भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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170 अपराजितपृच्छा इसके क्षेत्रों का क्षेत्रमान तथा इसके पर्वत विशाल मेघों, बादलों जितने बड़े हैं जिनका प्रमाण और उद्भव का मान बताना अत्यन्त दुष्कर है अर्थात् इनका अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता है। जम्बूद्वीपस्य मध्ये तु मेरुश्च पर्वतो महान्। स्थितौ मेरोः पूर्वतश्च मन्दरो गन्धमादनः ॥ ३ ॥ इस जम्बूद्वीप के मध्य में स्थित है महान मेरुपर्वत जिसके पूर्व की ओर मन्दर और गन्धमादन पर्वत है। हिमवान् हेमकूटश्च महोशैलस्य दक्षिणे । पश्चिमे पर्वतौ रम्यौ निषधो नील एव च ॥ ४ ॥ इसी तरह हिमवान, हेमकूट नामक महापर्वत मेरु के दक्षिणी ओर है और मेरु के ही पश्चिम में बड़े सुन्दर निषध और नील पर्वत हैं। श्वेतश्च शृङ्गवांश्चैव मेरोरुत्तरतः स्थितौ । एते चाष्टकुला रम्या दिक्षु चैवं व्यवस्थिताः ॥ ५ ॥ श्वेत और शृङ्गवान पर्वत मेरु के उत्तर में स्थित है। ये सभी पर्वतों के आठों ही कुल बड़े सुन्दर है और अपनी-अपनी दिशाओं में व्यवस्थित है। देशे समुद्रापकण्ठे महाशैलाः पुरोभवाः । उदयाद्रिर्मलाशैलः पूर्वायां च बलादिषु ? ॥ ६ ॥ जम्बूद्वीप के समुद्रों के उपकण्ठ अर्थात् किनारे के प्रदेश में जो महान पर्वत पहले उत्पन्न हुए हैं, उनमें उदयाद्रि नामक जो महाशैल है, वह पूर्व दिशा की ओर विस्तृत है (चलादिषु ?)। वारुण्यां तु महावृद्धस्त्रिकूटाख्यश्च दक्षिणे । उत्तरे द्विपशैलाख्यः संस्थिताः स्युरनुक्रमैः ॥ ७ ॥ जम्बूद्वीप की वारुणी दिशा में महावृद्ध और दक्षिणी दिशा में त्रिकूट पर्वत है तथा उत्तर में द्विपशैलाख्य अर्थात् हाथियों का कदली वन वाला पर्वत है। ये सब अनुक्रम में स्थित है अर्थात् दिशावार अवस्थित है। द्वयष्टसहस्रमध्यस्थः सप्तपातालतो भवः । सपद्मकर्णकाकारैर्मेरुः काञ्चनकन्दरैः ॥ ४ ॥ सोलह हजार के मध्य में सप्तपाताल से उत्पन्न पद्म के सहित कर्णिका दण्डी के आकार में मेरु पर्वत सोने की-सी कन्दरों से युक्त है।