भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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xviii समझना चाहिए : यत्रान्वेषणमर्थानां वाक्यैरभ्यर्थनापरैः। जिज्ञासुः पृच्छति परं सा पृच्छा त्वभिधीयते॥ (नाट्य. 17, 32; एवं नाटक लक्षणरत्नकोश, 179) कतिपयों का यह मत भी है कि जब कोई व्यक्ति स्वयं से या दूसरे से प्रश्न करते हुए किसी भावना एवं रस से पूर्ण तथ्य को कहता हो तो उसे पृच्छा समझना चाहिए : यत्र भावरसोपेतमात्मानमथवा परम्। पृच्छन्निवाभिधत्तेऽर्थं सा पृच्छेत्युच्यते यथा ॥ (तत्रैव) इस प्रकार अपराजितपृच्छा में अपराजित के प्रश्न ही नहीं है अपितु उसके प्रश्नों का सारगर्भित समाधान है। इसमें अपराजित पुत्र के रूप में और विश्वकर्मा पिता के रूप में हैं। जैसे पिता वात्सल्य भाव के साथ अपने पुत्र की प्रत्येक जिज्ञासा के शमन का प्रयत्न करता है, वैसा ही प्रयास इसमें हुआ है। अपराजित निश्चित ही गुणग्राहक होकर उभरते हैं। यह इसके 'सूत्रसन्तान गुणकीर्ति' के नाम को भी सार्थक करता है। फिर, यहाँ सूत्रसन्तान से आशय सूत्रधार है— वह नाटक से लेकर स्थापत्य शास्त्र तक अपनी ज्ञानात्मक धारणा के लिए प्रसिद्ध है, उनका ज्ञानकोश केवल कल्पना तक सीमित नहीं हैं बल्कि वह कलम और करनी की करामात दिखाने में सुकान्त होता है। भरताचार्य की परिभाषा पर विचार करें तो सूत्रसन्तान या सूत्रधार वह है जो चारों प्रकार के वाद्यों के वादन में प्रवीण होता है, जिसे अनेकानेक व्यावहारिक कार्यों का अनुभव होता हैं, जिसे अनेक धार्मिक परंपराओं और धर्मों- मतों का व्यवहार विदित हो, जो नीति व अर्थशास्त्र का ज्ञाता हो, वेशोपचार का जानकार हो, जिसे कामशास्त्र का व्यवस्थित ज्ञान हो, पात्रों की अनेक प्रकार की गतियों व उनके रङ्गमञ्च पर चलने के परम्परागत आचार का जिसे भली प्रकार परिचय हो, जिसे रस और भावों का पूर्णतः ज्ञान हो, प्रस्तुति-प्रदर्शन में जो दक्ष हो, सभी शिल्प और कलाओं का सम्यक् वेत्ता हो, जिसे पदों व छन्दों का विभाग विदित हो, जो अनेक शास्त्रों का जानकार हो, जिसे ग्रह, नक्षत्र आदि विज्ञानों की तत्त्वतः जानकारी हो, जिसे शारीर-शास्त्र तथा शारीरिक गतियों का व्यवस्थित ज्ञान हो, जो पृथ्वी पर विद्यमान द्वीप, वर्ष, पर्वत, वहाँ के निवासीगण और उनके उचित आचार-विचार, वेशभूषा आदि का प्रामाणिक ज्ञान रखता हो, जिसे अनेक राजवंशों की परंपराओं व इतिवृत्त का ज्ञान हो, जिसने शास्त्रों में प्रतिपादित गुण, आचार और कार्यों का व्यवस्थित रूप से श्रवण किया हो और उन तत्त्वों को सम्यक् रूप से हृदयङ्गम किया हो और इन्हीं तत्त्वों का जो दूसरों को शिक्षण या उपदेश देने में भी समर्थ हो तो इन गुणों से युक्त पुरुष सूत्रधार होता है : चतुरातोद्य कुशलः नानाकर्मसु शिक्षितः। नानापाषण्डकार्यज्ञो नीतिशास्त्रार्थतत्ववित्॥ वेशोपचारनिपुणः