अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
पृष्ठ 205, कुल 535 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र- ३३ 157 पृथुपृथिवीसंवादे भूर्लोके विश्वकर्मागमनं त्रयस्त्रिंशं सूत्रम् ॥ ३३ ॥ विश्वकर्मोवाच — शृणु वत्स महाप्राज्ञं संवादं च पृथोः क्षितेः । जम्बूद्वीपे पृथो राज्यमेकच्छत्रं समस्तकम् ॥ १॥ तेनावलोकिता चैव समुद्रान्ता च मेदिनी । पर्वतैः स्थलजैः सर्वैः सूत्रारम्भे समीकृता ॥ २॥ रसवा सर्वबीजानि ह्यात्मन्येव धृतानि च। प्रजाश्च क्लेशितास्तस्माद् गृहीतात्मेच्छया तु सा ॥ ३॥ तदुच्छेदे समारब्धे निःसृता सा भयातुरा । ततः पृथ्वी भयोद्विग्ना पृथोश्च पृथिवीपतेः ॥ ४॥ विश्वकर्मा बोले — हे महाप्रज्ञ बुद्धिमान वत्स! पृथुराज का संवाद सुनो। समस्त जम्बूद्वीप पर पृथुराजा का एकछत्र सार्वभौमिक राज था। उनकी देखी गई समस्त भूमि को समुद्रान्त तक पर्वतों-पहाड़ियों की उबड़-खाबड़ स्थिति को सूत्रता, समतलता, समान सतह की बना दी गई थी (ताकि वहाँ कृषि-कार्य सरलता से हो सके) ।¹ उस धरा पर सब प्रकार के बीजों को स्वयं अपने हाथ में लेकर प्रजा के क्लेश निवारणार्थ उन्होंने पृथ्वी को अपनी इच्छा के वशीभूत कर उसको इकसार करने को प्रवृत्त हुए तो वह पृथ्वी निःश्वास छोड़ते हुए भयातुर होकर और भय से उद्विग्न होकर पृथुराजा के पास पहुँची। पृथ्वी उवाच — तथागताऽब्रवीत्तत्र यत्र तौ परमेश्वरौ । रक्ष रक्ष महाभूत त्वमेव शरणं प्रभो ॥ ५॥ पास आकर पृथ्वी बोली— आप मेरे परमेश्वर हो, मेरी रक्षा करो, रक्षा करो। हे प्रभु ! आप ही मेरे लिए उपयुक्त शरण स्थल हो।
- विष्णुपुराण में कहा गया है कि पृथु ने अपने धनुष की कोटि से सैकड़ों-हजारों पर्वतों को उखाड़ा व उन्हें एक ही स्थान पर इकट्ठा कर दिया। इससे पूर्व पृथ्वी के समतल न होने से पुर और ग्राम आदि का कोई नियमित विभाग नहीं था। उस समय अन्न, गोरक्षा, कृषि और व्यापार का कोई क्रम नहीं था। यह सब वेनपुत्र पृथु के समय से ही आरम्भ हुआ है— तत उत्सारयामास शैलान् शतसहस्रशः। धनुष्कोट्या तदा वैन्यस्तेन शैला विवर्द्धिताः ॥ न हि पूर्वविसर्गे वै विषमे पृथिवीतले । प्रविभागः पुराणां वा ग्रामाणां वा पुराऽभवत् ॥ न सस्यानि न गोरक्ष्यं न कृषिर्न वणिक्पथः। वैन्यात्प्रभृति मैत्रेय सर्वस्यैतस्य सम्भवः ॥ (विष्णु. 1, 13, 82-84)