अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-३६ 169 इससे भी ऊँचा महामेरु है जहाँ स्वर्ग इसी प्रकार सम्यक् प्रकार से स्थित है। लोकाश्च सप्त चाख्याता मृत्युलोके द्वीपार्णवाः । पातालाः सप्तधा चैव त्रैलोक्यमिति प्रोच्यते ॥ ३३ ॥ एकविंशतिस्त्रैलोक्ये स्थिताः स्वर्गा यथाक्रमम् । ऊर्ध्व चैव भवस्थानं पात्रे पात्रमिवापरम् ॥ ३४ ॥ सात लोक विख्यात् है। मृत्युलोक में द्वीपार्णवों में पाताल भी सात और इन सबको त्रैलोक्य कहते हैं। इन इक्कीस त्रिलोकों में स्वर्ग क्रमवार स्थित है। ये सभी भवस्थान से ऊपर की ओर ऊपरोपरि इसी प्रकार स्थित हैं जैसे कि कलशों पर कलश होते हैं।¹ मध्ये च जम्बुद्वीपस्य प्रमाणमपि कथ्यते । मेर्वाद्या मुख्यशैलाश्च क्षेत्राणि च समासतः ॥ ३५ ॥ इस जम्बू द्वीप के मध्य का प्रमाण भी कहता हूँ। मेरु से लेकर मुख्य-मुख्य पर्वतों और क्षेत्रों के बारे में भी मैं आगे संक्षेप से कहूँगा। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां मेकविंशतिस्वर्गाधिकारो नाम पञ्चत्रिंशत्तमं सूत्रम् ॥ ३५ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में इक्कीस स्वर्गाधिकार नामक पैंतीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ३५ ॥ महापर्वतप्रमाणं षट्त्रिंशं सूत्रम् ॥ ३६ ॥ विश्वकर्मावाच — जम्बूद्वीपप्रमाणं च विस्तारे लक्षयोजनैः । तस्यान्ते वृत्तपरिधौ समस्तं च क्षीरार्णवम् ॥ १ ॥ विश्वकर्मा बोले— जम्बूद्वीप का प्रमाणतः विस्तार एक लाख योजन का है। इसके अन्तमें चारों ओर वृत्त की परिधि रूप में समस्त क्षीरार्णव है। क्षेत्राणां क्षेत्रमानं च पर्वताश्च मेधोपमाः । महापर्वतोद्द्भवाश्चाप्रमाणा मानवर्जिताः ॥ २ ॥
- यही वर्णन ग्रन्थ के चौथे व अन्य सूत्रों में भी आया है— सप्तोर्ध्वलोकाश्च ख्याता रुद्रभागसमुद्भवाः । स्वर्गश्च मर्त्यपातालौ स्वर्गाणां त्वेकविंशतिः ॥ (अपराजित. 4, 5) अर्थात्— सात ऊर्ध्वलोक जो विख्यात हैं, उनको स्वयं भगवान रुद्र ने ही उत्पन्न किया। इससे हम पाते हैं कि स्वर्गलोक, मृत्युलोक और पाताललोकादि स्वर्गों की संख्या इक्कीस है।