भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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xvii इस प्रकार अनेकानेक शास्त्रीय विषयों की पृष्ठभूमि पर इस अपराजितपृच्छा का न्यास-विन्यास हुआ है। लोकावश्यकताओं की पूर्ति के लिए इसमें यथेष्ट शास्त्रीय निर्देशों से पूर्णता प्रदान की गई है। रचनाकार इस ग्रन्थ की संकल्पना से लेकर समाहार तक पूरी तक केन्द्रीय-चित्त रहा है। उसके ध्येय में अबोध शिल्पी से लेकर पाण्डित्य-प्रतिभा सम्पन्न सृजन तक के लिए इसकी उपादेयता सिद्ध करना रहा है और इसमें वह सर्वाङ्गतया सफल रहा है। नामकरण, आशय और पृष्ठभूमि : जैसा कि कहा गया है कि अपराजितपृच्छा अनेक शास्त्रों का सूत्रित-स्वरूप है। इससे ग्रन्थकार के अध्ययन-आसमान का अवज्ञान तो होता ही है जो कि बहुत विस्तृत एवं व्यापक है, साथ ही उसके विषय चयन और उसे सूत्रित करने के कौशल का बोध होता है— एक गुरुकुल के परिवेश रूप में वह ग्रन्थ की संकल्पना करता है और जनता की ओर से की जाने वाली जिज्ञासाओं को वह अपराजित के मुख से प्रश्न के रूप में प्रस्तुत करता है और उनका उत्तर-प्रत्युत्तर स्वयं विश्वकर्मा प्रस्तुत करते हैं। अपराजित के प्रश्नों के कारण ही यह 'पृच्छा' संज्ञाभिधान लिए हुए है। प्रश्न या पृच्छा की परम्परा हमारे यहाँ ब्राह्मण और उपनिषद-काल से तो रही है ही उत्तर- बौद्धकाल में ग्रन्थों के नामकरण के रूप में भी ज्ञातव्य है। 'मिलिन्दपञ्ह' ग्रन्थ तो बहुत प्रसिद्ध है ही जिसमें भिक्षु नागसेन और मिलिन्द का संवाद है, इसमें मिलिन्द जिसे यवन मिनेण्डर के रूप में पहचाना गया है, के प्रश्नों का विवरण मात्र नहीं है बल्कि उसके प्रश्नों का समाधान इसका मुख्य विषय है, इसी ग्रन्थ में लक्खणपञ्ह, विमतिच्छेदकपञ्ह, मेण्डकपञ्ह, योगिकथापञ्ह, अनुमानपञ्ह और ओपम्मकथापञ्ह जैसे प्रश्नों की श्रृंखला है और इन सबमें मिलिन्द के अनेक प्रश्नों का समाधान है। (विशेष विवरण : आर. डी. वाडेकर सम्पादित मिलिन्दपञ्ह, मुम्बई विश्वविद्यालय, मुम्बई, 1940 ई.) शब्दकोशों में 'प्रच्छ जिज्ञासायाम् + गुरोश्च हल:' के रूप में इस शब्द पर विचार हुआ है। अमरकोश में इसे प्रश्न का पर्याय कहा है। (शब्दकल्पद्रुम खण्ड 3, पृष्ठ 224) चरक के सूत्रस्थान में कहा गया है कि शास्त्र में जो विषय जिस प्रकार से कहा गया है, उसे उसी रूप में विधिपूर्वक पूछना प्रश्न कहलाता है : पृच्छा तन्त्राद्यथाप्रायं विधिना प्रश्न उच्यते। प्रश्नार्थो युक्तिमांस्तस्य तन्त्रेणैवार्थनिश्चयः ॥ (चरकसंहिता सूत्र. 30, 69) भरत के नाट्यशास्त्र में आया है कि जब कोई जिज्ञासुभाव से अपनी अभीष्ट वस्तु की तलाश करते हुए अनुनय-विनयपूर्वक प्रश्न करता हो तो उसे पृच्छा