अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंxx रचनाकाल 12वीं सदी के समापन से पूर्व का ही निर्धारित होता है। यही स्थिति मण्डपादि में स्वास्तिकाकार संवराणाओं की हैं जो कि उक्त अवधि में ही गुजरात, राजस्थान सहित मध्य भारत में प्रचलित रही हैं। चतुर्भुजी दिक्पालों की मूर्तियाँ और उनमें आयुध-न्यास का जो वर्णन अपराजितकार ने किया है, वह 11वीं सदी और अधिकतम 12वीं सदी में गुजरात में निर्मित देवालयों में ही सामने आता है। (उपर्युक्त) उक्त विवरणों से स्पष्ट होता है कि यह ग्रन्थ 11वीं-12वीं सदी के मध्य आकार ले चुका था। चूँकि इस ग्रन्थ पर 'समराङ्गणसूत्रधार' का पूरा प्रभाव है, ऐसे में यह ग्रन्थ समराङ्गण के रचयिता धाराधिप भोजराज (1010-1053 ई.) के बाद ही अस्तित्व में आया होगा। प्रो. ढाकी ने अपराजितपृच्छा पर समराङ्गणसूत्रधार के प्रभाव की चर्चा अपने एक आलेख में की है (द इन्फ्लुएंस ऑफ समराङ्गणसूत्रधार ऑन अपराजितपृच्छा, जर्नल ऑफ ओरियण्टल इंस्टीट्यूट, भाग 10, पृष्ठ 231- 234) किन्तु, यह भी प्रतीत होता है कि समराङ्गण व अपराजित दोनों ही ग्रन्थों के सामने कोई अन्य विश्वकर्मीय ग्रन्थ भी रहा होगा और उसी से इन ग्रन्थकारों ने सामग्री और विषय को उद्धृत किया है। समराङ्गणसूत्रधार के पहले ही अध्याय में विश्वकर्मीय ग्रन्थ-परम्परा का उल्लेख किया गया है और अपराजितकार ने भी जय, विजय, सिद्धार्थ आदि के नाम से ग्रन्थों के विद्यमान रहने और उनके विषयों की सूची भी दी है। बहुत सम्भव है कि उस काल में कोई विश्वकर्मीय मत-ग्रन्थ प्रधान स्रोत के रूप में या आदर्श के रूप में सबके लिए ज्ञातव्य था। हालांकि भुवनदेवाचार्य ने कहीं भी समराङ्गणसूत्रधार का स्पष्टतः उल्लेख नहीं किया है, हाँ अनेकत्र विश्वकर्मा के मुख से भी 'आद्य विश्वकर्मा' का उल्लेख अवश्य करवाया है। यह विश्वकर्मीय ग्रन्थ कहीं विश्वकर्मा प्रकाश या वास्तुतन्त्र प्रतीत होता है तो कहीं-कहीं 'जयपृच्छा' (विद्यमान अहमदाबाद संस्करण से भिन्न और 10वीं सदी में प्रचलित आधारभूत पाठ जिसे भोज, सूत्रधार नकुल, हेमाद्रि पण्डित, महाराणा कुम्भा आदि ने उद्धृत किया है) का प्रभाव जान पड़ता है। स्कन्दपुराण, बृहद्देशी, नारदपुराण, विष्णुधर्मोत्तरपुराण, लिङ्गपुराण, नन्दीकेश्वरपुराण, शिवधर्म और शिवधर्मोत्तर, सुप्रभेदादि शैवागम आदि का प्रभाव भी अनेकत्र दिखाई देता है। स्कन्दपुराण के श्लोक ग्रन्थकार ने 'स्कन्दागम' के नाम से स्मरण भी किए गए हैं। भुवनदेवाचार्य की यह सूचना भी महत्वपूर्ण है कि उस काल तक छिन्न-भिन्न हो चुके स्कन्दपुराण को पुनर्संस्कारित किया जा रहा था। वास्तव में यह वही काल है जबकि पाटन-