भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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166 अपराजितपृच्छा अधस्तात्तु तथा द्व्यष्टसहस्रैर्योजनैर्गतः । मेरुर्वै चतुरशीतिसहस्रयोजनोच्छ्रितः ॥ 11 ॥ पृथगेकैकपाताले नवनागकुलानि च। नवकानि सप्त चेत्थं त्रिषष्टिः₆₃ कुलपन्नगाः ॥ 12 ॥ इन नीचे वाले पातालों में सोलह हजार योजन तक जाने पर मेरु चौरासी हजार योजन ऊँचा उठा। इन पातालों में भी एक-एक पृथक् पाताल में नौ नागों के कुल कहे गए हैं और इनके भी इसी तरह सातों पातालों में 9 × 7 के हिसाब से नागों के कुल 63 कुल होते हैं। नागकुलनामश्च — प्रोक्तानि पृथगेवं च नवनागकुलानि च। उरगाः सप्तपातालसंस्थिताः सप्त₇ वै क्रमात् ॥ 13 ॥ पद्मः कर्कोटकश्चैव पुण्डरीकोऽथ तक्षकः । आनकः शङ्खचूडश्च वासुकिः सप्तमस्तथा ॥ 14 ॥ इस प्रकार पृथक् रूप में नौ नागकुल कहे गए हैं। सात पातालों में संस्थित सात उरग या नागों के क्रमानुसार नाम हैं— (1.) पद्म, (2.) कर्कोटक, (3.) पुण्डरिक, (4.) तक्षक, (5.) आनक, (6.) शङ्खचूड और सातवाँ (7.) वासुकि। सप्तपातालाधिराजा महोत्कटमहाबलाः । रौद्राश्च विद्रुताः सर्व्वे ह्यगम्या वीरविक्रमाः ॥ 15 ॥ उक्त सभी सातों ही पातालों के अधिराज है और बड़े ही विकट, महाबलवान हैं। ये सभी बड़े भयानक, बड़े तीव्रगामी और इतने वीर विक्रम हैं कि इनको कोई पार नहीं पा सकता। तले तु पद्मको राजा वितले स्यात्कर्कोटकः । सुतले पुण्डरीकश्च नितले स्यात्तु तक्षकः ॥ 16 ॥ तलातले आनकश्च शङ्खचूडो रसातले। वासुकिर्नागराजन्द्रः पाताले सर्वतोऽधिपः ॥ 17 ॥ एकैके नवकुलकास्त्रिषष्टिः₆₃ कुलपन्नगाः । तल का राजा पद्मक₁ है, वितल का राजा कर्कोटक₂, सुतल का पुण्डरिक₃, नितल का तक्षक₄, तलातल का आनक₅, रसातल का शङ्खचूड़₆ तथा वासुकि, नाग राजेन्द्र पाताल में सबके अधिपति कहे गए हैं। इस प्रकार एक-एक नौकुलों के तिरेसठ नागकुल होते हैं।