अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
पृष्ठ 18, कुल 535 में से
संदर्भ में पढ़ेंxix कामशास्त्रविचक्षणः। नानागतिप्रचारज्ञ रसभावा विशारदः॥ नाट्यप्रयोगकुशलो नानाशिल्पसमन्वितः। पदच्छन्दोविधानज्ञः सर्वशास्त्रविचक्षणः ॥ ग्रहनक्षत्रतत्त्वज्ञो देहव्यापारपण्डितः। पृथिवी द्वीपवर्षाणां पर्वतानां जनस्य च॥ प्रमाणाचरितज्ञश्च राजवंशप्रसूतिवित्। श्रोता शास्त्रार्थकार्याणां श्रुत्वा चैवावधारकः ॥ अवधार्य प्रयोक्ता च शक्तश्चैवोपदेशने। एवं गुणस्तथाचार्यः सूत्रधारो विधीयते ॥ (नाट्यशास्त्रम् 35, 66- 71) देखा जाए तो भरतोक्त ये सारे ही विषय अपराजितपृच्छा में विद्यमान हैं। निश्चित ही यह सूत्रसन्तान-गुणकीर्तिप्रदायक है। रचनाकाल और रचना स्थल : अपराजितपृच्छा के रचनाकाल को लेकर विद्वानों में निश्चित ही उहापोह की स्थिति रही है। इस ग्रन्थ के बड़ौदा संस्करण के सम्पादक, जूनागढ़ रियासत सहित जोधपुर और हैदराबाद व अन्य म्यूनिसिपलिटीज में इंजीनियर रहे श्री पोपटभाई अम्बाशङ्कर मंकड; स्थापत्य शास्त्र के विद्वान मधुसूदन अमीभाई ढाकी, एम. पी. वोरा आदि ने इस समस्या के निस्तारण की दिशा में अपने कतिपय प्रयास किए हैं और इन्हीं मतों की समीक्षा इस ग्रन्थ के शोधार्थी प्रो. लालमणि दुबे ने भी की है। श्री मंकड ने माना है कि इसका रचनाकाल 12वीं और 13वीं सदी के मध्य रखा जाना उचित है। (अपराजित. बड़ौदा, भूमिका पृष्ठ 12) श्रीवोरा और श्रीढाकी ने कतिपय उद्धरणों के आधार पर इसके रचनाकाल के पुनर्निर्धारण का प्रयास किया व कहा कि पीठ के जाड्यकुम्भ, वाजीपीठ जैसी गुजरात के देवालयों के निर्माण में प्रचलित इस पीठ की परम्परा इसे 12वीं सदी में प्रवर्तित बताती है क्योंकि सोमनाथ में 1169 ई. की ऐसी रचनाएँ सामने आई हैं। इसी प्रकार 1140 में सिद्धपुर-गुजरात में बने रुद्रमातरालय में यह विधान परिलक्षित होता है। भित्ति में मञ्जिका, शिरावटी और कूटछाद्य जैसी रचनाएँ 11वीं सदी से पहले सामने नहीं आती और इनका वर्णन अपराजितपृच्छा में हुआ है। इस आधार पर इस ग्रंथ का रचनाकाल 12वीं सदी कल्पित किया जा सकता है। इसी प्रसङ्ग में केसरादि, श्रीधरादि, सुरटर्वादि, सागरतिलकादि और मेरु शैली के मन्दिर गुजरात व राजस्थान में इसी काल में दिखाई देते हैं। (द डेट ऑफ अपराजितपृच्छा, जर्नल ऑफ ओरियण्टल इंस्टीट्यूट, बडौदा, भाग 9, पृष्ठ 426-431) यही नहीं, साधारण शैली के चार स्तम्भों वाले प्राग्ग्रीव मण्डप एवं कई स्तम्भों वाले सभागारों का जो वर्णन अपराजितकार ने किया है, वैसे 11वीं सदी से ही बनने आरम्भ होते हैं। घट-पल्लवों से युक्त स्तम्भों का विधान जो कि इस ग्रन्थ में आया है, वह 12वीं सदी के बाद दिखाई नहीं देता है, ऐसे में भी इस ग्रन्थ का