भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 33, कुल 535 में से

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XXXIV बी-1 पाण्डुलिपि और बी-2 पाण्डुलिपि। ये दोनों ही मातृकाएँ बड़ौदा ओरियण्टल इंस्टीट्यूट में क्रमशः 3587 एवं 9214 पंजीकृत संख्या पर विद्यमान हैं। इनमें से पहली मातृका में 238 सूत्र पूर्ण एवं 239वाँ सूत्र अपूर्ण रूप से प्राप्त होता है और यह अधिक पुरानी नहीं है जबकि दूसरी मातृका में 225 सूत्र मिलते हैं जिनमें से 101 से 156 सूत्र नदारद हैं। इनमें लगभग 7500 श्लोक प्राप्त हुए। इस ग्रन्थ के प्रकाशन के बाद एक मातृका प्रसिद्ध शिल्पशास्त्री प्रभाशङ्कर ओघड़भाई सोमपुरा और मधुसूदन ढांकी को अहमदाबाद के श्रीमन्सुखलालभाई सोमपुरा से प्राप्त हुई थी। मुझे अपराजितपृच्छा की एक पाण्डुलिपि क्रमशः प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान के जोधपुर मुख्यालय से (संख्या 18078-12) और एक इसी प्रतिष्ठान की उदयपुर शाखा से भी मिली जिनमें एक-दो अध्याय ही मिले जबकि एक अपूर्ण मातृका डूंगरपुर जिले के सागवाड़ा निवासी वयोवृद्ध स्थपति श्री रघुनाथ सोमपुरा से साभार प्राप्त हुई। इसमें 137 अध्याय हैं। देवालय शिखर विधान सम्बन्धी कुछ अध्याय बड़ौदा में विद्यमान सूत्रधार गोविन्द कृत 'कलानिधि' (संख्या 8276 पृष्ठ 9, 11001 पृष्ठ 11 तथा 11069 पृष्ठ 23) में प्राप्त हुए जिनका सम्पादन और उपयोग मैंने पूर्व में उस ग्रन्थ के लिए किया था। कई श्लोकों का संशोधन, परीक्षण गुजराती में प्रकाशित 'बृहच्छिल्पशास्त्र' एवं 'प्रासादमण्डनम्' के आधार पर किया गया है। इनके अतिरिक्त इस ग्रन्थ के मुख्य उपस्कारक समराङ्गण सूत्रधार के आधार पर भी सैकड़ों श्लोकों का परीक्षण कर यथास्थल उनका सम्पादन कर, पाद टिप्पणियाँ दी गई हैं। इसके कई श्लोक ज्ञानप्रकाश दीपार्णव में भी मिलते हैं। इस प्रकार अपराजितपृच्छा के प्रकाशित पाठ में जहाँ कहीं खण्डित और भ्रष्ट श्लोक थे, उनकी पूर्ति और संशोधन सम्भव हुआ वहीं कई नवीन श्लोक भी प्राप्त हुए। इस प्रयास में लगभग पाँच सौ श्लोकों की पूर्ति भी हुई है। हालांकि ग्रन्थकार ने शिव के नौ ताण्डवों का सन्दर्भ कहाँ से उद्धृत किया, यह पता नहीं चल सका किन्तु नाट्यशास्त्र, मयमतादि के आधार पर क्षेपक रूप में उनकी किञ्चित पूर्ति का प्रयास किया गया है। इसी प्रकार स्त्री-पुरुष लक्षणाध्याय में खण्डित श्लोकों की पूर्ति बृहत्संहिता की भट्टोत्पलीय विवृत्ति और स्कन्दपुराण आदि के सहारे की गई है किन्तु सर्वत्र यह ध्यान रखा गया है कि श्लोकों की पूर्ति इस ग्रन्थ की अपेक्षा प्राचीन पाठों के सहारे ही की जाए। यथास्थान सन्दर्भ इस ग्रन्थ को हमारी ग्रन्थ परम्परा से संयुक्त करता हुआ प्रतीत होगा, ऐसा मैंने अपनी समझ के अनुसार प्रयत्न किया है।

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