अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंxxiii जिसमें भाव पुरातन थे और विचार नए रूप में थे, यह ग्रन्थ लिखा गया। यह पश्चिमोत्तर भारत में गुर्जर-गुहिल काल में प्रवर्तित प्रवृत्तियों का ग्रंथन है जिसमें कला का प्रवाह कुछ आहत हुआ, शिल्पी समुदाय सताया गया, उन्हें ग्रामादि से विमुख किया गया था और तब उन्हें एक शास्त्र की जरूरत पड़ी। दिक्पालों को विशेष प्रतिष्ठा देने के लिए चारभुजा सहित मूर्त्यांकन किया गया — यह पश्चिमी भारत के राजाओं और राजन्यशक्ति की अभिवृद्धि के ध्येय का भी सूचक है क्योंकि इसी ओर से अरबों की आक्रमणकारी गतिविधियाँ निरन्तर थी और दिक्पाल के रूप में राजाओं को सशक्त करने का विचार शिल्पियों के मानस में भी जन्म ले चुका था। फिर प्रतिहार युगीन शिल्प के शिखर अल्पवय में ही झूलते दिखाई दे रहे थे। ऐसे में रेखावर्णन का विन्यास किया गया — अपराजितपृच्छा की रचनात्मक पृष्ठभूमि में इन बातों का भी विचार किया जाना चाहिए। ऐसे ही विभिन्न वर्णनों के आधार पर इस ग्रन्थ का रचनाकाल 12वीं सदी निर्धारित होता है। प्रो. ढाकी ने भी ऐसे ही प्रमाणों की बुनियाद पर विभिन्न मारु- गुर्जर शिल्प ग्रन्थों का परीक्षण करते हुए इसे कुमारपाल चालुक्य की शासनावधि की देन सिद्ध किया है। इस प्रसङ्ग में कुमारपाल के अभिन्न, मन्त्रियों में प्रधान गुरु भावबृहस्पति ने इस काल में जीर्णोद्धार के कार्यों को प्रमुखता दी। कुमारपाल ने उसे अपनी मुद्रा, कोष और सर्वस्व दे दिया और कहा कि जाओ एवं देवपत्तन के तीरन (देवसमुद्र-तटवर्ती) मन्दिरों का जीर्णोद्धार करवाओ। वहाँ उत्सव हुआ, प्रथमतः चन्द्रमा ने स्वर्णमन्दिर खड़ा किया, फिर रावण ने चाँदी का मन्दिर बनवाया। बाद में कृष्ण, भीमदेव ने इसका पुनर्निर्माण करवाया। इसमें जवाहरात जड़वाए। एक बार पुनः कुमारपाल के प्रयासों से यह मेरु संज्ञक प्रासाद के समान बनाया गया...। इसे भावबृहस्पति ने कैलास के समान बनवा दिया और राजा को अपने कार्यों के अवलोकन के लिए आमन्त्रित किया। कुमारपाल ने जब उनको देखा तो प्रशंसापूर्वक कहा कि मेरा हृदय आनन्दित है, मैं तुम्हें और तुम्हारी सन्ततियों को मेरे राज्य में प्रधानता प्रदान करता हूँ। जैसा कि 1169 ई. के एक अभिलेख में आया है— एवं राज्यमनारत विदधति श्रीवीरसिंहासने श्रीमद्दीरकुमारपालनृपतौ त्रैलोक्यकल्पद्रुमे। गण्डो भावबृहस्पतिः स्मररिपोरुद्वीक्ष्य देवालये जीर्णं भूपतिमाह देवसदनं प्रोद्धर्तुमेतद्वचः॥