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अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

xvii इस प्रकार अनेकानेक शास्त्रीय विषयों की पृष्ठभूमि पर इस अपराजितपृच्छा का न्यास-विन्यास हुआ है। लोकावश्यकताओं की पूर्ति के लिए इसमें यथेष्ट शास्त्रीय निर्देशों से पूर्णता प्रदान की गई है। रचनाकार इस ग्रन्थ की संकल्पना से लेकर समाहार तक पूरी तक केन्द्रीय-चित्त रहा है। उसके ध्येय में अबोध शिल्पी से लेकर पाण्डित्य-प्रतिभा सम्पन्न सृजन तक के लिए इसकी उपादेयता सिद्ध करना रहा है और इसमें वह सर्वाङ्गतया सफल रहा है। नामकरण, आशय और पृष्ठभूमि : जैसा कि कहा गया है कि अपराजितपृच्छा अनेक शास्त्रों का सूत्रित-स्वरूप है। इससे ग्रन्थकार के अध्ययन-आसमान का अवज्ञान तो होता ही है जो कि बहुत विस्तृत एवं व्यापक है, साथ ही उसके विषय चयन और उसे सूत्रित करने के कौशल का बोध होता है— एक गुरुकुल के परिवेश रूप में वह ग्रन्थ की संकल्पना करता है और जनता की ओर से की जाने वाली जिज्ञासाओं को वह अपराजित के मुख से प्रश्न के रूप में प्रस्तुत करता है और उनका उत्तर-प्रत्युत्तर स्वयं विश्वकर्मा प्रस्तुत करते हैं। अपराजित के प्रश्नों के कारण ही यह 'पृच्छा' संज्ञाभिधान लिए हुए है। प्रश्न या पृच्छा की परम्परा हमारे यहाँ ब्राह्मण और उपनिषद-काल से तो रही है ही उत्तर- बौद्धकाल में ग्रन्थों के नामकरण के रूप में भी ज्ञातव्य है। 'मिलिन्दपञ्ह' ग्रन्थ तो बहुत प्रसिद्ध है ही जिसमें भिक्षु नागसेन और मिलिन्द का संवाद है, इसमें मिलिन्द जिसे यवन मिनेण्डर के रूप में पहचाना गया है, के प्रश्नों का विवरण मात्र नहीं है बल्कि उसके प्रश्नों का समाधान इसका मुख्य विषय है, इसी ग्रन्थ में लक्खणपञ्ह, विमतिच्छेदकपञ्ह, मेण्डकपञ्ह, योगिकथापञ्ह, अनुमानपञ्ह और ओपम्मकथापञ्ह जैसे प्रश्नों की श्रृंखला है और इन सबमें मिलिन्द के अनेक प्रश्नों का समाधान है। (विशेष विवरण : आर. डी. वाडेकर सम्पादित मिलिन्दपञ्ह, मुम्बई विश्वविद्यालय, मुम्बई, 1940 ई.) शब्दकोशों में 'प्रच्छ जिज्ञासायाम् + गुरोश्च हल:' के रूप में इस शब्द पर विचार हुआ है। अमरकोश में इसे प्रश्न का पर्याय कहा है। (शब्दकल्पद्रुम खण्ड 3, पृष्ठ 224) चरक के सूत्रस्थान में कहा गया है कि शास्त्र में जो विषय जिस प्रकार से कहा गया है, उसे उसी रूप में विधिपूर्वक पूछना प्रश्न कहलाता है : पृच्छा तन्त्राद्यथाप्रायं विधिना प्रश्न उच्यते। प्रश्नार्थो युक्तिमांस्तस्य तन्त्रेणैवार्थनिश्चयः ॥ (चरकसंहिता सूत्र. 30, 69) भरत के नाट्यशास्त्र में आया है कि जब कोई जिज्ञासुभाव से अपनी अभीष्ट वस्तु की तलाश करते हुए अनुनय-विनयपूर्वक प्रश्न करता हो तो उसे पृच्छा

xviii समझना चाहिए : यत्रान्वेषणमर्थानां वाक्यैरभ्यर्थनापरैः। जिज्ञासुः पृच्छति परं सा पृच्छा त्वभिधीयते॥ (नाट्य. 17, 32; एवं नाटक लक्षणरत्नकोश, 179) कतिपयों का यह मत भी है कि जब कोई व्यक्ति स्वयं से या दूसरे से प्रश्न करते हुए किसी भावना एवं रस से पूर्ण तथ्य को कहता हो तो उसे पृच्छा समझना चाहिए : यत्र भावरसोपेतमात्मानमथवा परम्। पृच्छन्निवाभिधत्तेऽर्थं सा पृच्छेत्युच्यते यथा ॥ (तत्रैव) इस प्रकार अपराजितपृच्छा में अपराजित के प्रश्न ही नहीं है अपितु उसके प्रश्नों का सारगर्भित समाधान है। इसमें अपराजित पुत्र के रूप में और विश्वकर्मा पिता के रूप में हैं। जैसे पिता वात्सल्य भाव के साथ अपने पुत्र की प्रत्येक जिज्ञासा के शमन का प्रयत्न करता है, वैसा ही प्रयास इसमें हुआ है। अपराजित निश्चित ही गुणग्राहक होकर उभरते हैं। यह इसके 'सूत्रसन्तान गुणकीर्ति' के नाम को भी सार्थक करता है। फिर, यहाँ सूत्रसन्तान से आशय सूत्रधार है— वह नाटक से लेकर स्थापत्य शास्त्र तक अपनी ज्ञानात्मक धारणा के लिए प्रसिद्ध है, उनका ज्ञानकोश केवल कल्पना तक सीमित नहीं हैं बल्कि वह कलम और करनी की करामात दिखाने में सुकान्त होता है। भरताचार्य की परिभाषा पर विचार करें तो सूत्रसन्तान या सूत्रधार वह है जो चारों प्रकार के वाद्यों के वादन में प्रवीण होता है, जिसे अनेकानेक व्यावहारिक कार्यों का अनुभव होता हैं, जिसे अनेक धार्मिक परंपराओं और धर्मों- मतों का व्यवहार विदित हो, जो नीति व अर्थशास्त्र का ज्ञाता हो, वेशोपचार का जानकार हो, जिसे कामशास्त्र का व्यवस्थित ज्ञान हो, पात्रों की अनेक प्रकार की गतियों व उनके रङ्गमञ्च पर चलने के परम्परागत आचार का जिसे भली प्रकार परिचय हो, जिसे रस और भावों का पूर्णतः ज्ञान हो, प्रस्तुति-प्रदर्शन में जो दक्ष हो, सभी शिल्प और कलाओं का सम्यक् वेत्ता हो, जिसे पदों व छन्दों का विभाग विदित हो, जो अनेक शास्त्रों का जानकार हो, जिसे ग्रह, नक्षत्र आदि विज्ञानों की तत्त्वतः जानकारी हो, जिसे शारीर-शास्त्र तथा शारीरिक गतियों का व्यवस्थित ज्ञान हो, जो पृथ्वी पर विद्यमान द्वीप, वर्ष, पर्वत, वहाँ के निवासीगण और उनके उचित आचार-विचार, वेशभूषा आदि का प्रामाणिक ज्ञान रखता हो, जिसे अनेक राजवंशों की परंपराओं व इतिवृत्त का ज्ञान हो, जिसने शास्त्रों में प्रतिपादित गुण, आचार और कार्यों का व्यवस्थित रूप से श्रवण किया हो और उन तत्त्वों को सम्यक् रूप से हृदयङ्गम किया हो और इन्हीं तत्त्वों का जो दूसरों को शिक्षण या उपदेश देने में भी समर्थ हो तो इन गुणों से युक्त पुरुष सूत्रधार होता है : चतुरातोद्य कुशलः नानाकर्मसु शिक्षितः। नानापाषण्डकार्यज्ञो नीतिशास्त्रार्थतत्ववित्॥ वेशोपचारनिपुणः

xix कामशास्त्रविचक्षणः। नानागतिप्रचारज्ञ रसभावा विशारदः॥ नाट्यप्रयोगकुशलो नानाशिल्पसमन्वितः। पदच्छन्दोविधानज्ञः सर्वशास्त्रविचक्षणः ॥ ग्रहनक्षत्रतत्त्वज्ञो देहव्यापारपण्डितः। पृथिवी द्वीपवर्षाणां पर्वतानां जनस्य च॥ प्रमाणाचरितज्ञश्च राजवंशप्रसूतिवित्। श्रोता शास्त्रार्थकार्याणां श्रुत्वा चैवावधारकः ॥ अवधार्य प्रयोक्ता च शक्तश्चैवोपदेशने। एवं गुणस्तथाचार्यः सूत्रधारो विधीयते ॥ (नाट्यशास्त्रम् 35, 66- 71) देखा जाए तो भरतोक्त ये सारे ही विषय अपराजितपृच्छा में विद्यमान हैं। निश्चित ही यह सूत्रसन्तान-गुणकीर्तिप्रदायक है। रचनाकाल और रचना स्थल : अपराजितपृच्छा के रचनाकाल को लेकर विद्वानों में निश्चित ही उहापोह की स्थिति रही है। इस ग्रन्थ के बड़ौदा संस्करण के सम्पादक, जूनागढ़ रियासत सहित जोधपुर और हैदराबाद व अन्य म्यूनिसिपलिटीज में इंजीनियर रहे श्री पोपटभाई अम्बाशङ्कर मंकड; स्थापत्य शास्त्र के विद्वान मधुसूदन अमीभाई ढाकी, एम. पी. वोरा आदि ने इस समस्या के निस्तारण की दिशा में अपने कतिपय प्रयास किए हैं और इन्हीं मतों की समीक्षा इस ग्रन्थ के शोधार्थी प्रो. लालमणि दुबे ने भी की है। श्री मंकड ने माना है कि इसका रचनाकाल 12वीं और 13वीं सदी के मध्य रखा जाना उचित है। (अपराजित. बड़ौदा, भूमिका पृष्ठ 12) श्रीवोरा और श्रीढाकी ने कतिपय उद्धरणों के आधार पर इसके रचनाकाल के पुनर्निर्धारण का प्रयास किया व कहा कि पीठ के जाड्यकुम्भ, वाजीपीठ जैसी गुजरात के देवालयों के निर्माण में प्रचलित इस पीठ की परम्परा इसे 12वीं सदी में प्रवर्तित बताती है क्योंकि सोमनाथ में 1169 ई. की ऐसी रचनाएँ सामने आई हैं। इसी प्रकार 1140 में सिद्धपुर-गुजरात में बने रुद्रमातरालय में यह विधान परिलक्षित होता है। भित्ति में मञ्जिका, शिरावटी और कूटछाद्य जैसी रचनाएँ 11वीं सदी से पहले सामने नहीं आती और इनका वर्णन अपराजितपृच्छा में हुआ है। इस आधार पर इस ग्रंथ का रचनाकाल 12वीं सदी कल्पित किया जा सकता है। इसी प्रसङ्ग में केसरादि, श्रीधरादि, सुरटर्वादि, सागरतिलकादि और मेरु शैली के मन्दिर गुजरात व राजस्थान में इसी काल में दिखाई देते हैं। (द डेट ऑफ अपराजितपृच्छा, जर्नल ऑफ ओरियण्टल इंस्टीट्यूट, बडौदा, भाग 9, पृष्ठ 426-431) यही नहीं, साधारण शैली के चार स्तम्भों वाले प्राग्ग्रीव मण्डप एवं कई स्तम्भों वाले सभागारों का जो वर्णन अपराजितकार ने किया है, वैसे 11वीं सदी से ही बनने आरम्भ होते हैं। घट-पल्लवों से युक्त स्तम्भों का विधान जो कि इस ग्रन्थ में आया है, वह 12वीं सदी के बाद दिखाई नहीं देता है, ऐसे में भी इस ग्रन्थ का

xx रचनाकाल 12वीं सदी के समापन से पूर्व का ही निर्धारित होता है। यही स्थिति मण्डपादि में स्वास्तिकाकार संवराणाओं की हैं जो कि उक्त अवधि में ही गुजरात, राजस्थान सहित मध्य भारत में प्रचलित रही हैं। चतुर्भुजी दिक्पालों की मूर्तियाँ और उनमें आयुध-न्यास का जो वर्णन अपराजितकार ने किया है, वह 11वीं सदी और अधिकतम 12वीं सदी में गुजरात में निर्मित देवालयों में ही सामने आता है। (उपर्युक्त) उक्त विवरणों से स्पष्ट होता है कि यह ग्रन्थ 11वीं-12वीं सदी के मध्य आकार ले चुका था। चूँकि इस ग्रन्थ पर 'समराङ्गणसूत्रधार' का पूरा प्रभाव है, ऐसे में यह ग्रन्थ समराङ्गण के रचयिता धाराधिप भोजराज (1010-1053 ई.) के बाद ही अस्तित्व में आया होगा। प्रो. ढाकी ने अपराजितपृच्छा पर समराङ्गणसूत्रधार के प्रभाव की चर्चा अपने एक आलेख में की है (द इन्फ्लुएंस ऑफ समराङ्गणसूत्रधार ऑन अपराजितपृच्छा, जर्नल ऑफ ओरियण्टल इंस्टीट्यूट, भाग 10, पृष्ठ 231- 234) किन्तु, यह भी प्रतीत होता है कि समराङ्गण व अपराजित दोनों ही ग्रन्थों के सामने कोई अन्य विश्वकर्मीय ग्रन्थ भी रहा होगा और उसी से इन ग्रन्थकारों ने सामग्री और विषय को उद्धृत किया है। समराङ्गणसूत्रधार के पहले ही अध्याय में विश्वकर्मीय ग्रन्थ-परम्परा का उल्लेख किया गया है और अपराजितकार ने भी जय, विजय, सिद्धार्थ आदि के नाम से ग्रन्थों के विद्यमान रहने और उनके विषयों की सूची भी दी है। बहुत सम्भव है कि उस काल में कोई विश्वकर्मीय मत-ग्रन्थ प्रधान स्रोत के रूप में या आदर्श के रूप में सबके लिए ज्ञातव्य था। हालांकि भुवनदेवाचार्य ने कहीं भी समराङ्गणसूत्रधार का स्पष्टतः उल्लेख नहीं किया है, हाँ अनेकत्र विश्वकर्मा के मुख से भी 'आद्य विश्वकर्मा' का उल्लेख अवश्य करवाया है। यह विश्वकर्मीय ग्रन्थ कहीं विश्वकर्मा प्रकाश या वास्तुतन्त्र प्रतीत होता है तो कहीं-कहीं 'जयपृच्छा' (विद्यमान अहमदाबाद संस्करण से भिन्न और 10वीं सदी में प्रचलित आधारभूत पाठ जिसे भोज, सूत्रधार नकुल, हेमाद्रि पण्डित, महाराणा कुम्भा आदि ने उद्धृत किया है) का प्रभाव जान पड़ता है। स्कन्दपुराण, बृहद्देशी, नारदपुराण, विष्णुधर्मोत्तरपुराण, लिङ्गपुराण, नन्दीकेश्वरपुराण, शिवधर्म और शिवधर्मोत्तर, सुप्रभेदादि शैवागम आदि का प्रभाव भी अनेकत्र दिखाई देता है। स्कन्दपुराण के श्लोक ग्रन्थकार ने 'स्कन्दागम' के नाम से स्मरण भी किए गए हैं। भुवनदेवाचार्य की यह सूचना भी महत्वपूर्ण है कि उस काल तक छिन्न-भिन्न हो चुके स्कन्दपुराण को पुनर्संस्कारित किया जा रहा था। वास्तव में यह वही काल है जबकि पाटन-

xxi गुजरात के राजा कुमारपाल चालुक्य (1140-1174 ई.) का चरित्र भी स्कन्दपुराण में (ब्राह्मखण्ड, धर्मारण्य माहात्म्य अन्तर्गत) स्थान पा चुका था। यह सङ्केत स्कन्दपुराण के स्वरूप को लेकर विद्वानों के उन प्रश्नों का उत्तर भी देता है कि इस पुराण के दो स्वरूप है—संहितात्मक और खण्डात्मक; यह पुराण वर्तमान में खण्डात्मक (माहेश्वरखण्ड, वैष्णव, ब्राह्म, काशी, आवन्त्य, नागर एवं प्रभास) ही मिलता है जबकि संहितात्मक स्कन्दपुराण से केवल 'सूतसंहिता' लब्ध होती है शेष सनत्कुमारसंहिता, शाङ्करी, वैष्णवी, ब्राह्मी एवं सौरसंहिता अनुपलब्ध है। महामहोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्री का कथन है कि संहितात्मक स्कन्दपुराण की एक प्रति नेपाल दरबार पुस्तकालय में 7वीं सदी की प्राप्त होती है। प्रो. पी. वी. काणे ने इस समस्या के उत्तर में कहा है कि यह स्कन्दपुराण 7वीं सदी के पूर्व नहीं रखा जा सकता है और न ही नवीं सदी के पश्चात् का हो सकता है। (धर्मशास्त्र का इतिहास खण्ड 4, पृष्ठ 428) इन मतों के विपरीत अपराजितकार के सङ्केत और कुमारपाल चरित्र का इस पुराण में मिलना इसे 12वीं सदी तक ले जाता है। कुमारपाल चालुक्य के चरित्र-मूलक ग्रन्थों पर विश्वास करें तो सहज विश्वास होता है कि गुर्जर-चालुक्य चक्रवर्ती इस नृपति के जीवन प्रसङ्गों को समकालीन और परवर्ती विद्वानों को बहुत प्रभावित किया। तभी तो अज्ञातकर्तृक ने पुरातन संक्षिप्त कुमारपालदेव चरित की रचना की, सोमतिलक सूरि ने कुमारपालदेवचरित रचा, जिनमण्डन ने कुमारपाल प्रबन्ध लिखा, किसी अन्य ने कुमारपाल-प्रतिबोध की रचना की। इसी प्रकार चतुरशीतिप्रबन्ध में कुमारपालदेवप्रबन्ध का निबन्धन किया वहीं हीरकलश, देवप्रभगणि, ऋषभदास व जिनहर्ष ने कुमारपालरास नाम से पृथक्-पृथक् काल में कृतियों का प्रणयन किया तो सोमप्रभाचार्य ने कुमारपालप्रतिबोध को उद्धृत किया। तीर्थकल्प, मोहपराजय नाटक, प्रभावकचरित्र, प्रबन्धचिन्तामणि, उपदेशतरङ्गिणी, उपदेशप्रसाद सहित कई प्रशस्तियों में कुमारपाल का वर्णन आया है। (कुमारपालचरित्र संग्रह, सिंघी जैन ग्रन्थमाला, क्रमाङ्क 41) इसी प्रकार चित्रकूट (चित्तौड़गढ़) के समीधेश्वर महादेव मन्दिर से उसका शिलालेख 1141 ई. का मिला है। उस समय तक वह शैव मतावलम्बी था और विक्रम संवत् 1216 के मार्गशीर्ष की शुक्ल पक्ष की द्वितीया (दिसम्बर 1160 ई.) को कुमारपाल ने जैनधर्म स्वीकार कर लिया था, जैसा कि प्रो. पीटर पीटर्सन का मत भी है। अपराजितकार उस समय के जैनधर्म के प्रसार-प्रभाव से अनभिज्ञ नहीं था। उसने यदुवंशी श्रीकृष्ण के नेमिनाथ के रूप में गिरनार-रैवताचल या उज्जयन्त पर्वत

xxii पर प्रकट होने की सूचना दी है। ऐसा प्रतीत होता है कि यदुवंश में माण्डलिक राजा के गुरु हेमाचार्य ने उक्त पर्वत पर नेमिनाथ या नेमनाथ की मूर्ति प्रतिष्ठित की थी। (कर्नल जेम्स टॉड कृत पश्चिम भारत की यात्रा, जोधपुर 1965, परिशिष्ट पृ. 540) कदाचित इसी प्रसङ्ग को अतिशयोक्ति के रूप में ग्रन्थकार ने दिया हो। इस उज्जयन्त पर्वत के श्रीनेमिनाथ मन्दिर का जीर्णोद्धार विक्रम संवत् 1333 (1276 ई.) के ज्येष्ठ की चतुर्दशी को हुआ था। संवत् 1227 (1170 ई.) के एक अभिलेख में आया है कि तब तक नेमीश्वर तीर्थ बहुत प्रसिद्ध हो चुका था और अनेक प्रकार के ऐसे रत्नों से विभूषित था जिनको धनिक व्यापारी दूर-दूर के समुद्र-तटों से लेकर आए थे। इससे पूर्व संवत् 1204 (1147 ई.) के फाल्गुन मास की षष्ठि, बुधवार के तेजपाल और बसन्तपाल बन्धुओं द्वारा स्थापित एक लेख में कहा गया है कि पवित्रता के सागर के समान यदुवंश में इन्दु नेमीश्वर हुए जिनके चरण कमलों का अनुसरण करते हुए परमोच्च उज्जयन्ति तक चढ़कर यदुवंशियों के समूह के समूह युग-युग से नेमिनाथ के चरणों में शीश नवाते आए हैं। (वही, पृष्ठ 524-526) इस प्रकार अपराजितकार इससे पूर्व हो चुका था और तब तक गिरनार पर नेमिनाथ- तीर्थ की मान्यता का विकास हो चुका था। अन्तःसाक्ष्य के अन्तर्गत ही ग्रन्थकार ने महाग्रावभी रत्नकूट, मेरुतिलकादि संज्ञक जिन देवालयों के स्वरूपों का वर्णन किया है, वे अन्यान्य वास्तु विधियाँ 12वीं सदी के पूर्वार्द्ध तक समाज में प्रचलित थी। इनमें से कई नाम वलभी संवत् 850 तद्नुसार 1169 ई. के कुमारपाल चालुक्य के एक अभिलेख में आए हैं। यथा— बस्तियों में ब्रह्मपुर, राजाओं के मण्डल, यतियों के मठ, नृपशाला, कूपिका, रौप्यप्रणाल, मण्डुकासन, पट्टशालिका, सोपान, महागृह, वापिका आदि मुख्य हैं। मन्दिरों के लिए कैलाश-शैल के समान जैसी तुलनाएँ आई हैं। मेरु के समान मन्दिर को खड़ा करवाना, जीर्णोद्धार कार्य की प्रशंसा, देवालयों पर स्वर्ण-कलश की स्थापना, जल-कुल्याएँ बनवाना और देव प्रतिमाओं के लिए सिंहासन निर्माण जैसे प्रसङ्ग तत्कालीन परम्परानुसार अपराजितपृच्छा में आए हैं। फिर, तब तक सोमनाथ-प्रभास क्षेत्र का महत्व उजागर हो चुका था। अपराजितकार ने विस्तार से सोमनाथ का वर्णन किया है। वहाँ तब शिल्पियों का बृहद् समूह विद्यमान था और उक्त मन्दिर के लिए विशिष्ट कार्य के सम्पादक होने के कारण उनकी ख्याति सोमनाथपुरवासी होने से सोमपुरा के रूप में ख्यातिलब्ध हुई। ऐसा प्रतीत होता है कि संक्रमण युग में जबकि कला की काया ऐसे दौर में थी

xxiii जिसमें भाव पुरातन थे और विचार नए रूप में थे, यह ग्रन्थ लिखा गया। यह पश्चिमोत्तर भारत में गुर्जर-गुहिल काल में प्रवर्तित प्रवृत्तियों का ग्रंथन है जिसमें कला का प्रवाह कुछ आहत हुआ, शिल्पी समुदाय सताया गया, उन्हें ग्रामादि से विमुख किया गया था और तब उन्हें एक शास्त्र की जरूरत पड़ी। दिक्पालों को विशेष प्रतिष्ठा देने के लिए चारभुजा सहित मूर्त्यांकन किया गया — यह पश्चिमी भारत के राजाओं और राजन्यशक्ति की अभिवृद्धि के ध्येय का भी सूचक है क्योंकि इसी ओर से अरबों की आक्रमणकारी गतिविधियाँ निरन्तर थी और दिक्पाल के रूप में राजाओं को सशक्त करने का विचार शिल्पियों के मानस में भी जन्म ले चुका था। फिर प्रतिहार युगीन शिल्प के शिखर अल्पवय में ही झूलते दिखाई दे रहे थे। ऐसे में रेखावर्णन का विन्यास किया गया — अपराजितपृच्छा की रचनात्मक पृष्ठभूमि में इन बातों का भी विचार किया जाना चाहिए। ऐसे ही विभिन्न वर्णनों के आधार पर इस ग्रन्थ का रचनाकाल 12वीं सदी निर्धारित होता है। प्रो. ढाकी ने भी ऐसे ही प्रमाणों की बुनियाद पर विभिन्न मारु- गुर्जर शिल्प ग्रन्थों का परीक्षण करते हुए इसे कुमारपाल चालुक्य की शासनावधि की देन सिद्ध किया है। इस प्रसङ्ग में कुमारपाल के अभिन्न, मन्त्रियों में प्रधान गुरु भावबृहस्पति ने इस काल में जीर्णोद्धार के कार्यों को प्रमुखता दी। कुमारपाल ने उसे अपनी मुद्रा, कोष और सर्वस्व दे दिया और कहा कि जाओ एवं देवपत्तन के तीरन (देवसमुद्र-तटवर्ती) मन्दिरों का जीर्णोद्धार करवाओ। वहाँ उत्सव हुआ, प्रथमतः चन्द्रमा ने स्वर्णमन्दिर खड़ा किया, फिर रावण ने चाँदी का मन्दिर बनवाया। बाद में कृष्ण, भीमदेव ने इसका पुनर्निर्माण करवाया। इसमें जवाहरात जड़वाए। एक बार पुनः कुमारपाल के प्रयासों से यह मेरु संज्ञक प्रासाद के समान बनाया गया...। इसे भावबृहस्पति ने कैलास के समान बनवा दिया और राजा को अपने कार्यों के अवलोकन के लिए आमन्त्रित किया। कुमारपाल ने जब उनको देखा तो प्रशंसापूर्वक कहा कि मेरा हृदय आनन्दित है, मैं तुम्हें और तुम्हारी सन्ततियों को मेरे राज्य में प्रधानता प्रदान करता हूँ। जैसा कि 1169 ई. के एक अभिलेख में आया है— एवं राज्यमनारत विदधति श्रीवीरसिंहासने श्रीमद्दीरकुमारपालनृपतौ त्रैलोक्यकल्पद्रुमे। गण्डो भावबृहस्पतिः स्मररिपोरुद्वीक्ष्य देवालये जीर्णं भूपतिमाह देवसदनं प्रोद्धर्तुमेतद्वचः॥

xxiv आदेशात् स्मरशासनस्य सुबृहत्प्रासादनिष्पादकं चातुर्जातकसम्मतं स्थिरधियं गार्गेयवंशोद्भवम् । श्रीमद्भावबृहस्पतिं नरपतिः सर्वेशगण्डेश्वरं चक्रे तं च सुगोत्रमण्डलतया ख्यातं धरित्रीतले ॥ दत्वालङ्करणं करेण तु गले व्यालम्ब्य मुक्त्या... प्रणम्याग्रतः । उत्सार्यात्म महत्तरं निजतमामुच्छिद्य मुद्रामदात् । स्थानं भव्य पुराणपद्धतियुतं निस्तन्त्रभक्त्यव्ययम् ॥ प्रासादं यदकारयेत् स्मररिपोः कैलासशैलोपमं भूपालस्तदतीवहर्षमगमत् प्रोवाच चेदं वचः । श्रीमद्दण्डमहामतिं प्रति गण्डत्वमेतत्तव प्रत्तं सम्प्रति पुत्रपौत्रसहिताया चन्द्रतारारुणम् ॥ सौवर्णं सोमराजो रजतमयमथो रावणोदारवीर्यः कृष्णश्रीभीमदेवो रुचिरमहाग्रावभी रत्नकूटम् । तं कालज्

xxv किया है और सम्मान स्वरूप दानादि का विधान भी वर्णित किया है। प्रतीत होता है कि अपराजितकार उस घटना का दर्शक रहा होगा और यह ग्रन्थ 1150 ई. के आसपास लिखा जा चुका था अथवा लिखा जा रहा था। किन्तु, यह सन्देह स्थल- स्थल पर प्रकट होता है कि भुवनदेव गुजरात से लगे प्रदेश मेवाड़ से परिचित था। यद्यपि कुमारपाल ने मेवाड़ को विजित किया था, ऐसे में धारानगरी के परमारों के पश्चात् मेवाड़ गुजरात के चालुक्यों के अधिकार में रहा। कुमारपाल ने चित्तौड़गढ़ स्थित परमार भोज के बनवाए समीधेश्वर मन्दिर में पूजन किया था और वहाँ स्वर्णकलश चढ़ाकर भूमिदान किया— सन्निवेश्य शिविरं पृथु तत्र त्रासिता सहनभूपतिचक्रम्। चित्रकूटगिरि पुष्कलशोभां द्रष्टुकुमारनृपतिः कुतुकेन॥ यदुच्चसुरसद्माग्रोपरिष्टात् प्रपतन् सदा। रथं नयत्यलं मन्दं मन्दं भङ्गभयाद्रविः॥ यत्सौधशिखरारूढकामिनीमुखसन्निधौ। वर्तमानो निशानाथो लक्ष्यते लक्ष्मलेखया॥ (प्रो. कीहॉर्न सम्पादित चित्तौड़गढ़ स्थित कुमारपाल का अभिलेख : इण्डियन एण्टीक्वेरी भाग 2, पृष्ठ 521) इस समस्त पृष्ठभूमि में मेरा विचार है कि यह ग्रन्थ निश्चित तौर पर 1140 से लेकर 1150 ई. तक तैयार हो गया था। इसके तैयार होते ही इसकी प्रतिलिपियों का देशभर में आदान-प्रदान हुआ। देवगिरिराज्य के यादववंशीय नरेश महादेव (1260-1271 ई.) के धर्मशास्त्री हेमाद्रि पण्डित ने अपराजितपृच्छा के श्लोक प्रथमतयाः ग्रन्थ के नामोल्लेख के साथ अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘चतुर्व्वर्गचिन्तामणि' के परिशेषखण्ड के तीसरे भाग कालनिर्णयोक्त ‘प्रासादाद्यारम्भकालः' के प्रसङ्ग में प्रमाण के रूप में उद्धृत किए। इससे इस ग्रन्थ के 12वीं सदी के बाद लिखे जाने की धारणा निर्मूल हो जाती है। ये श्लोक हैं — रवौ कन्यातुलालिस्थे वास्तौ पूर्वे शिरः स्थितम्। चापे च मकरे कुम्भे दक्षिणेन व्यवस्थितम्। आदित्यवारयोगेन स वास्तुः सरति भ्रमात्॥ यत्र भानुः शिरस्तत्र लक्षितव्यं रविक्रमात्। देवागारं गृहञ्चैव न कुर्याच्छीर्षसन्मुखम्॥ मृत्युरोगभयानि स्युः प्रशस्तं कुक्षिसन्मुखम्।

तुला-वृश्चिक-कन्यासु भास्करो यदि संस्थितः । न तदा प्राङ्मुखं कुर्यात् गृहं भवति निष्फलम् ॥ धनुर्मकरकुम्भेषु यदि तिष्ठति भास्करः । तदा याम्यमुखं वेश्म राजचौराग्निभीतिदम् ॥ मीने मेषे वृषे प्रत्यङ्मुखं स्त्रीकलहावहम् । मिथुने कर्कटे सिंहे न कुर्याच्चोत्तराननम् । तथा कृतं भवेद्वेश्म दोष-शोक-भयावहम् ॥ (हेमाद्रि : चतुर्वर्गचिन्तामणि, परिशेषखण्ड कालनिर्णय अध्याय 15, पृष्ठ 819-820) अपराजितपृच्छा के वर्तमान पाठ में ये श्लोक निम्नांकित क्रम और पाठान्तर के साथ प्राप्त होते हैं— रवौ कन्यातुलालौच पूर्वे शिरः समाश्रितः । धनोश्च मकरे कुम्भे दक्षिणे तु व्यवस्थितः ॥ मीने मेषे वृषे चैव पश्चिमे तु समाश्रितः । मिथुने सिंहकर्कै च ह्युत्तरेण व्यवस्थितः ॥ सर्वकालक्रमोऽयं च राशिमध्ये ह्यतः शृणु । देवताश्च क्रमयोगेन स वास्तुः सरते महीम् ॥ यत्र भानुस्तत्र शिरं लक्षितव्यं रविक्रमात् । अन्यथा कुरुते दुःखं शिरो वास्तावलङ्कृतम् ॥ देवागारं गृहं यत्र न कुर्याच्छिरः सन्मुखम् । मृत्युरोगभया नित्यं शस्तं च कुक्षिसन्मुखम् ॥ कन्यातुलावृश्चिके च भास्करो यदि संस्थितः । पूर्वे मुखं न कर्तव्यं गृहं भवति निष्फलम् ॥ मकरे चैव धनुषि कुम्भे वा च दिवाकरे । याम्यादिशि मुखं कुर्याद्राजचौराग्निजं भयम् ॥ मीने मेषे वृषे चेव पश्चिमा दिग् च दूषिता । स्त्रीणां रोगं महाघोरं भवति ह्यतिदारुणम् ॥ मिथुने सिंहकर्कै च वेश्म नैवोत्तराननम् । दोषशोकभयं तत्तु न कुर्याच्च विचक्षणैः ॥ (अपराजित. 62, 3-11)

xxvii इससे यह भी प्रतीत होता है कि यह ग्रन्थ रचनाकाल के बाद पुनर्संस्कारित या पुनर्सम्पादित हुआ है क्योंकि श्लोकों के बीच-बीच भी अन्य पङ्क्तियाँ मिलती हैं और पाठ भेद भी है। इसके अतिरिक्त भुवनदेव ने शिवरात्रि का विस्तृत वर्णन किया है, वर्ष की सभी शिवरात्रियों का नामोल्लेख किया है। उसके काल में शिवरात्रि का महत्व इस बात से भी प्रतीत होता है कि किराडू-जोधपुर के 1152 ई. के एक अभिलेख में कुमारपाल के एक सामन्त आह्लणदेव द्वारा एक आज्ञा से शिवरात्रि पर पशुवध निषेध करने का निर्देश दिया गया है। (एन्यूअल रिपोर्ट ऑफ राजपूताना म्यूजियम 1931) हमें याद रखना चाहिए कि शिवरात्रि के व्रत की कथा आबू से जुड़ी हुई है और उस कथा में मूलतः शिकारी द्वारा मृग-मृगी का वध नहीं करने का वर्णन ही है। ग्रन्थ के साङ्गोपाङ्ग अध्ययन से प्रतीत होता है कि भुवनदेव जितना गुजरात से परिचित था, उतना ही वह गुजरात से लगे मेवाड़ क्षेत्र से भी परिचित था। बहुत सम्भव है कि वह सोमपुरा हो किन्तु बहुत विद्वान था। वह कुमारपाल के साथ मेवाड़ आया हो जैसा कि कुमारपाल के साथ दण्डपाल सज्जन भी आया था जिसे पाटी सहित चित्तौड़ दिया और वहाँ का राजा किया (जैसा कि कुमारपालदेव प्रबन्ध गाथा 14 में आया है) अथवा भुवनदेव मेवाड़ में उस काल में चल रही शिल्प गतिविधियों के क्रम में निमन्त्रण पर आया हो किन्तु जब परमारों के प्रभाव से मेवाड़ में समराङ्गणसूत्रधार जैसे ग्रन्थ प्रचलित रहे होंगे तो ऐसे में अपराजितपृच्छा जैसे ग्रन्थ की क्या आवश्यकता रही होगी ? ऐसे में कुछ कारण दिखाई देते हैं -

  1. प्रथमतः चालुक्यों का परमार भोज के साथ वैर-भाव था। भोज के पूर्वजों ने गुजरात पर अधिकार के लिए चढ़ाई की थी और वहाँ पर्याप्त रक्तपात हुआ था। इसके बदले में चालुक्यों ने भोज की राजधानी को रौंद डाला था, जैसा कि विक्रमाङ्कदेवचरित (अध्याय प्रथम) आदि से विदित होता है। ऐसे में चालुक्य नहीं चाहते थे कि वे परमार शासकों के किसी मत को स्वीकार करें। ग्रन्थों और विचारधारा के प्रसङ्ग में यह विचार कुछ अधिक ही चरितार्थ होता है। इसलिए भुवनदेव ने भोजकृत समराङ्गणसूत्रधार के श्लोकों को ज्यों-का-त्यों लिया भी है किन्तु कहीं भी भोज का नामोल्लेख नहीं किया है बल्कि उन्हें विश्वकर्मा-वचन कहा है।
  2. द्वितीयतः समराङ्गणसूत्रधार के निर्देश लगभग एक सदी पुराने हो चुके थे और कला में नवीनता देना अपरिहार्य हो चुका था। फिर मालवा व गुजरात में

xxviii

भौगोलिक स्थितियाँ पृथक् भी थीं। ऐसे में नवीन कला परम्परा का प्रवर्तन होना प्रासङ्गिक ही था। अरबों के हमले में विनाश को प्राप्त सोमनाथ व अन्य देवालयों के जीर्णोद्धार के साथ ही कला में नवीन धारा का प्रवाह अनिवार्य था। 3. सोमनाथ पर आक्रमण के साथ ही कई सोमपुरा शिल्पी वहाँ से तत्काल मेवाड़ आदि की ओर पलायन कर गए हों और उनमें से किसी को अपने सूत्रसन्तानों के लिए निर्देश तैयार करने हों और उसने अपनी स्मृति के अनुसार भोज के मतों को लिखते हुए नवीन ग्रन्थ की रचना की हो। बहुत सम्भव है कि इस ग्रन्थ की रचना चित्तौड़गढ़ स्थित समीधेश्वर (समाधीश्वर) मन्दिर में हुई हो क्योंकि वह भोजकृत रहा है और वहाँ चालुक्यों का अधिकार और परमारों की प्रभुत्व के अवसान के बाद भुवनदेव निश्चिन्त रहा हो। इस क्रम में मेवाड़ के शिल्पियों का वह प्राचीन 'सबद-सूत्र' उद्धृत करना अप्रासङ्गिक नहीं होगा जिसमें समीधेश्वर मन्दिर में विश्वकर्मा-अपराजित संवाद के रूप में इस ग्रन्थ की रचना का उल्लेख आता है। यह कहना न होगा कि जहाँ इतिहास के अन्य स्रोत मौन होते हैं, तब एक वातायन लोकसाहित्य भी खोलने का यत्न करता है। इस सबद-सूत्र में अपराजितपृच्छा की न केवल विषय-वस्तु दी गई है, बल्कि भुवनदेवाचार्य का परिचय भी है। भुवनदेव की शिल्पविद्या का प्राचीन 'सबद' (कण्ठ-दर-कण्ठ) स्मृत्यमान चम्पूतुल्य यह रचना इस प्रकार हैं— ॐ गुरुजी! विद्या में सिलपविद्या जो साधे सो पावै अमरापुरवास। जो भणै सो सधरै जावै कैलासवास॥ चितरकोट समाधीसर बैठ भणै चेजारो भवनदेव, गंधमंगरे वराज्या मादेव, रिसी वन्दावै। विस्क्रमाजी भाषै हुणै अपराजित- अगम, पछम, स्त्रस्टि री उतपत-लोप, जडखान, पिण्डखान, परेवखान, बीजखान, चार समन्द सतखण्डी प्रथ्वी, सात लोक, नौ नाथ, साम्भरूं मेवाड़। रिश्यां री सन्ताण। गणतभणै, जोतीस भणै, भणत भणै, गड़त भणै, जोऊं लेयर हाथ तईं नापै, मिण्डीऊं करोड़ नापै। आवक आछौ लागै, जावतो रंज लागै। भाण्डता देवल जोड़े, नवा करै। चोथ, सिवरात, मैल-माळिया, तळाब-नाड़ी-बावड़ी-कूडा-निवाण, नीम-सीम, इण्ड-मीण्ड, देवळ-मूरत, पूजा-परसाद, राग-रागणी, नरतन-किरतन कोइ भेद बाकी नहीं। आठ सेहस गरन्थ माण्ड्या, दो पोटी पानड़ा। जदी चाल्या चीरवे ने नागदा ने धोके है। कैलास नगरी में राजा वैसळ सन्माने। आबू रे मथारे हुणै टंकोड़, पाथोड़, राठौड़ चाक दे, क्रमचारो देवळ बांधता। अठी नाळे तो मारवाड़, वठी जावै तो गुजरात। वणै सूरी जो चेला वदावै। करै भगती वदावै

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अगती। भुवनदेव री वात कुण भणै। मैल वणातो राजा, देवळ बांधतो सूतरपत, मठ वणातो जत्ती, मूरत घड़तो रूपौ, चणतो चेजारो, पीणतो पिंजारो, गावतो गवैयो, नाचतो नच्चयौ, कटार-तरवार-नेजो चलावतो सूर, वणती विंदणी, ओतरतो भेरू रो भोपो। भवन सुधर्यां भव सुधरे, सुधरे भजन भाव। विस्क्रमाजी ते उपराजित सुत सन्ता (न) रे ग्यान॥ इति सिलप-सबद सम्पूर्ण भयो, अनन्त क्रोड़ सिद्धां में गादी बैठ गुरु माराज भाषिया। साईं ने सलाम, गुरांजी ने प्रणाम, नाथजी कूं आदेस, सब सन्तां ने हरे हर। (सांवरियाजी मन्दिर मण्डफिया के शिल्पी कजोड़ीदास से 1989 में सङ्कलित) अर्थ :- ॐ गुरुजी, विद्याओं में शिल्पविद्या प्रमुख है। इसकी जो साधना करता है, वह देवलोक में निवास करता है। जो इसे पढ़ता है, वह कैलासवास प्राप्त करता है। चित्रकूट (चित्तौड़गढ़) के समाधीश्वर मन्दिर में बैठकर स्थपति भुवनदेव रचना-पाठ करता है। गन्धमादन पर्वत पर विराजित शिव की ऋषि वन्दना करते हैं। विश्वकर्मा कहते हैं और अपराजित सुनते हैं। वे पूर्व मत, परवर्ती मत, सृष्टि की उत्पत्ति, प्रलय, जड़ योनि, पिण्डयोनि, श्वेदज, बीज योनि कहते हैं। चारों समुद्र, सप्तखण्डा पृथ्वी, सप्त लोक, नौ नाथ के बारे में बताते हैं। साम्भर से लेकर मेवाड़ तक का देश-वृतान्त कहते हैं। ऋषियों की वंश परम्परा बताते हैं। इसी क्रम में गणित का वर्णन, ज्योतिष का वर्णन, शिक्षा-व्याकरण का वर्णन, प्रस्तर व उसकी गड़ाई का वर्णन करते हैं। यव से लेकर हस्त का प्रमाण बताते हैं। शून्य से लेकर कोटि तक गणना बताते हैं। वास्तु में आय श्रेष्ठ व व्यय अनुचित होता है। जीर्ण देवालय का उद्धार, नवीनीकरण बताते हैं। चतुर्थी व्रत, शिवरात्रि, महल-हवेली, तालाब, जलाशय, बावड़ी, कूप, शस्य, शिलान्यास, शिखर, आमलक, कलश, देवालय, मूर्ति, पूजा-विधि, प्रसाद बताते हैं। इसी क्रम में राग-रागिनी, नृत्य, कीर्तन मिलाकर कोई शिल्प विद्या का भेद शेष नहीं रहता। आठ हजार (श्लोकों) का ग्रन्थ प्रमाण लिखते हैं। दो बैलों पर उठाने योग्य भार प्रमाण के पत्रों पर यह शास्त्र लिखा गया। भुवनदेव (चित्तौड़गढ़) से निकलकर चीरवा होकर नागदा (मेवाड़ की प्राचीन राजधानी) जाते हैं। कैलासपुरी में राज वैजल (विजयसिंह) सम्मानित करता है। आबू के पर्वत पर इस ग्रन्थ को टाँकी चलाने वालों ने सुना, पत्थर तोड़ने वालों ने सुना। राठौड़ों ने सुना व तलच्छन्द बनवाया। वहाँ देवालय निर्माण में जुटे कर्मचारियों ने सुना। इधर देखें तो मारवाड़, उधर देखें तो गुजरात तक इस ग्रन्थ का परिचय फैला। इसके बाद भुवनदेव तत्कालीन सूरीश्वर का शिष्य होता है, शिष्यों को बढ़ाता है। भक्ति करता है, जन्म सुधारता है। इस भुवनदेव की वार्ता को कौन

XXX सुनता है? महल बनाने वाला राजा, देवालय बनाने वाला स्थपति, मठ बनाने वाला यति, मूर्ति तैयार करने वाला रूपाङ्कनकर्ता, भित्ति की चुनाई करता चेजारा, रूई की पिंजाई करने वाला पिंजारा, गाने वाला गायक, नाचने वाला नर्तक, कटार-तलवार, भाला चलाने वाला शूरवीर, शृङ्गार करने वाली दुल्हन, भावाविष्ट होकर देवाराधना करने वाला भोपा सुनता है। यदि भवन सुधर जाता है तो भव (संसार) सुधर जाता है। भजन-भाव सफल-सार्थक हो जाते हैं। विश्वकर्माजी से अपराजित की ज्ञान- सन्तानों (मानसपुत्रों) का यह ज्ञान है। इस प्रकार शिल्प सबद पूर्ण हुआ। अनन्त करोड़ सिद्धों के बीच विराजित गुरु महाराज ने इसे कहा है। सांई का सलाम, गुरुदेव का प्रणाम, नाथजी को आदेश, सभी सन्तों से कहना हरे-हर। इस ग्रन्थ के मेवाड़ में रचित होने के कई प्रमाण इसी में अन्तःसाक्ष्य के रूप में प्राप्त होते हैं जिनको यथास्थान पाद टिप्पणियों के रूप में दिया गया है। इसको अपराजित के नाम लिखने के मूल में यह कारण स्पष्ट होता है कि मेवाड़ को शिल्पधाम के रूप में प्रतिष्ठित करने का श्रेय गुहिल वंशी अपराजित को ही दिया जाता है। प्रो. डी. आर. भाण्डारकर (इपिग्राफिया इण्डिका जिल्द 39, पृष्ठ 190), कविराजा श्यामलदास (वीरविनोद भाग 1, पृष्ठ 252) आदि इतिहासकारों ने मेवाड़ के गुहिल राजवंश के राजा शील या शीलादित्य (शिलालेख 646 ई.) के पुत्र के रूप में अपराजित (शिलालेख 661 ई.) को परिगणित किगा है। यद्यपि बापा रावल का आद्य-पुरुष के रूप में नाम लिया जाता है किन्तु इतिहासविदों में यह विवाद ही है कि बापा किसी का नाम है अथवा विरुद? क्योंकि कई प्राचीन शिलालेखों में बापा, बाष्प, बप्प आदि नामाभिधानों का प्रयोग हुआ है। (नागरी प्रचारिणी पत्रिका भाग 1, पृष्ठ 248-50 एवं टिप्पणियाँ) इसी प्रकार कुम्भलगढ़ की महाराणा कुम्भाकालीन (1433-1468 ई.) प्रशस्ति में आया है- तस्मिन् गुहिलवंशेऽभूद्भोजनामावनीश्वरः । तस्मान्महीन्द्रनागाह्नो बप्पाख्यश्चापराजितः ॥ (श्लोक 139) यहाँ बप्पा नाम वाले राजा के बाद अपराजित का वर्णन आया है, ऐसे में शीलादित्य का नाम बप्पा होने का मत कर्नल जेम्स टॉड ने प्रतिपादित किया। (कर्नल जेम्स टॉड जिल्द 1, पृष्ठ 259-69) किन्तु, शीलादित्य के सामोली अभिलेख (643 ई.) में उसके लिए यह अपर नामाभिधान नहीं आया है, इसी आधार पर इतिहासकार गौरीशङ्कर ओझा ने इस तर्क को निर्मूल कह दिया। (उदयपुर राज्य का इतिहास, पृष्ठ 104), तथापि यहाँ यह अवश्य हो सकता है कि अपराजित का यह अपरनाम रहा हो; चूंकि एकलिंग माहात्म्य के आधार पर बप्पा रावल का समय 734-753 ई. का

xxxi निर्धारित किया गया है, ऐसे में अपराजित से पूर्व बप्पा का होना अथवा अपराजित व बप्पा का अभिन्न होना बताने के लिए अन्य कोई प्रमाण नहीं है और फिर शीलादित्य की प्रशस्ति गुजरात की सीमा वाले सामोली से मिली है जबकि अपराजित की प्रशस्ति नागदा से। नागदा मेवाड़ की प्राचीन राजधानी रहा है, ऐसे में मेवाड़ के प्रथम प्रतापी शासक के रूप में अपराजित का होना प्रतीत होता है बहुत सम्भव है कि उसने नागदा-कैलाशपुरी क्षेत्र को अधिकृत रखने वालों से घोर सङ्घर्ष किया हो और इस क्षेत्र को गुहिलाधिकृत किया हो। इसी के वंशधर बापा ने 734 ई. में मान मौर्य से चित्तौड़गढ़ का राज्य लिया एवं पूरे मेवाड़ को गुहिल वंशाधिपत्य करने का यत्न किया। सम्भवतः भुवनदेवाचार्य इस तथ्य से परिचित था, ऐसे में उसने मेवाड़ में गुहिल राज्य के प्रवर्तक अपराजित को प्रश्नकर्ता के रूप में प्रस्तुत किया हो। इस क्षितिभृत अपराजित ने मेवाड़ की प्राचीन राजधानी में स्थापत्य की परम्परा का प्रवर्तन किया, उसी के दरबारी वराहसिंह की पत्नी यशोमति ने कुण्डा ग्राम (उदयपुर जिलान्तर्गत बड़गाँव पंचायत समिति) में कैटभ-रिपु विष्णु का जहाज-आकार में मन्दिर बनवाया था। अपराजित की उदयपुर जिलान्तर्गत कुण्डेश्वर से प्राप्त 661 ई. की प्रशस्ति में कहा गया है कि गुहिल वंश के तेजस्वी राजा अपराजित ने सब दुष्टों का विनाश किया, अनेक राजा उसके आगे शिरावनत थे। उसने शिवात्मज पुत्र महाराज वराहसिंह को, जिसकी शक्ति का भञ्जन कोई नहीं कर सका और जिसने भयङ्कर शत्रुओं को परास्त किया तथा जिसकी यशकीर्ति दिग्दिगन्त तक प्रसारित थी, अपना सेनापति बनाया। अरुन्धती के समान विनयवाली उस वराहसिंह की पत्नी यशोमती ने लक्ष्मी, यौवन और वित्त को क्षणिक मानकर संसार रूपेण विषय समुद्र को तैरने के निमित्त नाव रूपी कैटभ-रिपु विष्णु का मन्दिर बनवाया। यह लेख इस प्रकार हैं- ॐ नमः स्पृष्ठा वक्षसि लीलया कररूहैः काचित्कचाकर्षणादन्या कामपरेण पादपतनैः कण्ठग्रहेणापरा धन्यास्ता। भुवने सुरेन्द्रतनयो याः प्रापिता निर्वृति स्मृत्वेत्थं स्पृहयन्ति गोपवनिता यस्मै सपायाद्धरि ॥ लक्ष्मीलीलोपधानं प्रलयजलनिधिस्थायिनो- गण्डशैलादर्षोद्धृत्ता सुरेन्द्रद्रुम गहनवनच्छेददक्षाः कुठाराः। संसारापारवारि प्रसररयमुत्तारेणे बद्धकुक्ष्याः दोर्दण्डाः पान्तुशौरेस्त्रिभुवन भवनोत्तम्भस्तम्भभूताः॥ राजा श्रीगुहिलान्वयामल पयोराशौ स्फुरद्दीधिति ध्वस्तध्वान्त समूहदुष्टसकलव्यालावलेपान्तकृत्। श्रीमानित्यऽपराजितः क्षितिभृतामभ्यर्चितो मूर्धभिः वृत्तस्वच्छतयैव कौस्तुभमणिर्जातो जगद्भूषणम्॥ शिवात्मजो

१. सूत्र १-५०: विश्वकर्मा-अपराजित संवाद, सृष्टि-क्रम, वास्तुपुरुष एवं रेखा-प्रमाण

xxxii खण्डितशक्तिसम्पद्धर्यः समाक्रान्तभुजङ्गशत्रु तेनेन्द्रवत्स्कन्द इव प्रणेता वृत्तो महाराज वराहसिंहः ॥ जनगृहीतमपि क्षयवर्जितं धवलमप्यनुरञ्जितभूतलं स्थिरमपि प्रविकासि दिशोदशभ्रमति यस्य यशो गुणवेष्टितम् ॥ तस्य नाम दधति यशोमती गेहिनी प्रणयिनी यशोमती चित्तमुत्पथगतं निरुन्धती सा बभूव विनयादरुन्धती ॥ श्रीर्व्वन्धकी स्थागुणरता च गौरी वैधव्यदुःखोपहता रतिश्च...॥ (जे. ए. एस. बी. 1935, पृष्ठ 122, इपिग्राफिया इण्डिका भाग 4, पृष्ठ 31-32) वैसे अपराजित को विश्वकर्मा का मानसपुत्र समराङ्गणसूत्रधार में कहा गया है— आययुर्विश्वकर्माणं चत्वारो मानसाः सुताः॥ जयो विजयसिद्धार्थी चतुर्थश्चापराजितः । (समराङ्गण. 2, 2-3) फिर जय, विजय व सिद्धार्थ के नाम से ग्रन्थों का प्रणयन हो चुका था, जैसा कि भुवनदेव ने भी सूचित किया है, ऐसे में अपराजित के नाम पर ही ग्रन्थ रचना शेष रही होगी। यह नामाभिधान मेवाड़ाधिपति अपराजित से मेल भी खाता था, फिर भुवनदेव के जीवनकाल में अपराजित नाम विशेषतः चलन में रहा था, जैसा कि जालोर-भीनमाल से प्राप्त 1108 ई. के ताम्रपत्र में देवराट् के पुत्र के रूप में अपराजित का नाम आया है— चन्दनोमहीपस्तन्नन्दनो देवराट्। तत्सूनुश्चपराजितः...; जालोर के तोपखाना से प्राप्त 1117 ई. के अभिलेख में भी ये ही नामाभिधान आए हैं। (शोधपत्रिका भाग 1, अङ्क 2, 1956, पृष्ठ 1-12 एवं इपिग्राफिया इण्डिका भाग 42, पृष्ठ 41) इसी प्रकार राजस्थान के जालोर के निकटस्थ सुन्धा चामुण्डा माता की 1262 ई. प्रशस्ति में अपराजितेश के मन्दिर का वर्णन आया है— प्रोत्तुङ्गेप्यपराजितेश भवने सौवर्णकुम्भध्वजारोपी रूप्यमेखला वितरणस्तस्यैव देवस्य यः ॥ चक्रे श्रीरपराजितेश भवने शाला तथास्यां रथः कैलाश प्रतिमस्त्रिलोक कमलालङ्कार रत्नोच्चयः। येन क्षोणि पुरन्दरेण कृतिना मानन्द संवित्तये भाग्यं वा निजमेव पर्वततुलां नीतं समन्तादपि ॥ (इपिग्राफिया इण्डिका भाग 5, पृष्ठ 74) इस प्रशस्ति के अनुसार वहाँ पर चाचिगदेव ने स्वर्ण कलश और ध्वजा चढ़ाई, चाँदी की मेखला-लेन का वितरण किया, अपराजितेश के भवन की शाला के लिए रथ बनवाया जो कैलाश के समान प्रतीत होता था और उस पर रत्न-कमलों का अलङ्करण था। यह अपराजितेश मन्दिर के जीर्णोद्धार और उसके लिए व्यवस्थाओं का सशक्त सन्दर्भ देता है। यह मन्दिर लगभग एक शताब्दी पूर्व बना होगा और यह प्रतीत होता है कि वह काल अपराजितपृच्छा की रचना का ही रहा होगा। लोक-सबद में भुवनदेव का आबू गमन का सङ्केत है और तत्कालीन जाबालीपुर (जालोर) वहाँ से अधिक दूर भी नहीं है जो कि तब ज्ञान-विज्ञान के केन्द्र के रूप में ख्यात था। उक्त

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सबद में ही भुवनदेव के सूरीश्वर से दीक्षित होने का सङ्केत भी हैं किन्तु इस सम्बन्ध में समकालीन स्रोत मौन हैं। उदयपुर जिलान्तर्गत चीरवा ग्राम जिसका कि सङ्केत उक्त सबद में भुवनदेव की यात्रा के प्रसङ्ग में आया है, से प्राप्त 1273 ई. की प्रशस्ति में अवश्य भुवनचन्द्र सूरी का नाम आया है। यह प्रशस्ति भुवनचन्द्र सूरी के शिष्य रत्नप्रभसूरी ने चित्तौड़गढ़ में रहते हुए रची थी। (इपिग्राफिया इण्डिका भाग 27, पृष्ठ 285-92 एवं वियना ओरियण्टल जर्नल जिल्द 21, पृष्ठ 155-162) किन्तु, इस प्रशस्ति में अन्य किसी भुवनचन्द्र सूरी का वर्णन रहा हो क्योंकि इतने वर्षों तक भुवनदेवाचार्य के शिष्य का रहना सम्भव प्रतीत नहीं होता तथापि चीरवा का महारावल पद्मसिंह द्वारा तत्कालीन तलारक्ष योगराज को मिलना और वहाँ पर योगेश्वर शिव व योगेश्वरीदेवी के मन्दिर के निर्माण, उसके पिता द्वारा उद्धरण स्वामी-विष्णु के मन्दिर की प्रतिष्ठा और पुत्र मदन द्वारा प्रायश्चित स्वरूप योगेश्वर व योगेश्वरी के मन्दिर के जीर्णोद्धार एवं उक्त देवालयों के नैवेद्यार्थ कालेला सरोवर के पृष्ठभाग की गोचर भूमि से दो खेतों के भेंट करने का वर्णन आया है और यह वर्णन भुवनदेव के ग्रन्थोक्त निर्देश के समरूप ही है। इसी प्रकार मेवाड़ के आड़ा-अव्ला पर्वत (आड़ावल या अरावली पर्वतमाला, तुलनीय : दृश्यते पर्वतो यत्र ह्यनेकशेखराकृतिः । राजा सेनावधं कुर्यान्मासेनाऽत्र न संशयः ॥ सूत्र 203, 8), जावर जैसे खदान क्षेत्र, वर्तना जैसे कला-संसाधनों आदि से भुवनदेव का परिचित होना उसकी इस क्षेत्र से सम्बद्धता को दर्शाता है फिर इस रूप में भी वह मेवाड़ का स्मरण करता है कि तीन भूमिमध्य मालिका-हर्म्य वह बनवा सकता है जो सूर्यवंशी हो और शिव का आराधक हो (त्रिभूमिमध्यकर्त्तव्या मालिका क्रमतः स्थिता । सूर्यवंशोद्भवाः शैवा वतरन्ति यदा महीम् ॥ तेषां वेश्मनि कार्याणि नान्येषां तु कदाचन । सूत्र 69, 43-44) यह पहचान भी मेवाड़ के राजवंश की रही है, जिसे रघुकुल के समान कीर्ति-प्रसारकर्ता और सूर्यवंशी माना जाता है और वह एकलिंगजी का आराधक रहा है, तथापि इस दिशा में पर्याप्त शोध की सम्भावना अभी समाप्त नहीं हुई है। प्रस्तुत पाठ के सम्पादन के आधार : अपराजितपृच्छा का प्रस्तुत संस्करण पूर्ववर्ती प्रकाशित पाठ का अनुवाद नहीं है बल्कि इसमें कई नवीन पाण्डुलिपियों का सहयोग भी लिया गया है। उल्लेखनीय है कि इस ग्रन्थ के प्रथम संस्करण के लिए पोपटभाई अम्बाशङ्कर मंकड ने निम्न मातृकाओं का सहारा लिया था—

XXXIV बी-1 पाण्डुलिपि और बी-2 पाण्डुलिपि। ये दोनों ही मातृकाएँ बड़ौदा ओरियण्टल इंस्टीट्यूट में क्रमशः 3587 एवं 9214 पंजीकृत संख्या पर विद्यमान हैं। इनमें से पहली मातृका में 238 सूत्र पूर्ण एवं 239वाँ सूत्र अपूर्ण रूप से प्राप्त होता है और यह अधिक पुरानी नहीं है जबकि दूसरी मातृका में 225 सूत्र मिलते हैं जिनमें से 101 से 156 सूत्र नदारद हैं। इनमें लगभग 7500 श्लोक प्राप्त हुए। इस ग्रन्थ के प्रकाशन के बाद एक मातृका प्रसिद्ध शिल्पशास्त्री प्रभाशङ्कर ओघड़भाई सोमपुरा और मधुसूदन ढांकी को अहमदाबाद के श्रीमन्सुखलालभाई सोमपुरा से प्राप्त हुई थी। मुझे अपराजितपृच्छा की एक पाण्डुलिपि क्रमशः प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान के जोधपुर मुख्यालय से (संख्या 18078-12) और एक इसी प्रतिष्ठान की उदयपुर शाखा से भी मिली जिनमें एक-दो अध्याय ही मिले जबकि एक अपूर्ण मातृका डूंगरपुर जिले के सागवाड़ा निवासी वयोवृद्ध स्थपति श्री रघुनाथ सोमपुरा से साभार प्राप्त हुई। इसमें 137 अध्याय हैं। देवालय शिखर विधान सम्बन्धी कुछ अध्याय बड़ौदा में विद्यमान सूत्रधार गोविन्द कृत 'कलानिधि' (संख्या 8276 पृष्ठ 9, 11001 पृष्ठ 11 तथा 11069 पृष्ठ 23) में प्राप्त हुए जिनका सम्पादन और उपयोग मैंने पूर्व में उस ग्रन्थ के लिए किया था। कई श्लोकों का संशोधन, परीक्षण गुजराती में प्रकाशित 'बृहच्छिल्पशास्त्र' एवं 'प्रासादमण्डनम्' के आधार पर किया गया है। इनके अतिरिक्त इस ग्रन्थ के मुख्य उपस्कारक समराङ्गण सूत्रधार के आधार पर भी सैकड़ों श्लोकों का परीक्षण कर यथास्थल उनका सम्पादन कर, पाद टिप्पणियाँ दी गई हैं। इसके कई श्लोक ज्ञानप्रकाश दीपार्णव में भी मिलते हैं। इस प्रकार अपराजितपृच्छा के प्रकाशित पाठ में जहाँ कहीं खण्डित और भ्रष्ट श्लोक थे, उनकी पूर्ति और संशोधन सम्भव हुआ वहीं कई नवीन श्लोक भी प्राप्त हुए। इस प्रयास में लगभग पाँच सौ श्लोकों की पूर्ति भी हुई है। हालांकि ग्रन्थकार ने शिव के नौ ताण्डवों का सन्दर्भ कहाँ से उद्धृत किया, यह पता नहीं चल सका किन्तु नाट्यशास्त्र, मयमतादि के आधार पर क्षेपक रूप में उनकी किञ्चित पूर्ति का प्रयास किया गया है। इसी प्रकार स्त्री-पुरुष लक्षणाध्याय में खण्डित श्लोकों की पूर्ति बृहत्संहिता की भट्टोत्पलीय विवृत्ति और स्कन्दपुराण आदि के सहारे की गई है किन्तु सर्वत्र यह ध्यान रखा गया है कि श्लोकों की पूर्ति इस ग्रन्थ की अपेक्षा प्राचीन पाठों के सहारे ही की जाए। यथास्थान सन्दर्भ इस ग्रन्थ को हमारी ग्रन्थ परम्परा से संयुक्त करता हुआ प्रतीत होगा, ऐसा मैंने अपनी समझ के अनुसार प्रयत्न किया है।

विषयानुक्रमणिका गन्धमादनो नाम प्रथमं सूत्रम् ॥ १ ॥ 1-10 ग्रन्थस्य निर्बाधपरिसमाप्त्यर्थं परम्परानुमितश्रुतिबोधितकर्त्तव्यताकं स्वाभीष्ट गणाधीशादिदेवानामाशीर्वादस्वरूपं मङ्गलम् - 1 ग्रन्थार्थं गन्धमादनपर्वताश्रये प्रवर्तनमाह - 1 तत्रोद्भूत सरितादीनां - 2 अष्टाशीतितापसानां तपश्चर्या - 4 तत्र वनस्पतिवर्णनं - 5 तत्र विश्वकर्मदिव्याश्रमवर्णनम् - 5 तत्र सङ्गीतादीनामाह - 7 भवनशोभावर्णनमाह - 7 तत्र भगवान् विश्वकर्मवर्णनमाह - 8 विश्वकर्मनामपर्यायदीनां - 9 अपराजित प्रश्नं - 9 सूत्रलक्षणं द्वितीयं सूत्रम् ॥ २ ॥ 10-14 सूत्रधारेण ज्ञातव्य विषयाः - 10 ब्रह्माण्डोत्पत्तिर्नाम तृतीयं सूत्रम् ॥ ३ ॥ 14-19 ब्रह्माण्डोत्पत्ति वर्णनमाह - 15 पातालद्वीपार्णवसूत्रणं (सूचनं) चतुर्थ सूत्रम् ॥ ४ ॥ 20-25 रुद्रभागोद्भवालोकादीनां - 20 पृथ्वीविस्तारवर्णनं - 21 पातालवर्णनं - 21 द्वीपनामवर्णनञ्च - 22 सागरनामानि - 23 कुलादीनां शैलनामानि - 23 अथाङ्गुलात्योजनप्रमाणम् - 25 सप्तोर्ध्वलोको नाम पञ्चमं सूत्रम् ॥ ५ ॥ 25-29 सप्तोर्ध्वलोकवर्णनं - 25

xxxvi अष्टशक्त्युद्भवो नाम षष्ठं सूत्रम् ॥ ६ ॥ 29-32 अथाष्टशक्तिनामावलिः — 30 तस्यवंशाः — 30 विप्रक्षत्रियवैश्यशूद्राणां गोत्रसंख्याः — 32 सृष्टिसंसारावतारणं सप्तमं सूत्रम् ॥ ७ ॥ 32-36 सप्तपातालराज्योद्भवो नामाष्टमं सूत्रम् ॥ ८ ॥ 36-41 नवकुलनागराजनामावली — 36 पद्मेशराज्यवासिनामाह — 37 कर्कोटकराज्यवासिनामाह — 38 पुण्डरीकराज्यनिवासिनामाह — 39 अथानन्तराज्यनिवासिनामाह — 39 रसातलनिवासिनामाह — 40 इत्यमनन्तर पातालनिवासिनामाह — 40 भूराज्यनिवेशानो नाम नवमं सूत्रम् ॥ ९ ॥ 42-45 जम्बूद्वीपवर्णनमाह — 43 नवक्षेत्रनामानि — 43 तत्रैव गन्धर्वविद्याधराक्षनिवासिनामाह — 44 संसारभूतग्रामोत्पत्तिपञ्चतत्त्वनिर्णयो नाम दशमं सूत्रम् ॥ १० ॥ 45-50 षडाश्रयाः — 48 एवं योगादीनामाह — 48 पञ्चतत्त्वपञ्चगुणनिर्णयो नामैकादशं सूत्रम् ॥ ११ ॥ 50-54 पिण्डनिर्माणचरणमाह — 51 इत्यमनन्तरमहाभूतादिकमाह— 53 गर्भविज्ञानोद्भवो नाम द्वादशं सूत्रम् ॥ १२ ॥ 54-57 कृतयुगानुरूपेणज्ञानमाह — 55 कर्मज्ञानोद्भवो नाम त्रयोदशं सूत्रम् ॥ १३ ॥ 58-62 हंसयोगसाधनमाह — 60 हृदयकमलमाह — 61 शरीरस्थगुणदोषादीनां — 62