अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
पृष्ठ 211, कुल 535 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-३४ 163 (इस शास्त्र का सम्बन्ध सङ्गीत विद्या से है जिसमें) तत्, घन, मुरजादि विविध प्रकार के वाद्यों, नृत्य सम्बन्धी लास्य, हास्य, ताण्डव आदि तालमूल से उत्पन्न होने वाले ससस्वर, तीन ग्राम, इक्कीस मूर्च्छना, उनचास तान व स्वरमण्डल, छह राग, छत्तीस रागिनियों का वर्णन किया गया है। यह वर्णन विजय के प्रति 'भरत' के नाम से कहा गया था।¹ मन्दरस्थं सुखासीनं सिद्धार्थः पृष्टवान् पुरा। तालुकण्ठस्वरशास्त्रं गणितं ज्योतिषं तथा ॥ 15 ॥ निघण्टुश्च व्याकरणं छन्दोलङ्कारसंयुतम् । मनुसाध्यसमुद्भूतं संसारपाशछेदनम् ॥ 16 ॥ मुक्तिमार्गरहस्यं च कथितं भक्तवत्सलैः। तुर्योऽयं मानसः पुत्रः पृच्छति त्वराजितः ॥ 17 ॥ पूर्वकाल में मन्दर पर्वत पर सुखासन पर बैठे हुए सिद्धार्थ ने प्रश्न किया था। इस पर जिस ग्रन्थ का कथन हुआ² उसमें तालुकण्ठ से सम्बद्ध स्वरशास्त्र, गणितशास्त्र, ज्योतिषशास्त्र, निघण्टु-शब्दकोष, व्याकरण, छन्दालङ्कार भी रहे हैं। यह ग्रन्थ (सिद्धार्थ पृच्छा) मनुओं, साध्यों द्वारा संसार के सम्बन्धों को काटने (संसारपाश के छेदन) के प्रयोजन से रचा गया। इनमें इन भक्तिवत्सल भक्तों पर कृपा करने वाले महापुरुषों ने मुक्तिमार्ग का रहस्य भी कहकर समझाया है। अब चौथा मानसपुत्र अपराजित यह प्रश्न करता है। ग्रन्थोत्पत्तिवर्णनं, अपराजित उवाच — अस्मच्चित्ते प्रबोद्धव्यं जयाय पृच्छते च यत्। विजयश्च सिद्धार्थश्च पृच्छायां यत्तथैतयोः ॥ 18 ॥ भवान् पुष्पकमारुह्य प्रोक्तवान् यदनुग्रहात्। पूर्वं सर्वं प्रसादेन कथयस्व जगत्पते ॥ 19 ॥ अपराजित ने कहा— आपने कृपाकर मेरे चित्त को प्रबोध किया है। आपने पूर्व में कथित जयपृच्छा और उसी प्रकार विजयपृच्छा तथा सिद्धार्थपृच्छा के विषय
- विजयपृच्छा नामक यह मूल ग्रन्थ वर्तमान में अनुपलब्ध हैं किन्तु नाट्यशास्त्र व उसकी वृत्ति, विष्णुधर्मोत्तर पुराणोक्त नृत्तसूत्राध्याय, सङ्गीतरत्नाकर, सङ्गीतराज, सङ्गीतमकरन्द आदि में उक्त समस्त विषय मिलते हैं।
- सिद्धार्थपृच्छा संज्ञक ग्रन्थ अद्यावधि अनुपलब्ध, असूचित है। ये अधिकांश विषय नारदपुराण के पूर्वभाग में प्रकीर्णित हैं और अग्निपुराण में भी आए हैं। हेमाद्रि के व्रतखण्ड में सिद्धार्थपृच्छा के श्लोक मूर्तिलक्षणों के प्रसंग में उद्धृत हैं।