक्त और अमृत का आहार करने वाले हैं। इलावर्त के सभी नर-नारी ज्ञानवान और स्वरूपवान है। अथ दिव्यवर्षवर्णनम् — अथातो दिव्यवर्षं च कथयामि समासतः ॥ 12 ॥ धूलिता भस्माङ्गरागाः क्रूरा उग्रा मलीकृताः । जटामुकुटशोभाढ्या दिव्यक्षेत्रेऽयुतायुषः ॥ 13 ॥ अब मैं दिव्य वर्ष के अर्थात् क्षेत्र के बारे में संक्षेप से कहता हूँ। अङ्ग में भस्म, राग से धूलित, क्रूर स्वभाव के तथा उग्र रूपी मैले-कुचैले, जटामुकुट धरे लोग अरबों की संख्या में दिव्य क्षेत्र में बसते हैं। शतायुषो हरिवर्षे बौद्धाख्या हीनतेजसः । गौरश्यामा नरा नार्यो बुद्धधर्मप्रपालकाः ॥ 14 ॥ सौ वर्ष की आयु पाने वाले बौद्ध नाम से विख्यात्, हीन तेज वाले, कुछ गोरे और कुछ काले श्यामवर्णी नर-नारी बुद्धधर्म को पालने वाले लोग हरिवर्ष में निवास करते हैं। श्यामा गौराश्चतुर्वर्णो भरते च शतायुषः । देवाग्निगुरुभक्ताश्च वेदशास्त्रप्रपारगाः ॥ 15 ॥