अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें160 अपराजितपृच्छा जय, विजय, सिद्धार्थ और अपराजित नाम से आख्यात मानस पुत्र हिमालय के पार्श्व में भूलोक में आ गए। पृथिवी प्रेषिता स्थाने सम्बोध्य भूतधारिणि । विना कष्टं त्वया ग्राह्यं कारयिष्ये तु निश्चलाम् ॥ 16 ॥ इसके बाद, पृथ्वी को उस प्रेषित स्थान में सम्बोधित किया कि हे पृथ्वी ! तुम प्राणिमात्र को धारण करने वाली हो, यह बात तुम्हें बिना किसी कष्ट के ग्राह्य होनी चाहिए अर्थात् तुम्हें स्वीकार लेनी चाहिए इसका तुम निश्चलमना होकर पालन करोगी। नृपश्च प्रेषितः स्थाने पृथुः सम्बोधितस्तथा । यथामरावती चैव त्वदर्थे मेदिनी कृता ॥ 17 ॥ पृथो चागम्य स्वस्थाने यावत्त्वं पालयेर्महीम् । निर्जलान् सजलान् देशांस्तावत्त्वमवलोकय ॥ 18 ॥ पुष्पकेऽस्माकमारुह्य मेरुमावृत्य दक्षिणम् । आलोकय भूतधात्रीमासमुद्रान्तमेदिनी ॥ 19 ॥ राजा पृथु को भी प्रेषित स्थान पर पहुँचने पर ब्रह्मा ने सम्बोधित करते हुए कहा कि हे पृथुराजा ! तुम्हारे लिए ही आज हमने इस मेदिनी को अमरावती के समान बना दिया है इसलिए हे पृथु अब तुम स्वस्थान को जाओ और जब तक तुम इस पृथ्वी का पालन करते रहोगे, तब तक तुम पाओगे कि तुम्हारे जो स्थान निर्जल थे, वे सजल हो गए हैं। अब तुम हम सब लोगों को पुष्पक विमान पर आरूढ़कर मेरुपर्वत के चारों ओर घूमकर दक्षिण की ओर ले चलो और इस समस्त पृथ्वी को, जो कि प्राणीमात्र की माता के रूप में आसमुद्रान्त विस्तृत है, देख सको। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां पृथुपृथिवीसंवादे विश्वकर्मभूलोकागमनाधिकारो नाम त्रयस्त्रिंशत्तमं सूत्रम् ॥ 33 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में पृथु-पृथ्वी संवाद में विश्वकर्मा के भूलोकगमन अधिकार नामक तैंतीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 33 ॥ जयविजयसिद्धार्थपृच्छा नाम चतुस्त्रिंशं सूत्रम् ॥ 34 ॥ अपराजित उवाच - जयपृच्छागमश्चैव कस्मिन् स्थाने जगत्यते । विजयपृच्छागमश्च कुत्रस्थाने बभूव च ॥ 1 ॥ सिद्धार्थपृच्छागमश्च किं स्थाने च तथाभवत् ।