भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 21, कुल 535 में से

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पृष्ठ 21

xxii पर प्रकट होने की सूचना दी है। ऐसा प्रतीत होता है कि यदुवंश में माण्डलिक राजा के गुरु हेमाचार्य ने उक्त पर्वत पर नेमिनाथ या नेमनाथ की मूर्ति प्रतिष्ठित की थी। (कर्नल जेम्स टॉड कृत पश्चिम भारत की यात्रा, जोधपुर 1965, परिशिष्ट पृ. 540) कदाचित इसी प्रसङ्ग को अतिशयोक्ति के रूप में ग्रन्थकार ने दिया हो। इस उज्जयन्त पर्वत के श्रीनेमिनाथ मन्दिर का जीर्णोद्धार विक्रम संवत् 1333 (1276 ई.) के ज्येष्ठ की चतुर्दशी को हुआ था। संवत् 1227 (1170 ई.) के एक अभिलेख में आया है कि तब तक नेमीश्वर तीर्थ बहुत प्रसिद्ध हो चुका था और अनेक प्रकार के ऐसे रत्नों से विभूषित था जिनको धनिक व्यापारी दूर-दूर के समुद्र-तटों से लेकर आए थे। इससे पूर्व संवत् 1204 (1147 ई.) के फाल्गुन मास की षष्ठि, बुधवार के तेजपाल और बसन्तपाल बन्धुओं द्वारा स्थापित एक लेख में कहा गया है कि पवित्रता के सागर के समान यदुवंश में इन्दु नेमीश्वर हुए जिनके चरण कमलों का अनुसरण करते हुए परमोच्च उज्जयन्ति तक चढ़कर यदुवंशियों के समूह के समूह युग-युग से नेमिनाथ के चरणों में शीश नवाते आए हैं। (वही, पृष्ठ 524-526) इस प्रकार अपराजितकार इससे पूर्व हो चुका था और तब तक गिरनार पर नेमिनाथ- तीर्थ की मान्यता का विकास हो चुका था। अन्तःसाक्ष्य के अन्तर्गत ही ग्रन्थकार ने महाग्रावभी रत्नकूट, मेरुतिलकादि संज्ञक जिन देवालयों के स्वरूपों का वर्णन किया है, वे अन्यान्य वास्तु विधियाँ 12वीं सदी के पूर्वार्द्ध तक समाज में प्रचलित थी। इनमें से कई नाम वलभी संवत् 850 तद्नुसार 1169 ई. के कुमारपाल चालुक्य के एक अभिलेख में आए हैं। यथा— बस्तियों में ब्रह्मपुर, राजाओं के मण्डल, यतियों के मठ, नृपशाला, कूपिका, रौप्यप्रणाल, मण्डुकासन, पट्टशालिका, सोपान, महागृह, वापिका आदि मुख्य हैं। मन्दिरों के लिए कैलाश-शैल के समान जैसी तुलनाएँ आई हैं। मेरु के समान मन्दिर को खड़ा करवाना, जीर्णोद्धार कार्य की प्रशंसा, देवालयों पर स्वर्ण-कलश की स्थापना, जल-कुल्याएँ बनवाना और देव प्रतिमाओं के लिए सिंहासन निर्माण जैसे प्रसङ्ग तत्कालीन परम्परानुसार अपराजितपृच्छा में आए हैं। फिर, तब तक सोमनाथ-प्रभास क्षेत्र का महत्व उजागर हो चुका था। अपराजितकार ने विस्तार से सोमनाथ का वर्णन किया है। वहाँ तब शिल्पियों का बृहद् समूह विद्यमान था और उक्त मन्दिर के लिए विशिष्ट कार्य के सम्पादक होने के कारण उनकी ख्याति सोमनाथपुरवासी होने से सोमपुरा के रूप में ख्यातिलब्ध हुई। ऐसा प्रतीत होता है कि संक्रमण युग में जबकि कला की काया ऐसे दौर में थी