अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-३४ 161 एवमस्मत् प्रसादं तु कुरु शास्त्रार्थकौशल ॥ २॥ (शिल्पादि आगम शास्त्रों की उत्पत्ति के प्रसङ्ग में कहा गया है) अपराजित बोले— हे जगत्पते ! जयपृच्छागम किस स्थान पर और विजयपृच्छागम किस स्थान पर हुए। इसी प्रकार सिद्धार्थपृच्छागम भी किस स्थान पर हुआ। इस विषय में हे शास्त्रार्थ कौशल गुरुदेव ! हमें आप कृपाकर बताइए। विश्वकर्मोवाच — ततो हिमवतः पृष्ठे ब्रह्मलोकात्समागतौ । शृङ्गाकुले घवनाकीर्णे हिमवन्तश्रीयोद्गवे ॥ ३॥ नैकगुहाश्रमरम्ये गन्धर्वगणसेविते । सिद्धामरकुलाकीर्णे क्रीडामणिगुहागृहे ॥ ४॥ जयः पृच्छति तत्रेदां वास्तुविद्योद्भवं तदा। तदिदं कथनीयं च शृणु संवादमुत्तमम् ॥ ५॥ उस समय हिमालय पर्वत की पीठ पर, पार्श्वभाग पर ब्रह्मलोक से आए हुए (देवादि से), मेघों के समूह से आच्छादित शिखरों के समूहों की शोभा से हिमालय पर्वत की श्रीवृद्धि हो रही थी। वहाँ पर गन्धर्वगणों से सेवित अनेकों रम्य गुहाश्रयों का समूह था जिनमें सिद्धगण, देवतागणों के कुलों के समूह उन मणिगुहागृहों में क्रीड़ा कर रहे थे। ऐसे में वहाँ जय ने वास्तुविद्या के उद्भव के विषय में प्रश्न किया जो यहाँ कहना प्रासङ्गिक है। इसलिए इस संवाद को सम्यक् प्रकार से सुनो। जयपृच्छादीनां परिचयमाह— चतुर्विंशति₂₄ साहस्त्रसङ्ख्यग्रन्थस्तथा कृतः । लिङ्गपीठाचार्चानिलयवेश्मराजवेश्मादिकम् ॥ ६॥ पुरप्राकारपरिखाप्रतोलीमार्गगोपुरम् । अन्योपस्करजातानि वास्तुवेदोद्भवानि च ॥ ७॥ जयपृच्छादिशास्त्रं च विश्वकर्मप्रभाषितम् । जयस्य कथितं चैतद् भक्तित्वात्सल्यतः पुरा ॥ ८॥ (उस ग्रन्थ के विषय में कहा गया है कि) उक्त वास्तुविषयक ग्रन्थ की ग्रन्थ संख्या 24 हजार थी। उसमें लिङ्ग, पीठ, प्रतिमा या अर्च्चा, निलय, वेश्म, राजवेश्मादि, पुर, प्राकार, परिखा, प्रतोली, मार्ग, गोपुर और भी अनेक उपकरण सामग्री जो कि वास्तुवेद के उद्भव में आवश्यक होती है, वे सब जयपृच्छादि शास्त्र