भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 206, कुल 535 में से

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पृष्ठ 206

158 अपराजितपृच्छा पृष्ठतश्च ततः प्राप्तः पृथुर्बाणधनुर्धरः । ब्रह्मणश्चाग्रतः स्थित्वा धनुर्बाणौ निवेदितौ ॥ ६ ॥ भूराज्यं च समस्तं च ह्यर्पितं ते हितैषिणः । अस्माभिश्च परित्यक्ता सम्प्राप्ता चाऽत्र मेदिनी ॥ ७ ॥ धनुर्बाणौ स्वर्पयित्वा पृथुस्त्वं पृथिविपतिः । मा भीस्त्वं वत्स राजेन्द्र राज्यं च तव मेदिनी ॥ ८ ॥ राजा पृथ्वी के पीछे (आजगव नामक) धनुष-बाण लिए आ रहे थे परन्तु उन्होंने ब्रह्माजी को आगे खड़ा हुए देखा तो अपने धनुर्बाण ब्रह्मा को समर्पित कर दिए तब उन्होंने पृथुराजा से कहा कि तुम्हारे हितैषी होकर ही तो समस्त भू राज्य को हमने परित्याग करके तुम्हें अर्पित कर दिया था। इसी कारण यह मेदिनी तुम्हें आज तुम्हें प्राप्त हुई है। इसलिए हे पृथुराजा, तुम धनुष-बाण को समर्पित करके भयभीत मत होना क्योंकि हे वत्स ! राजेन्द्र पृथु अभी भी तेरा यह राज्य और तेरी ये पृथ्वी तेरी ही है। धरित्री कम्पिता तत्र ब्रह्मा प्रोवाच सान्त्वयन् । मा भीर्धरे च पुत्री त्वं ज्ञातं कष्टं निवेदितम् ॥ ९ ॥ पृथो शृणु त्वं राजेन्द्र स्वयं रुद्रस्तु विश्वकृत् । करिष्यति द्वयोर्योग्यं धात्री स्यादमरावती ॥ १० ॥ इस पर ब्रह्मा ने धरती को कम्पायमान देखकर उसे ढाढ़स बंधाते हुए कहा कि हे पुत्री धरा ! डरो मत। तुम्हें जो भी कष्ट हो, वह पूरी तक मुझसे कहो। हे राजेन्द्र पृथु ! तुम सुनो कि स्वयं रुद्रावतार विश्वकृत विश्वकर्माजी तुम्हारे और पृथ्वी के दोनों के बीच का निस्तारण बड़ी चतुराई के साथ करवा देंगे जिससे तुम्हारी यह धरती अमरावती (इन्द्रपुरी) के समान हो जाएगी। त्वत्पार्श्वे पुत्रि बीजानि तिष्ठन्त्वाकल्पमेव च । विषया रक्षणीयाश्च विश्वेश्वर तथा त्वया ॥ ११ ॥ पालनीयावुभौ त्वेवं पृथू राजा च मेदिनी । विश्वज्ञ हस्तकर्तस्त्वं श्रियमाधत्स्व चेतयोः ॥ १२ ॥ इसके बाद, उन्होंने धरती को सम्बोधित करते हुए उसे आश्वस्त किया कि हे पुत्री ! तेरे पास रखे गए समस्त बीज कल्पों तक विद्यमान रहेंगे।¹ इसलिए ये कृषि

  1. अराजकता की स्थिति में पृथ्वी ने समस्त ओषधियों, बीजों को अपने में लीन कर लिया था, ऐसे में प्रजा क्षीणकाय हो गई— अराजके नृपश्रेष्ठ धरित्या सकलौषधीः । प्रस्तास्ततः क्षयं यान्ति प्रजाः सर्वाः प्रजेश्वर। त्वत्तो वृत्तिप्रदो धात्रा प्रजापालो निरूपितः । देहि नः क्षुत्परीतानां प्रजानां जीवनौषधीः ॥ (विष्णु. 1, 13, 67-68)
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