भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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पृष्ठ 219

सूत्र- ३६ 171 योजनैर्दशसाहस्रैः पृथुत्वं मेरुमस्तके। द्वात्रिंशद्भिः सहस्त्रैश्च जम्बूद्वीपस्य मस्तके ॥ ९ ॥ वह दस हजार योजन के विस्तार वाला, मोटाई लिए हुए मस्तक अर्थात् शिखर वाला है और यह जम्बूद्वीप के मस्तक पर बत्तीस हजार योजन में फैला हुआ है। मन्दरो हेमकूटश्च निषधश्च श्वेताचलः । भूदण्डवत्प्रमाणाश्च सहस्त्रयोजनोच्छ्रिताः ॥ १० ॥ इस जम्बूद्वीप. में मन्दर, हेमकूट, निषध तथा श्वेताचल इस भूमि को नापने वाले दण्ड की भाँति है और प्रमाण में एक हजार योजन ऊँचाई के हैं। हिमवान् शृङ्गवांश्चैव नीलो वै गन्धमादनः । प्रमाणं योजनैः ख्यातं सार्धद्वयं समुच्छ्रितेः ॥ ११ ॥ इसी प्रकार हिमवान, शृङ्गवान, नील और गन्धमादन भी प्रमाण में ढाई हजार योजन ऊँचे हैं। मन्दरस्य तुलोदयाक्ष चतुराशी त्रिकूटो द्युतः ?। महाविन्ध्योदयतुल्यः शैलोऽन्यस्त्रिकूटस्तथा ॥ १२ ॥ उच्छ्रयो द्विगुणस्तारात् तदर्ध मध्यतुङ्गता । एवं मानं च शैलानां कथितं त्वपराजित ॥ १३ ॥ मन्दर के तुलोदयाक्ष, चतुराशी, त्रिकूट और द्यूत हैं जो महा विन्ध्योदय के समान है और अन्य पर्वत त्रिकूट तथा ऐसे अन्य ऊँचाई में उनसे दुगुने हैं और ऊँचाई में उनसे आधे हैं। वे मध्यम तुङ्ग अर्थात् मध्यम ऊँचाई के पर्वत है। हे अपराजित ! इस प्रकार का मान मैंने इन पर्वतों का कहा है। मन्दरो गन्धमादश्च याम्योत्तरे च दण्डवत् । हिमवान् हेमकूटश्च पूर्वापरे स्थितौ तथा ॥ १४ ॥ मन्दर, गन्धमादन याम्योत्तर दिशा में लम्बाई में दण्डवत फैले हुए हैं और हिमवान, हेमकूट पूर्वापर लम्बाई में दण्डवत स्थित है। उत्तरे ? नीलनिशधौ श्वेतशृङ्गी पूर्वापरौ ? । कुलाचलाश्च कर्णस्था विदिशोद्भवसागरेः ? ॥ १५ ॥ उत्तर की ओर नील और निषध; श्वेत और शृङ्गी पूर्व व पश्चिम की ओर; कुलाचल और कर्ण विदिशोद्भव होकर सागर के किनारे पर स्थित है। इत्यमनन्तर क्षेत्रसीमाविस्तारमाह — क्षेत्रसीमा प्रमाणाख्यं मेरुमावृत्य दक्षिणेः ।