अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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सबद में ही भुवनदेव के सूरीश्वर से दीक्षित होने का सङ्केत भी हैं किन्तु इस सम्बन्ध में समकालीन स्रोत मौन हैं। उदयपुर जिलान्तर्गत चीरवा ग्राम जिसका कि सङ्केत उक्त सबद में भुवनदेव की यात्रा के प्रसङ्ग में आया है, से प्राप्त 1273 ई. की प्रशस्ति में अवश्य भुवनचन्द्र सूरी का नाम आया है। यह प्रशस्ति भुवनचन्द्र सूरी के शिष्य रत्नप्रभसूरी ने चित्तौड़गढ़ में रहते हुए रची थी। (इपिग्राफिया इण्डिका भाग 27, पृष्ठ 285-92 एवं वियना ओरियण्टल जर्नल जिल्द 21, पृष्ठ 155-162) किन्तु, इस प्रशस्ति में अन्य किसी भुवनचन्द्र सूरी का वर्णन रहा हो क्योंकि इतने वर्षों तक भुवनदेवाचार्य के शिष्य का रहना सम्भव प्रतीत नहीं होता तथापि चीरवा का महारावल पद्मसिंह द्वारा तत्कालीन तलारक्ष योगराज को मिलना और वहाँ पर योगेश्वर शिव व योगेश्वरीदेवी के मन्दिर के निर्माण, उसके पिता द्वारा उद्धरण स्वामी-विष्णु के मन्दिर की प्रतिष्ठा और पुत्र मदन द्वारा प्रायश्चित स्वरूप योगेश्वर व योगेश्वरी के मन्दिर के जीर्णोद्धार एवं उक्त देवालयों के नैवेद्यार्थ कालेला सरोवर के पृष्ठभाग की गोचर भूमि से दो खेतों के भेंट करने का वर्णन आया है और यह वर्णन भुवनदेव के ग्रन्थोक्त निर्देश के समरूप ही है। इसी प्रकार मेवाड़ के आड़ा-अव्ला पर्वत (आड़ावल या अरावली पर्वतमाला, तुलनीय : दृश्यते पर्वतो यत्र ह्यनेकशेखराकृतिः । राजा सेनावधं कुर्यान्मासेनाऽत्र न संशयः ॥ सूत्र 203, 8), जावर जैसे खदान क्षेत्र, वर्तना जैसे कला-संसाधनों आदि से भुवनदेव का परिचित होना उसकी इस क्षेत्र से सम्बद्धता को दर्शाता है फिर इस रूप में भी वह मेवाड़ का स्मरण करता है कि तीन भूमिमध्य मालिका-हर्म्य वह बनवा सकता है जो सूर्यवंशी हो और शिव का आराधक हो (त्रिभूमिमध्यकर्त्तव्या मालिका क्रमतः स्थिता । सूर्यवंशोद्भवाः शैवा वतरन्ति यदा महीम् ॥ तेषां वेश्मनि कार्याणि नान्येषां तु कदाचन । सूत्र 69, 43-44) यह पहचान भी मेवाड़ के राजवंश की रही है, जिसे रघुकुल के समान कीर्ति-प्रसारकर्ता और सूर्यवंशी माना जाता है और वह एकलिंगजी का आराधक रहा है, तथापि इस दिशा में पर्याप्त शोध की सम्भावना अभी समाप्त नहीं हुई है। प्रस्तुत पाठ के सम्पादन के आधार : अपराजितपृच्छा का प्रस्तुत संस्करण पूर्ववर्ती प्रकाशित पाठ का अनुवाद नहीं है बल्कि इसमें कई नवीन पाण्डुलिपियों का सहयोग भी लिया गया है। उल्लेखनीय है कि इस ग्रन्थ के प्रथम संस्करण के लिए पोपटभाई अम्बाशङ्कर मंकड ने निम्न मातृकाओं का सहारा लिया था—