भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 212, कुल 535 में से

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164 अपराजितपृच्छा में भी मुझे समझाया है। अब हे जगत्पते ! आप पुष्पक विमान पर आरूढ़ हो जाएँ और मेरे पर अनुग्रह कर जो कुछ आपने पूर्व में कहा है, उस सब विषयों को मेरे प्रति यहाँ (इस ग्रन्थ के प्रयोजन से) पुनः कृपाकर कहें।¹ पुष्पकं तु समारुह्य मेरुमार्गप्रदक्षिणम्। अवालोकि तथा चैषा समुद्रान्ता च मेदिनी ॥ २० ॥ इस पर पुष्पक विमान पर आरूढ़ होकर मेरुपर्वत के मार्ग से प्रदक्षिणा करते हुए समस्त पृथ्वी को समुद्रपर्यन्त देखते हुए विश्वकर्मा आगे बढ़े। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां जयविजयसिद्धार्थपृच्छाधिकारो नाम चतुस्त्रिंशं सूत्रम् ॥ ३४ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में जय- विजय-सिद्धार्थपृच्छा अधिकार नामक चौंतीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ३४ ॥ एकविंशतिस्वर्गा नाम पञ्चत्रिंशं सूत्रम् ॥ ३५ ॥ विश्वकर्मोवाच — पुष्पकं तु समारुह्य मेरुमाश्रित्य दक्षिणम्। विलोकिता भूतधात्री समुद्रान्ता च मेदिनी ॥ १ ॥ अथातो भूतधात्रीणां प्रमाणं च प्रवक्ष्यते । विष्कम्भः परिधिश्चैव बाहुल्यं (क्षेत्राणां) शृणु ॥ २ ॥ पुष्पक विमान पर आरूढ़ हो, सुमेरु पर्वत के आश्रय से प्रदक्षिणा करते हुए और समुद्रान्त तक के प्राणियों को धारण करने वाली धरती को देखते हुए भगवान् विश्वकर्मा ने कहा कि अब मैं प्राणीमात्र को धारण करने वाली इस पृथ्वी का प्रमाण बताता हूँ। तुम इसके विष्कम्भ या व्यास, परिधि और क्षेत्र के बाहुल्य के बारे में सुनो। पृथ्वीप्रमाणमाह — योजनानि तु विष्कम्भो दशकोट्यः प्रकीर्तितः । लक्षस्याग्रे सहस्राणामेकोनाविंशतिस्तथा ॥ ३ ॥

  1. इस प्रकार इस ग्रन्थ में जयपृच्छा, विजयपृच्छा, सिद्धार्थपृच्छा के समस्त विषयों का वर्णन होना सिद्ध होता है। विमानारूढ़ होकर विषय वर्णन करने से यहाँ आशय ग्रन्थकार के यायावर होकर ग्रन्थ विषयों की संग्राहानुभूति भी सम्भव है। वैसे ग्रन्थकार ने एकाधिक देशों की यात्रा की और वहाँ के भूगोल, परम्पराओं को स्वयं जाना व तदोपरान्त ही उन्हें लिखित रूप दिया।