अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
पृष्ठ 204, कुल 535 में से
संदर्भ में पढ़ें156 अपराजितपृच्छा इत्युक्त विष्णुमाख्यातं विश्वकर्म प्रकथ्यते । पक्षिराजं समारुह्य शङ्खशाङ्गिदिधारिणम् ॥ २० ॥ सप्तकोटिगणैर्युक्तविमानैश्च सङ्कुलम्। सिद्धचारणगन्धर्वैर्ऋषिभिः परिवेष्टितम् ॥ २१ ॥ सुरदुन्दुभिसंनादैर्नैकवादित्रसङ्कुलम्। पुष्यकैश्छत्रमाच्छाद्यं पृथिव्यान्तक्षीरार्णवम् ॥ २२ ॥ अकस्मादागतो विष्णुर्ब्रह्मलोकेऽमृतार्णवात्। गन्धमादनशैलेन्द्रे विश्वकर्मा जगत्पतिः ॥ २३ ॥ ऐसा विष्णु द्वारा कहा प्रसिद्ध है।¹ विश्वकर्मा इसको ही पुनः कहते हैं कि विष्णु भगवान् शङ्ख-शार्ङ्गधनुषादि धारण करके पक्षीराज गरुड़ पर आरूढ़ होकर सात करोड़ गणों को साथ लेकर, जो कि विमानों के समूहों में आए थे और जिनमें सिद्ध, चारण, गन्धर्व ऋषिगण बैठे हुए थे और उन सबसे घिरे हुए स्वर्ग के दुन्दुभि आदि के निनाद से और अनेकानेक वाद्यों के समूह पुष्पक विमान के छत्र के नीचे आच्छादित होकर पृथिवी के अन्त में क्षीरसागर में अकस्मात् आ गए। इस प्रकार विष्णु और ब्रह्मलोक के अमृतसागर से विश्वकर्मा जगत्पति के प्रभाव से पुष्पक विमान द्वारा तत्काल पृथिवी के अन्तिम क्षेत्र में स्थित सागर में गन्धमादन पर्वत पर आकर उतरे। पुनः पृच्छति तं पुत्रः कनिष्ठस्त्वपराजितः । विश्वकर्मा पुनर्वाक्यं श्रुत्वोवाच मुनीन्द्रकः ॥ २४ ॥ तब उन्हें पुनः उनके कनिष्ठपुत्र अपराजित ने प्रश्न प्रारम्भ किए और विश्वकर्मा ने उनको सुनकर हे मुनीन्द्रक ! पुनः उत्तर देने आरम्भ किए। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां विश्वकर्मावतारधिकारो नाम द्वात्रिंशत्तमं सूत्रम् ॥ ३२ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में विश्वकर्मा अवतार नामक बत्तीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ३२ ॥
- यहाँ सम्भवतः 'विष्णुपुराण' की ओर सङ्केत है। पराशरकृत इस पुराण में कहा गया है कि महाराज पृथु अपरा आजगव नामक दिव्य धनुष और दिव्य बाण लेकर क्रुद्ध होते हुए पृथ्वी के पीछे दौड़े। तब भय से व्याकुल होकर पृथ्वी गौ का रूप धारण कर भागी और ब्रह्मलोकादि में पहुँची— ततस्तु नृपतिर्दिव्यमादायाजगवं धनुः । शरांश्च दिव्यान्कुपितः सोन्वधावद्वसुन्धराम् ॥ ततो ननाश त्वरिता गौर्भूत्वा च वसुन्धरा । सा लोकान्ब्रह्मलोकादीनान् सन्त्रासादगमन्मही । यत्र यत्र ययौ देवी सा तदा भूतधारिणी । तत्र तत्र तु सा वैन्यं ददृशेऽभ्युद्यतायुधम् ॥ (विष्णु. 1, 13, 69-71)