भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 20, कुल 535 में से

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xxi गुजरात के राजा कुमारपाल चालुक्य (1140-1174 ई.) का चरित्र भी स्कन्दपुराण में (ब्राह्मखण्ड, धर्मारण्य माहात्म्य अन्तर्गत) स्थान पा चुका था। यह सङ्केत स्कन्दपुराण के स्वरूप को लेकर विद्वानों के उन प्रश्नों का उत्तर भी देता है कि इस पुराण के दो स्वरूप है—संहितात्मक और खण्डात्मक; यह पुराण वर्तमान में खण्डात्मक (माहेश्वरखण्ड, वैष्णव, ब्राह्म, काशी, आवन्त्य, नागर एवं प्रभास) ही मिलता है जबकि संहितात्मक स्कन्दपुराण से केवल 'सूतसंहिता' लब्ध होती है शेष सनत्कुमारसंहिता, शाङ्करी, वैष्णवी, ब्राह्मी एवं सौरसंहिता अनुपलब्ध है। महामहोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्री का कथन है कि संहितात्मक स्कन्दपुराण की एक प्रति नेपाल दरबार पुस्तकालय में 7वीं सदी की प्राप्त होती है। प्रो. पी. वी. काणे ने इस समस्या के उत्तर में कहा है कि यह स्कन्दपुराण 7वीं सदी के पूर्व नहीं रखा जा सकता है और न ही नवीं सदी के पश्चात् का हो सकता है। (धर्मशास्त्र का इतिहास खण्ड 4, पृष्ठ 428) इन मतों के विपरीत अपराजितकार के सङ्केत और कुमारपाल चरित्र का इस पुराण में मिलना इसे 12वीं सदी तक ले जाता है। कुमारपाल चालुक्य के चरित्र-मूलक ग्रन्थों पर विश्वास करें तो सहज विश्वास होता है कि गुर्जर-चालुक्य चक्रवर्ती इस नृपति के जीवन प्रसङ्गों को समकालीन और परवर्ती विद्वानों को बहुत प्रभावित किया। तभी तो अज्ञातकर्तृक ने पुरातन संक्षिप्त कुमारपालदेव चरित की रचना की, सोमतिलक सूरि ने कुमारपालदेवचरित रचा, जिनमण्डन ने कुमारपाल प्रबन्ध लिखा, किसी अन्य ने कुमारपाल-प्रतिबोध की रचना की। इसी प्रकार चतुरशीतिप्रबन्ध में कुमारपालदेवप्रबन्ध का निबन्धन किया वहीं हीरकलश, देवप्रभगणि, ऋषभदास व जिनहर्ष ने कुमारपालरास नाम से पृथक्-पृथक् काल में कृतियों का प्रणयन किया तो सोमप्रभाचार्य ने कुमारपालप्रतिबोध को उद्धृत किया। तीर्थकल्प, मोहपराजय नाटक, प्रभावकचरित्र, प्रबन्धचिन्तामणि, उपदेशतरङ्गिणी, उपदेशप्रसाद सहित कई प्रशस्तियों में कुमारपाल का वर्णन आया है। (कुमारपालचरित्र संग्रह, सिंघी जैन ग्रन्थमाला, क्रमाङ्क 41) इसी प्रकार चित्रकूट (चित्तौड़गढ़) के समीधेश्वर महादेव मन्दिर से उसका शिलालेख 1141 ई. का मिला है। उस समय तक वह शैव मतावलम्बी था और विक्रम संवत् 1216 के मार्गशीर्ष की शुक्ल पक्ष की द्वितीया (दिसम्बर 1160 ई.) को कुमारपाल ने जैनधर्म स्वीकार कर लिया था, जैसा कि प्रो. पीटर पीटर्सन का मत भी है। अपराजितकार उस समय के जैनधर्म के प्रसार-प्रभाव से अनभिज्ञ नहीं था। उसने यदुवंशी श्रीकृष्ण के नेमिनाथ के रूप में गिरनार-रैवताचल या उज्जयन्त पर्वत

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