भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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पृष्ठ 223

सूत्र- ३७ 175 श्याम वर्णी, गौर वर्णी चारों ही वर्णों के लोग सौ वर्ष तक की आयु तक जीने वाले भारत में रहते हैं। वे सभी देवता, अग्नि और गुरुभक्ति में लीन और वेद शास्त्रादि में पारङ्गत होते हैं। चतुरशीतिविद्यासु सूत्रकर्मसु कौशलाः । धर्मशास्त्रादिनिपुणा भोगयुक्ता विभूतिकाः ॥ 16 ॥ ये सभी चौरासी प्रकार की विद्याओं में तथा सूत्रकर्म-शिल्प में कुशल और धर्म शास्त्रादि में निपुण तथा सभी भोगों से युक्त और विभूतियों से सम्पन्न हैं। नराः श्वेताः किंपुरुषे महारूपास्तथा स्त्रियः । युक्ताः केशाद्यलङ्कारै रमन्ते कामवन्दकाः ॥ 17 ॥ किंपुरुष क्षेत्र के नर-नारी सभी गौरवर्ण और महान् रूपवाले होने से केशादि अलङ्कारों से युक्त रहते हुए तरह-तरह की काम-क्रीड़ा में मौज-मस्ती में रहते हैं। केतुमाले किन्नराणां नार्यो रूपसमन्विताः । सर्वे धर्मरताश्चैव त्रिशतायुष्कजीवनाः ॥ 18 ॥ केतुमाल क्षेत्र में किन्नरगणों की नारियाँ बड़ी रूप-यौवना समन्वित है और सभी धर्मभावना में लीन रहते हुए तीन सौ वर्षों तक की आयु तक जीवित रहते हैं। सम्भवे ब्रह्मतेजस्विवेदशास्त्रादिपारगाः । पञ्चशतवर्षायुषः पद्मरागनिभोदराः ॥ 19 ॥ सम्भव क्षेत्र के निवास ब्रह्मतेज से युक्त होते हैं और वे सभी वेद शास्त्रादि में पारङ्गत होते हैं तथा पाँच सौ वर्षों तक जीवन यापन करने वाले पद्मराग के समान उदर वाले होते हैं। मानदण्डे प्रचण्डाश्च नरा नार्यो ज्ञानोद्भवाः ? । योगीन्द्राश्चायुतायुष्का दिव्या नार्योऽग्नितेजसः ॥ 20 ॥ इसी प्रकार मानदण्ड क्षेत्र के नर-नारी बड़े ही प्रचण्ड और ज्ञानी होते हैं। यहाँ के योगीन्द्र तो अरबों वर्षों की आयुष्य वाले होते हैं। नारियाँ भी अग्नि के तेज के समान दिव्य होती है। रम्यके दिव्यरूपाश्च नरा नारीगणास्तथा । देवलोके तत्पराख्या देवरूपानुरूपकाः ॥ 21 ॥ रम्यक क्षेत्र के नर दिव्यरूप होते हैं। नारियाँ भी वैसी ही होती हैं। देवलोक में तत्परता वाले ये देवरूप के अनुरूप ही होते हैं।