भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 215, कुल 535 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 215

सूत्र-३५ 167 धरत्र्यां द्वीपनामानि — सप्तपातालतश्चोर्ध्वं द्वीपाः स्युर्द्वीपतः परे ॥ 18 ॥ जम्बूः प्लक्षः कुशः क्रौञ्चः शाकः शाल्मलिकस्तथा । सप्तमः पुष्कराख्यश्च सप्तद्वीपा तु मेदिनी ॥ 19 ॥ इन सात पातालों के ऊपर कई द्वीप हैं और इन द्वीपों के ऊपर ( 1. ) जम्बू, ( 2. ) प्लक्ष, ( 3. ) कुश, ( 4. ) क्रौञ्च, ( 5. ) शाक, ( 6. ) शाल्मलि तथा ( 7. ) पुष्कर द्वीप है। इसी प्रकार यह पृथ्वी सप्तद्वीपा कही गई है। नृपाभिधानतः प्रोक्तं सप्तद्वीपाभिधानकम् । पुष्कराख्यो महाराजा द्वीपे सप्तमकेऽधिपः ॥ 20 ॥ गोमेदेशश्च गोमेदः शाल्मलिके च शाल्मलिः । शाकस्तु शाकद्वीपेशः क्रौञ्चः क्रौञ्चाधिपस्तथा ॥ 21 ॥ कुशेशस्तु कुशः प्रोक्ता महोत्कटो महाबलः । अब इन सात द्वीपों के क्रमवार नृपों के नामों के विषय में कहता हूँ। सातवाँ द्वीप पुष्कर नाम का है जिसके अधिपति महाराज पुष्कर है। गोमेद द्वीप के राजा गोमेद, शाल्मलि द्वीप के शाल्मलि, शाक द्वीप के शाक और क्रौञ्च द्वीप के क्रौञ्च अधिपति है। कुशद्वीप का अधिपति कुश नाम से है जो बड़ा ही विकट और महाबलवान है। महाविक्रमभूपालाः संस्थिता मेरुदक्षिणम् ॥ 22 ॥ मेरुदक्षिणकुक्षौ च महाजम्बुतरूद्भवः । यस्य नाम्ना तु विख्यातो जम्बुद्वीपः स उच्यते ॥ 23 ॥ इस मेरु के दक्षिण कुक्षों में महापराक्रमी राजा बसे हुए हैं। मेरु के दक्षिण में एक महान् जम्बूतरी या जामुन का वृक्ष है। इसी के नाम से विख्यात् होने से इसको जम्बू द्वीप कहा जाता है (जैसा कि वायुपुराण में भी आया है)। एकछत्रं पृथो राज्यं जम्बुद्वीपे प्रकीर्तितम् । क्षीरार्णवमध्ये चेवं पृथुत्वं लक्षयोजनः ॥ 24 ॥ इस जम्बू द्वीप का एक छत्र राजा पृथु के नाम से विख्यात है। यह जम्बू द्वीप क्षीरार्णव के बीच में एक लाख योजन के विस्तार वाला है। समस्ताः समभूयास्तु प्रयुक्ता द्वीपसागराः । अभिधानानि चैतेषां कथ्यन्ते त्वपराजित ॥ 25 ॥