अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
पृष्ठ 210, कुल 535 में से
संदर्भ में पढ़ें162 अपराजितपृच्छा में भगवान् विश्वकर्मा द्वारा कही गई है।¹ यह विषय-वर्णन पूर्वकाल में जय के भक्तिवात्सल्य के कारण कहा गया था। हेमकृटे महाशैले शतयोजनमुच्छ्रिते । विरूपाख्याश्रमे रम्ये विचित्रशिखरोद्भवे ॥ ९ ॥ नानाद्रुमलताकीर्णो रत्नधातुपशोभिते। सुरविद्याधरारम्ये गन्धर्वगणसेविते ॥ १० ॥ विजयेन ततः पृष्टो वत्साहं भक्तवत्सलः। श्लोका विजयपृच्छायां सहस्राणि च द्वादश₁₂ ॥ ११ ॥ हेमकूट महापर्वत पर, जो कि सौ योजन की ऊँचाई वाला है, उस पर विचित्र मनोहर शिखरों के बीच बना हुआ विरूपाख्य नामक आश्रम बड़ा ही सुन्दर है। वहाँ नाना वृक्ष, लतादि की भरमार है और तरह-तरह के रत्नों, धातुओं से शोभायमान है। वहाँ विजय ने भक्तवत्सल भगवान् विश्वकर्मा से प्रश्न किया कि हे प्रभु! आपका वत्स हूँ। आप मुझे उपदेश करे। इस पर विश्वकर्मा ने जो उपदेश किया, उससे विजयपृच्छा शास्त्र निर्मित हुआ इसमें बारह हजार श्लोक हैं। ततघनमुरजादिवादित्रैर्विविधैस्तथा। लास्यहास्यताण्डवाद्यैस्तालमूलसमुद्भवाः !' ౨ ॥ सप्तस्वरास्त्रयो ग्रामा मूर्च्छनास्त्वेकविंशतिः । ताना एकोनपञ्चाशदित्येतत्स्वरमण्डलम् ॥ १३ ॥ रागाः षट् समुत्पन्नाः षट्त्रिंशच्चैव तत्स्त्रियम्। एतत्सर्वं विजयस्य कथितं भरताभिधम् ॥ 14 ॥
- इस ग्रन्थ का खण्डित पाठ वर्तमान में उपलब्ध है। हेमाद्रि कृत चतुर्वर्गचिन्तामणि में जयोपदिष्ट वास्तु, मूर्ति विषयक श्लोक उपलब्ध होते हैं। जयपृच्छा ग्रन्थ का सम्पादन प्रभाशङ्कर ओघड़भाई सोमपुरा ने किया है किन्तु वह पूर्ण नहीं है। लगभग समस्त श्लोक भ्रष्ट हैं। 'देवतामूर्तिप्रकरण' भी जय-विश्वकर्मा संवाद के रूप में लिखा गया है जिसका सम्पादन डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू' ने किया है। इससे यह सङ्केत मिलता है कि यह ग्रन्थ जयपृच्छा के ही मूर्ति विषयक अधिकार या रूपाधिकार का अङ्ग है। 16वीं सदी में इसके पुनर्सम्पादन का श्रेय चित्तौड़गढ़-कुम्भलगढ़ के सूत्रधार मण्डन के पिता सूत्रधार खेता को दिया जाता है क्योंकि इसमें मस्जिद (रहमानप्रासाद) निर्माण तक के निर्देश मिलते हैं। जयपृच्छा नाम से ही एक अन्य पाठ भी मिलता है, इसका प्रचलन मालवा से हुआ माना जाता है। इसका खण्डित पाठ मिलता है। धाराधिप भोजराज के सूत्रधार मल्लकृत 'प्रमाणमञ्जरी' में उक्त ग्रन्थ का सङ्केत आया है— अथोच्यते सारतरस्य सारं काश्योदयालिन्दसमुद्भवं तम्। मानं समस्तं जयवीक्षदृष्टं सुशिल्पिकं सर्वजनोपकृत्यम्॥ (प्रमाणमञ्जरी 2) चित्तौड़गढ़ के महाराणा कुम्भा (1433-68 ई.) ने कीर्तिस्तम्भ की एक शिला पर स्तम्भराज को उत्कीर्ण करवाया था जिसमें जयकृत ग्रन्थ का उल्लेख है— स्तम्भस्य लक्ष्मानुते नृपालः श्रीकुम्भकर्णो जयभाषितेन॥ (डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू' : प्रासादमण्डनम् की भूमिका)