अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंxxv किया है और सम्मान स्वरूप दानादि का विधान भी वर्णित किया है। प्रतीत होता है कि अपराजितकार उस घटना का दर्शक रहा होगा और यह ग्रन्थ 1150 ई. के आसपास लिखा जा चुका था अथवा लिखा जा रहा था। किन्तु, यह सन्देह स्थल- स्थल पर प्रकट होता है कि भुवनदेव गुजरात से लगे प्रदेश मेवाड़ से परिचित था। यद्यपि कुमारपाल ने मेवाड़ को विजित किया था, ऐसे में धारानगरी के परमारों के पश्चात् मेवाड़ गुजरात के चालुक्यों के अधिकार में रहा। कुमारपाल ने चित्तौड़गढ़ स्थित परमार भोज के बनवाए समीधेश्वर मन्दिर में पूजन किया था और वहाँ स्वर्णकलश चढ़ाकर भूमिदान किया— सन्निवेश्य शिविरं पृथु तत्र त्रासिता सहनभूपतिचक्रम्। चित्रकूटगिरि पुष्कलशोभां द्रष्टुकुमारनृपतिः कुतुकेन॥ यदुच्चसुरसद्माग्रोपरिष्टात् प्रपतन् सदा। रथं नयत्यलं मन्दं मन्दं भङ्गभयाद्रविः॥ यत्सौधशिखरारूढकामिनीमुखसन्निधौ। वर्तमानो निशानाथो लक्ष्यते लक्ष्मलेखया॥ (प्रो. कीहॉर्न सम्पादित चित्तौड़गढ़ स्थित कुमारपाल का अभिलेख : इण्डियन एण्टीक्वेरी भाग 2, पृष्ठ 521) इस समस्त पृष्ठभूमि में मेरा विचार है कि यह ग्रन्थ निश्चित तौर पर 1140 से लेकर 1150 ई. तक तैयार हो गया था। इसके तैयार होते ही इसकी प्रतिलिपियों का देशभर में आदान-प्रदान हुआ। देवगिरिराज्य के यादववंशीय नरेश महादेव (1260-1271 ई.) के धर्मशास्त्री हेमाद्रि पण्डित ने अपराजितपृच्छा के श्लोक प्रथमतयाः ग्रन्थ के नामोल्लेख के साथ अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘चतुर्व्वर्गचिन्तामणि' के परिशेषखण्ड के तीसरे भाग कालनिर्णयोक्त ‘प्रासादाद्यारम्भकालः' के प्रसङ्ग में प्रमाण के रूप में उद्धृत किए। इससे इस ग्रन्थ के 12वीं सदी के बाद लिखे जाने की धारणा निर्मूल हो जाती है। ये श्लोक हैं — रवौ कन्यातुलालिस्थे वास्तौ पूर्वे शिरः स्थितम्। चापे च मकरे कुम्भे दक्षिणेन व्यवस्थितम्। आदित्यवारयोगेन स वास्तुः सरति भ्रमात्॥ यत्र भानुः शिरस्तत्र लक्षितव्यं रविक्रमात्। देवागारं गृहञ्चैव न कुर्याच्छीर्षसन्मुखम्॥ मृत्युरोगभयानि स्युः प्रशस्तं कुक्षिसन्मुखम्।