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अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

xxv किया है और सम्मान स्वरूप दानादि का विधान भी वर्णित किया है। प्रतीत होता है कि अपराजितकार उस घटना का दर्शक रहा होगा और यह ग्रन्थ 1150 ई. के आसपास लिखा जा चुका था अथवा लिखा जा रहा था। किन्तु, यह सन्देह स्थल- स्थल पर प्रकट होता है कि भुवनदेव गुजरात से लगे प्रदेश मेवाड़ से परिचित था। यद्यपि कुमारपाल ने मेवाड़ को विजित किया था, ऐसे में धारानगरी के परमारों के पश्चात् मेवाड़ गुजरात के चालुक्यों के अधिकार में रहा। कुमारपाल ने चित्तौड़गढ़ स्थित परमार भोज के बनवाए समीधेश्वर मन्दिर में पूजन किया था और वहाँ स्वर्णकलश चढ़ाकर भूमिदान किया— सन्निवेश्य शिविरं पृथु तत्र त्रासिता सहनभूपतिचक्रम्। चित्रकूटगिरि पुष्कलशोभां द्रष्टुकुमारनृपतिः कुतुकेन॥ यदुच्चसुरसद्माग्रोपरिष्टात् प्रपतन् सदा। रथं नयत्यलं मन्दं मन्दं भङ्गभयाद्रविः॥ यत्सौधशिखरारूढकामिनीमुखसन्निधौ। वर्तमानो निशानाथो लक्ष्यते लक्ष्मलेखया॥ (प्रो. कीहॉर्न सम्पादित चित्तौड़गढ़ स्थित कुमारपाल का अभिलेख : इण्डियन एण्टीक्वेरी भाग 2, पृष्ठ 521) इस समस्त पृष्ठभूमि में मेरा विचार है कि यह ग्रन्थ निश्चित तौर पर 1140 से लेकर 1150 ई. तक तैयार हो गया था। इसके तैयार होते ही इसकी प्रतिलिपियों का देशभर में आदान-प्रदान हुआ। देवगिरिराज्य के यादववंशीय नरेश महादेव (1260-1271 ई.) के धर्मशास्त्री हेमाद्रि पण्डित ने अपराजितपृच्छा के श्लोक प्रथमतयाः ग्रन्थ के नामोल्लेख के साथ अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘चतुर्व्वर्गचिन्तामणि' के परिशेषखण्ड के तीसरे भाग कालनिर्णयोक्त ‘प्रासादाद्यारम्भकालः' के प्रसङ्ग में प्रमाण के रूप में उद्धृत किए। इससे इस ग्रन्थ के 12वीं सदी के बाद लिखे जाने की धारणा निर्मूल हो जाती है। ये श्लोक हैं — रवौ कन्यातुलालिस्थे वास्तौ पूर्वे शिरः स्थितम्। चापे च मकरे कुम्भे दक्षिणेन व्यवस्थितम्। आदित्यवारयोगेन स वास्तुः सरति भ्रमात्॥ यत्र भानुः शिरस्तत्र लक्षितव्यं रविक्रमात्। देवागारं गृहञ्चैव न कुर्याच्छीर्षसन्मुखम्॥ मृत्युरोगभयानि स्युः प्रशस्तं कुक्षिसन्मुखम्।

तुला-वृश्चिक-कन्यासु भास्करो यदि संस्थितः । न तदा प्राङ्मुखं कुर्यात् गृहं भवति निष्फलम् ॥ धनुर्मकरकुम्भेषु यदि तिष्ठति भास्करः । तदा याम्यमुखं वेश्म राजचौराग्निभीतिदम् ॥ मीने मेषे वृषे प्रत्यङ्मुखं स्त्रीकलहावहम् । मिथुने कर्कटे सिंहे न कुर्याच्चोत्तराननम् । तथा कृतं भवेद्वेश्म दोष-शोक-भयावहम् ॥ (हेमाद्रि : चतुर्वर्गचिन्तामणि, परिशेषखण्ड कालनिर्णय अध्याय 15, पृष्ठ 819-820) अपराजितपृच्छा के वर्तमान पाठ में ये श्लोक निम्नांकित क्रम और पाठान्तर के साथ प्राप्त होते हैं— रवौ कन्यातुलालौच पूर्वे शिरः समाश्रितः । धनोश्च मकरे कुम्भे दक्षिणे तु व्यवस्थितः ॥ मीने मेषे वृषे चैव पश्चिमे तु समाश्रितः । मिथुने सिंहकर्कै च ह्युत्तरेण व्यवस्थितः ॥ सर्वकालक्रमोऽयं च राशिमध्ये ह्यतः शृणु । देवताश्च क्रमयोगेन स वास्तुः सरते महीम् ॥ यत्र भानुस्तत्र शिरं लक्षितव्यं रविक्रमात् । अन्यथा कुरुते दुःखं शिरो वास्तावलङ्कृतम् ॥ देवागारं गृहं यत्र न कुर्याच्छिरः सन्मुखम् । मृत्युरोगभया नित्यं शस्तं च कुक्षिसन्मुखम् ॥ कन्यातुलावृश्चिके च भास्करो यदि संस्थितः । पूर्वे मुखं न कर्तव्यं गृहं भवति निष्फलम् ॥ मकरे चैव धनुषि कुम्भे वा च दिवाकरे । याम्यादिशि मुखं कुर्याद्राजचौराग्निजं भयम् ॥ मीने मेषे वृषे चेव पश्चिमा दिग् च दूषिता । स्त्रीणां रोगं महाघोरं भवति ह्यतिदारुणम् ॥ मिथुने सिंहकर्कै च वेश्म नैवोत्तराननम् । दोषशोकभयं तत्तु न कुर्याच्च विचक्षणैः ॥ (अपराजित. 62, 3-11)

xxvii इससे यह भी प्रतीत होता है कि यह ग्रन्थ रचनाकाल के बाद पुनर्संस्कारित या पुनर्सम्पादित हुआ है क्योंकि श्लोकों के बीच-बीच भी अन्य पङ्क्तियाँ मिलती हैं और पाठ भेद भी है। इसके अतिरिक्त भुवनदेव ने शिवरात्रि का विस्तृत वर्णन किया है, वर्ष की सभी शिवरात्रियों का नामोल्लेख किया है। उसके काल में शिवरात्रि का महत्व इस बात से भी प्रतीत होता है कि किराडू-जोधपुर के 1152 ई. के एक अभिलेख में कुमारपाल के एक सामन्त आह्लणदेव द्वारा एक आज्ञा से शिवरात्रि पर पशुवध निषेध करने का निर्देश दिया गया है। (एन्यूअल रिपोर्ट ऑफ राजपूताना म्यूजियम 1931) हमें याद रखना चाहिए कि शिवरात्रि के व्रत की कथा आबू से जुड़ी हुई है और उस कथा में मूलतः शिकारी द्वारा मृग-मृगी का वध नहीं करने का वर्णन ही है। ग्रन्थ के साङ्गोपाङ्ग अध्ययन से प्रतीत होता है कि भुवनदेव जितना गुजरात से परिचित था, उतना ही वह गुजरात से लगे मेवाड़ क्षेत्र से भी परिचित था। बहुत सम्भव है कि वह सोमपुरा हो किन्तु बहुत विद्वान था। वह कुमारपाल के साथ मेवाड़ आया हो जैसा कि कुमारपाल के साथ दण्डपाल सज्जन भी आया था जिसे पाटी सहित चित्तौड़ दिया और वहाँ का राजा किया (जैसा कि कुमारपालदेव प्रबन्ध गाथा 14 में आया है) अथवा भुवनदेव मेवाड़ में उस काल में चल रही शिल्प गतिविधियों के क्रम में निमन्त्रण पर आया हो किन्तु जब परमारों के प्रभाव से मेवाड़ में समराङ्गणसूत्रधार जैसे ग्रन्थ प्रचलित रहे होंगे तो ऐसे में अपराजितपृच्छा जैसे ग्रन्थ की क्या आवश्यकता रही होगी ? ऐसे में कुछ कारण दिखाई देते हैं -

  1. प्रथमतः चालुक्यों का परमार भोज के साथ वैर-भाव था। भोज के पूर्वजों ने गुजरात पर अधिकार के लिए चढ़ाई की थी और वहाँ पर्याप्त रक्तपात हुआ था। इसके बदले में चालुक्यों ने भोज की राजधानी को रौंद डाला था, जैसा कि विक्रमाङ्कदेवचरित (अध्याय प्रथम) आदि से विदित होता है। ऐसे में चालुक्य नहीं चाहते थे कि वे परमार शासकों के किसी मत को स्वीकार करें। ग्रन्थों और विचारधारा के प्रसङ्ग में यह विचार कुछ अधिक ही चरितार्थ होता है। इसलिए भुवनदेव ने भोजकृत समराङ्गणसूत्रधार के श्लोकों को ज्यों-का-त्यों लिया भी है किन्तु कहीं भी भोज का नामोल्लेख नहीं किया है बल्कि उन्हें विश्वकर्मा-वचन कहा है।
  2. द्वितीयतः समराङ्गणसूत्रधार के निर्देश लगभग एक सदी पुराने हो चुके थे और कला में नवीनता देना अपरिहार्य हो चुका था। फिर मालवा व गुजरात में

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भौगोलिक स्थितियाँ पृथक् भी थीं। ऐसे में नवीन कला परम्परा का प्रवर्तन होना प्रासङ्गिक ही था। अरबों के हमले में विनाश को प्राप्त सोमनाथ व अन्य देवालयों के जीर्णोद्धार के साथ ही कला में नवीन धारा का प्रवाह अनिवार्य था। 3. सोमनाथ पर आक्रमण के साथ ही कई सोमपुरा शिल्पी वहाँ से तत्काल मेवाड़ आदि की ओर पलायन कर गए हों और उनमें से किसी को अपने सूत्रसन्तानों के लिए निर्देश तैयार करने हों और उसने अपनी स्मृति के अनुसार भोज के मतों को लिखते हुए नवीन ग्रन्थ की रचना की हो। बहुत सम्भव है कि इस ग्रन्थ की रचना चित्तौड़गढ़ स्थित समीधेश्वर (समाधीश्वर) मन्दिर में हुई हो क्योंकि वह भोजकृत रहा है और वहाँ चालुक्यों का अधिकार और परमारों की प्रभुत्व के अवसान के बाद भुवनदेव निश्चिन्त रहा हो। इस क्रम में मेवाड़ के शिल्पियों का वह प्राचीन 'सबद-सूत्र' उद्धृत करना अप्रासङ्गिक नहीं होगा जिसमें समीधेश्वर मन्दिर में विश्वकर्मा-अपराजित संवाद के रूप में इस ग्रन्थ की रचना का उल्लेख आता है। यह कहना न होगा कि जहाँ इतिहास के अन्य स्रोत मौन होते हैं, तब एक वातायन लोकसाहित्य भी खोलने का यत्न करता है। इस सबद-सूत्र में अपराजितपृच्छा की न केवल विषय-वस्तु दी गई है, बल्कि भुवनदेवाचार्य का परिचय भी है। भुवनदेव की शिल्पविद्या का प्राचीन 'सबद' (कण्ठ-दर-कण्ठ) स्मृत्यमान चम्पूतुल्य यह रचना इस प्रकार हैं— ॐ गुरुजी! विद्या में सिलपविद्या जो साधे सो पावै अमरापुरवास। जो भणै सो सधरै जावै कैलासवास॥ चितरकोट समाधीसर बैठ भणै चेजारो भवनदेव, गंधमंगरे वराज्या मादेव, रिसी वन्दावै। विस्क्रमाजी भाषै हुणै अपराजित- अगम, पछम, स्त्रस्टि री उतपत-लोप, जडखान, पिण्डखान, परेवखान, बीजखान, चार समन्द सतखण्डी प्रथ्वी, सात लोक, नौ नाथ, साम्भरूं मेवाड़। रिश्यां री सन्ताण। गणतभणै, जोतीस भणै, भणत भणै, गड़त भणै, जोऊं लेयर हाथ तईं नापै, मिण्डीऊं करोड़ नापै। आवक आछौ लागै, जावतो रंज लागै। भाण्डता देवल जोड़े, नवा करै। चोथ, सिवरात, मैल-माळिया, तळाब-नाड़ी-बावड़ी-कूडा-निवाण, नीम-सीम, इण्ड-मीण्ड, देवळ-मूरत, पूजा-परसाद, राग-रागणी, नरतन-किरतन कोइ भेद बाकी नहीं। आठ सेहस गरन्थ माण्ड्या, दो पोटी पानड़ा। जदी चाल्या चीरवे ने नागदा ने धोके है। कैलास नगरी में राजा वैसळ सन्माने। आबू रे मथारे हुणै टंकोड़, पाथोड़, राठौड़ चाक दे, क्रमचारो देवळ बांधता। अठी नाळे तो मारवाड़, वठी जावै तो गुजरात। वणै सूरी जो चेला वदावै। करै भगती वदावै

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अगती। भुवनदेव री वात कुण भणै। मैल वणातो राजा, देवळ बांधतो सूतरपत, मठ वणातो जत्ती, मूरत घड़तो रूपौ, चणतो चेजारो, पीणतो पिंजारो, गावतो गवैयो, नाचतो नच्चयौ, कटार-तरवार-नेजो चलावतो सूर, वणती विंदणी, ओतरतो भेरू रो भोपो। भवन सुधर्यां भव सुधरे, सुधरे भजन भाव। विस्क्रमाजी ते उपराजित सुत सन्ता (न) रे ग्यान॥ इति सिलप-सबद सम्पूर्ण भयो, अनन्त क्रोड़ सिद्धां में गादी बैठ गुरु माराज भाषिया। साईं ने सलाम, गुरांजी ने प्रणाम, नाथजी कूं आदेस, सब सन्तां ने हरे हर। (सांवरियाजी मन्दिर मण्डफिया के शिल्पी कजोड़ीदास से 1989 में सङ्कलित) अर्थ :- ॐ गुरुजी, विद्याओं में शिल्पविद्या प्रमुख है। इसकी जो साधना करता है, वह देवलोक में निवास करता है। जो इसे पढ़ता है, वह कैलासवास प्राप्त करता है। चित्रकूट (चित्तौड़गढ़) के समाधीश्वर मन्दिर में बैठकर स्थपति भुवनदेव रचना-पाठ करता है। गन्धमादन पर्वत पर विराजित शिव की ऋषि वन्दना करते हैं। विश्वकर्मा कहते हैं और अपराजित सुनते हैं। वे पूर्व मत, परवर्ती मत, सृष्टि की उत्पत्ति, प्रलय, जड़ योनि, पिण्डयोनि, श्वेदज, बीज योनि कहते हैं। चारों समुद्र, सप्तखण्डा पृथ्वी, सप्त लोक, नौ नाथ के बारे में बताते हैं। साम्भर से लेकर मेवाड़ तक का देश-वृतान्त कहते हैं। ऋषियों की वंश परम्परा बताते हैं। इसी क्रम में गणित का वर्णन, ज्योतिष का वर्णन, शिक्षा-व्याकरण का वर्णन, प्रस्तर व उसकी गड़ाई का वर्णन करते हैं। यव से लेकर हस्त का प्रमाण बताते हैं। शून्य से लेकर कोटि तक गणना बताते हैं। वास्तु में आय श्रेष्ठ व व्यय अनुचित होता है। जीर्ण देवालय का उद्धार, नवीनीकरण बताते हैं। चतुर्थी व्रत, शिवरात्रि, महल-हवेली, तालाब, जलाशय, बावड़ी, कूप, शस्य, शिलान्यास, शिखर, आमलक, कलश, देवालय, मूर्ति, पूजा-विधि, प्रसाद बताते हैं। इसी क्रम में राग-रागिनी, नृत्य, कीर्तन मिलाकर कोई शिल्प विद्या का भेद शेष नहीं रहता। आठ हजार (श्लोकों) का ग्रन्थ प्रमाण लिखते हैं। दो बैलों पर उठाने योग्य भार प्रमाण के पत्रों पर यह शास्त्र लिखा गया। भुवनदेव (चित्तौड़गढ़) से निकलकर चीरवा होकर नागदा (मेवाड़ की प्राचीन राजधानी) जाते हैं। कैलासपुरी में राज वैजल (विजयसिंह) सम्मानित करता है। आबू के पर्वत पर इस ग्रन्थ को टाँकी चलाने वालों ने सुना, पत्थर तोड़ने वालों ने सुना। राठौड़ों ने सुना व तलच्छन्द बनवाया। वहाँ देवालय निर्माण में जुटे कर्मचारियों ने सुना। इधर देखें तो मारवाड़, उधर देखें तो गुजरात तक इस ग्रन्थ का परिचय फैला। इसके बाद भुवनदेव तत्कालीन सूरीश्वर का शिष्य होता है, शिष्यों को बढ़ाता है। भक्ति करता है, जन्म सुधारता है। इस भुवनदेव की वार्ता को कौन

XXX सुनता है? महल बनाने वाला राजा, देवालय बनाने वाला स्थपति, मठ बनाने वाला यति, मूर्ति तैयार करने वाला रूपाङ्कनकर्ता, भित्ति की चुनाई करता चेजारा, रूई की पिंजाई करने वाला पिंजारा, गाने वाला गायक, नाचने वाला नर्तक, कटार-तलवार, भाला चलाने वाला शूरवीर, शृङ्गार करने वाली दुल्हन, भावाविष्ट होकर देवाराधना करने वाला भोपा सुनता है। यदि भवन सुधर जाता है तो भव (संसार) सुधर जाता है। भजन-भाव सफल-सार्थक हो जाते हैं। विश्वकर्माजी से अपराजित की ज्ञान- सन्तानों (मानसपुत्रों) का यह ज्ञान है। इस प्रकार शिल्प सबद पूर्ण हुआ। अनन्त करोड़ सिद्धों के बीच विराजित गुरु महाराज ने इसे कहा है। सांई का सलाम, गुरुदेव का प्रणाम, नाथजी को आदेश, सभी सन्तों से कहना हरे-हर। इस ग्रन्थ के मेवाड़ में रचित होने के कई प्रमाण इसी में अन्तःसाक्ष्य के रूप में प्राप्त होते हैं जिनको यथास्थान पाद टिप्पणियों के रूप में दिया गया है। इसको अपराजित के नाम लिखने के मूल में यह कारण स्पष्ट होता है कि मेवाड़ को शिल्पधाम के रूप में प्रतिष्ठित करने का श्रेय गुहिल वंशी अपराजित को ही दिया जाता है। प्रो. डी. आर. भाण्डारकर (इपिग्राफिया इण्डिका जिल्द 39, पृष्ठ 190), कविराजा श्यामलदास (वीरविनोद भाग 1, पृष्ठ 252) आदि इतिहासकारों ने मेवाड़ के गुहिल राजवंश के राजा शील या शीलादित्य (शिलालेख 646 ई.) के पुत्र के रूप में अपराजित (शिलालेख 661 ई.) को परिगणित किगा है। यद्यपि बापा रावल का आद्य-पुरुष के रूप में नाम लिया जाता है किन्तु इतिहासविदों में यह विवाद ही है कि बापा किसी का नाम है अथवा विरुद? क्योंकि कई प्राचीन शिलालेखों में बापा, बाष्प, बप्प आदि नामाभिधानों का प्रयोग हुआ है। (नागरी प्रचारिणी पत्रिका भाग 1, पृष्ठ 248-50 एवं टिप्पणियाँ) इसी प्रकार कुम्भलगढ़ की महाराणा कुम्भाकालीन (1433-1468 ई.) प्रशस्ति में आया है- तस्मिन् गुहिलवंशेऽभूद्भोजनामावनीश्वरः । तस्मान्महीन्द्रनागाह्नो बप्पाख्यश्चापराजितः ॥ (श्लोक 139) यहाँ बप्पा नाम वाले राजा के बाद अपराजित का वर्णन आया है, ऐसे में शीलादित्य का नाम बप्पा होने का मत कर्नल जेम्स टॉड ने प्रतिपादित किया। (कर्नल जेम्स टॉड जिल्द 1, पृष्ठ 259-69) किन्तु, शीलादित्य के सामोली अभिलेख (643 ई.) में उसके लिए यह अपर नामाभिधान नहीं आया है, इसी आधार पर इतिहासकार गौरीशङ्कर ओझा ने इस तर्क को निर्मूल कह दिया। (उदयपुर राज्य का इतिहास, पृष्ठ 104), तथापि यहाँ यह अवश्य हो सकता है कि अपराजित का यह अपरनाम रहा हो; चूंकि एकलिंग माहात्म्य के आधार पर बप्पा रावल का समय 734-753 ई. का

xxxi निर्धारित किया गया है, ऐसे में अपराजित से पूर्व बप्पा का होना अथवा अपराजित व बप्पा का अभिन्न होना बताने के लिए अन्य कोई प्रमाण नहीं है और फिर शीलादित्य की प्रशस्ति गुजरात की सीमा वाले सामोली से मिली है जबकि अपराजित की प्रशस्ति नागदा से। नागदा मेवाड़ की प्राचीन राजधानी रहा है, ऐसे में मेवाड़ के प्रथम प्रतापी शासक के रूप में अपराजित का होना प्रतीत होता है बहुत सम्भव है कि उसने नागदा-कैलाशपुरी क्षेत्र को अधिकृत रखने वालों से घोर सङ्घर्ष किया हो और इस क्षेत्र को गुहिलाधिकृत किया हो। इसी के वंशधर बापा ने 734 ई. में मान मौर्य से चित्तौड़गढ़ का राज्य लिया एवं पूरे मेवाड़ को गुहिल वंशाधिपत्य करने का यत्न किया। सम्भवतः भुवनदेवाचार्य इस तथ्य से परिचित था, ऐसे में उसने मेवाड़ में गुहिल राज्य के प्रवर्तक अपराजित को प्रश्नकर्ता के रूप में प्रस्तुत किया हो। इस क्षितिभृत अपराजित ने मेवाड़ की प्राचीन राजधानी में स्थापत्य की परम्परा का प्रवर्तन किया, उसी के दरबारी वराहसिंह की पत्नी यशोमति ने कुण्डा ग्राम (उदयपुर जिलान्तर्गत बड़गाँव पंचायत समिति) में कैटभ-रिपु विष्णु का जहाज-आकार में मन्दिर बनवाया था। अपराजित की उदयपुर जिलान्तर्गत कुण्डेश्वर से प्राप्त 661 ई. की प्रशस्ति में कहा गया है कि गुहिल वंश के तेजस्वी राजा अपराजित ने सब दुष्टों का विनाश किया, अनेक राजा उसके आगे शिरावनत थे। उसने शिवात्मज पुत्र महाराज वराहसिंह को, जिसकी शक्ति का भञ्जन कोई नहीं कर सका और जिसने भयङ्कर शत्रुओं को परास्त किया तथा जिसकी यशकीर्ति दिग्दिगन्त तक प्रसारित थी, अपना सेनापति बनाया। अरुन्धती के समान विनयवाली उस वराहसिंह की पत्नी यशोमती ने लक्ष्मी, यौवन और वित्त को क्षणिक मानकर संसार रूपेण विषय समुद्र को तैरने के निमित्त नाव रूपी कैटभ-रिपु विष्णु का मन्दिर बनवाया। यह लेख इस प्रकार हैं- ॐ नमः स्पृष्ठा वक्षसि लीलया कररूहैः काचित्कचाकर्षणादन्या कामपरेण पादपतनैः कण्ठग्रहेणापरा धन्यास्ता। भुवने सुरेन्द्रतनयो याः प्रापिता निर्वृति स्मृत्वेत्थं स्पृहयन्ति गोपवनिता यस्मै सपायाद्धरि ॥ लक्ष्मीलीलोपधानं प्रलयजलनिधिस्थायिनो- गण्डशैलादर्षोद्धृत्ता सुरेन्द्रद्रुम गहनवनच्छेददक्षाः कुठाराः। संसारापारवारि प्रसररयमुत्तारेणे बद्धकुक्ष्याः दोर्दण्डाः पान्तुशौरेस्त्रिभुवन भवनोत्तम्भस्तम्भभूताः॥ राजा श्रीगुहिलान्वयामल पयोराशौ स्फुरद्दीधिति ध्वस्तध्वान्त समूहदुष्टसकलव्यालावलेपान्तकृत्। श्रीमानित्यऽपराजितः क्षितिभृतामभ्यर्चितो मूर्धभिः वृत्तस्वच्छतयैव कौस्तुभमणिर्जातो जगद्भूषणम्॥ शिवात्मजो

१. सूत्र १-५०: विश्वकर्मा-अपराजित संवाद, सृष्टि-क्रम, वास्तुपुरुष एवं रेखा-प्रमाण

xxxii खण्डितशक्तिसम्पद्धर्यः समाक्रान्तभुजङ्गशत्रु तेनेन्द्रवत्स्कन्द इव प्रणेता वृत्तो महाराज वराहसिंहः ॥ जनगृहीतमपि क्षयवर्जितं धवलमप्यनुरञ्जितभूतलं स्थिरमपि प्रविकासि दिशोदशभ्रमति यस्य यशो गुणवेष्टितम् ॥ तस्य नाम दधति यशोमती गेहिनी प्रणयिनी यशोमती चित्तमुत्पथगतं निरुन्धती सा बभूव विनयादरुन्धती ॥ श्रीर्व्वन्धकी स्थागुणरता च गौरी वैधव्यदुःखोपहता रतिश्च...॥ (जे. ए. एस. बी. 1935, पृष्ठ 122, इपिग्राफिया इण्डिका भाग 4, पृष्ठ 31-32) वैसे अपराजित को विश्वकर्मा का मानसपुत्र समराङ्गणसूत्रधार में कहा गया है— आययुर्विश्वकर्माणं चत्वारो मानसाः सुताः॥ जयो विजयसिद्धार्थी चतुर्थश्चापराजितः । (समराङ्गण. 2, 2-3) फिर जय, विजय व सिद्धार्थ के नाम से ग्रन्थों का प्रणयन हो चुका था, जैसा कि भुवनदेव ने भी सूचित किया है, ऐसे में अपराजित के नाम पर ही ग्रन्थ रचना शेष रही होगी। यह नामाभिधान मेवाड़ाधिपति अपराजित से मेल भी खाता था, फिर भुवनदेव के जीवनकाल में अपराजित नाम विशेषतः चलन में रहा था, जैसा कि जालोर-भीनमाल से प्राप्त 1108 ई. के ताम्रपत्र में देवराट् के पुत्र के रूप में अपराजित का नाम आया है— चन्दनोमहीपस्तन्नन्दनो देवराट्। तत्सूनुश्चपराजितः...; जालोर के तोपखाना से प्राप्त 1117 ई. के अभिलेख में भी ये ही नामाभिधान आए हैं। (शोधपत्रिका भाग 1, अङ्क 2, 1956, पृष्ठ 1-12 एवं इपिग्राफिया इण्डिका भाग 42, पृष्ठ 41) इसी प्रकार राजस्थान के जालोर के निकटस्थ सुन्धा चामुण्डा माता की 1262 ई. प्रशस्ति में अपराजितेश के मन्दिर का वर्णन आया है— प्रोत्तुङ्गेप्यपराजितेश भवने सौवर्णकुम्भध्वजारोपी रूप्यमेखला वितरणस्तस्यैव देवस्य यः ॥ चक्रे श्रीरपराजितेश भवने शाला तथास्यां रथः कैलाश प्रतिमस्त्रिलोक कमलालङ्कार रत्नोच्चयः। येन क्षोणि पुरन्दरेण कृतिना मानन्द संवित्तये भाग्यं वा निजमेव पर्वततुलां नीतं समन्तादपि ॥ (इपिग्राफिया इण्डिका भाग 5, पृष्ठ 74) इस प्रशस्ति के अनुसार वहाँ पर चाचिगदेव ने स्वर्ण कलश और ध्वजा चढ़ाई, चाँदी की मेखला-लेन का वितरण किया, अपराजितेश के भवन की शाला के लिए रथ बनवाया जो कैलाश के समान प्रतीत होता था और उस पर रत्न-कमलों का अलङ्करण था। यह अपराजितेश मन्दिर के जीर्णोद्धार और उसके लिए व्यवस्थाओं का सशक्त सन्दर्भ देता है। यह मन्दिर लगभग एक शताब्दी पूर्व बना होगा और यह प्रतीत होता है कि वह काल अपराजितपृच्छा की रचना का ही रहा होगा। लोक-सबद में भुवनदेव का आबू गमन का सङ्केत है और तत्कालीन जाबालीपुर (जालोर) वहाँ से अधिक दूर भी नहीं है जो कि तब ज्ञान-विज्ञान के केन्द्र के रूप में ख्यात था। उक्त

xxxiii

सबद में ही भुवनदेव के सूरीश्वर से दीक्षित होने का सङ्केत भी हैं किन्तु इस सम्बन्ध में समकालीन स्रोत मौन हैं। उदयपुर जिलान्तर्गत चीरवा ग्राम जिसका कि सङ्केत उक्त सबद में भुवनदेव की यात्रा के प्रसङ्ग में आया है, से प्राप्त 1273 ई. की प्रशस्ति में अवश्य भुवनचन्द्र सूरी का नाम आया है। यह प्रशस्ति भुवनचन्द्र सूरी के शिष्य रत्नप्रभसूरी ने चित्तौड़गढ़ में रहते हुए रची थी। (इपिग्राफिया इण्डिका भाग 27, पृष्ठ 285-92 एवं वियना ओरियण्टल जर्नल जिल्द 21, पृष्ठ 155-162) किन्तु, इस प्रशस्ति में अन्य किसी भुवनचन्द्र सूरी का वर्णन रहा हो क्योंकि इतने वर्षों तक भुवनदेवाचार्य के शिष्य का रहना सम्भव प्रतीत नहीं होता तथापि चीरवा का महारावल पद्मसिंह द्वारा तत्कालीन तलारक्ष योगराज को मिलना और वहाँ पर योगेश्वर शिव व योगेश्वरीदेवी के मन्दिर के निर्माण, उसके पिता द्वारा उद्धरण स्वामी-विष्णु के मन्दिर की प्रतिष्ठा और पुत्र मदन द्वारा प्रायश्चित स्वरूप योगेश्वर व योगेश्वरी के मन्दिर के जीर्णोद्धार एवं उक्त देवालयों के नैवेद्यार्थ कालेला सरोवर के पृष्ठभाग की गोचर भूमि से दो खेतों के भेंट करने का वर्णन आया है और यह वर्णन भुवनदेव के ग्रन्थोक्त निर्देश के समरूप ही है। इसी प्रकार मेवाड़ के आड़ा-अव्ला पर्वत (आड़ावल या अरावली पर्वतमाला, तुलनीय : दृश्यते पर्वतो यत्र ह्यनेकशेखराकृतिः । राजा सेनावधं कुर्यान्मासेनाऽत्र न संशयः ॥ सूत्र 203, 8), जावर जैसे खदान क्षेत्र, वर्तना जैसे कला-संसाधनों आदि से भुवनदेव का परिचित होना उसकी इस क्षेत्र से सम्बद्धता को दर्शाता है फिर इस रूप में भी वह मेवाड़ का स्मरण करता है कि तीन भूमिमध्य मालिका-हर्म्य वह बनवा सकता है जो सूर्यवंशी हो और शिव का आराधक हो (त्रिभूमिमध्यकर्त्तव्या मालिका क्रमतः स्थिता । सूर्यवंशोद्भवाः शैवा वतरन्ति यदा महीम् ॥ तेषां वेश्मनि कार्याणि नान्येषां तु कदाचन । सूत्र 69, 43-44) यह पहचान भी मेवाड़ के राजवंश की रही है, जिसे रघुकुल के समान कीर्ति-प्रसारकर्ता और सूर्यवंशी माना जाता है और वह एकलिंगजी का आराधक रहा है, तथापि इस दिशा में पर्याप्त शोध की सम्भावना अभी समाप्त नहीं हुई है। प्रस्तुत पाठ के सम्पादन के आधार : अपराजितपृच्छा का प्रस्तुत संस्करण पूर्ववर्ती प्रकाशित पाठ का अनुवाद नहीं है बल्कि इसमें कई नवीन पाण्डुलिपियों का सहयोग भी लिया गया है। उल्लेखनीय है कि इस ग्रन्थ के प्रथम संस्करण के लिए पोपटभाई अम्बाशङ्कर मंकड ने निम्न मातृकाओं का सहारा लिया था—

XXXIV बी-1 पाण्डुलिपि और बी-2 पाण्डुलिपि। ये दोनों ही मातृकाएँ बड़ौदा ओरियण्टल इंस्टीट्यूट में क्रमशः 3587 एवं 9214 पंजीकृत संख्या पर विद्यमान हैं। इनमें से पहली मातृका में 238 सूत्र पूर्ण एवं 239वाँ सूत्र अपूर्ण रूप से प्राप्त होता है और यह अधिक पुरानी नहीं है जबकि दूसरी मातृका में 225 सूत्र मिलते हैं जिनमें से 101 से 156 सूत्र नदारद हैं। इनमें लगभग 7500 श्लोक प्राप्त हुए। इस ग्रन्थ के प्रकाशन के बाद एक मातृका प्रसिद्ध शिल्पशास्त्री प्रभाशङ्कर ओघड़भाई सोमपुरा और मधुसूदन ढांकी को अहमदाबाद के श्रीमन्सुखलालभाई सोमपुरा से प्राप्त हुई थी। मुझे अपराजितपृच्छा की एक पाण्डुलिपि क्रमशः प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान के जोधपुर मुख्यालय से (संख्या 18078-12) और एक इसी प्रतिष्ठान की उदयपुर शाखा से भी मिली जिनमें एक-दो अध्याय ही मिले जबकि एक अपूर्ण मातृका डूंगरपुर जिले के सागवाड़ा निवासी वयोवृद्ध स्थपति श्री रघुनाथ सोमपुरा से साभार प्राप्त हुई। इसमें 137 अध्याय हैं। देवालय शिखर विधान सम्बन्धी कुछ अध्याय बड़ौदा में विद्यमान सूत्रधार गोविन्द कृत 'कलानिधि' (संख्या 8276 पृष्ठ 9, 11001 पृष्ठ 11 तथा 11069 पृष्ठ 23) में प्राप्त हुए जिनका सम्पादन और उपयोग मैंने पूर्व में उस ग्रन्थ के लिए किया था। कई श्लोकों का संशोधन, परीक्षण गुजराती में प्रकाशित 'बृहच्छिल्पशास्त्र' एवं 'प्रासादमण्डनम्' के आधार पर किया गया है। इनके अतिरिक्त इस ग्रन्थ के मुख्य उपस्कारक समराङ्गण सूत्रधार के आधार पर भी सैकड़ों श्लोकों का परीक्षण कर यथास्थल उनका सम्पादन कर, पाद टिप्पणियाँ दी गई हैं। इसके कई श्लोक ज्ञानप्रकाश दीपार्णव में भी मिलते हैं। इस प्रकार अपराजितपृच्छा के प्रकाशित पाठ में जहाँ कहीं खण्डित और भ्रष्ट श्लोक थे, उनकी पूर्ति और संशोधन सम्भव हुआ वहीं कई नवीन श्लोक भी प्राप्त हुए। इस प्रयास में लगभग पाँच सौ श्लोकों की पूर्ति भी हुई है। हालांकि ग्रन्थकार ने शिव के नौ ताण्डवों का सन्दर्भ कहाँ से उद्धृत किया, यह पता नहीं चल सका किन्तु नाट्यशास्त्र, मयमतादि के आधार पर क्षेपक रूप में उनकी किञ्चित पूर्ति का प्रयास किया गया है। इसी प्रकार स्त्री-पुरुष लक्षणाध्याय में खण्डित श्लोकों की पूर्ति बृहत्संहिता की भट्टोत्पलीय विवृत्ति और स्कन्दपुराण आदि के सहारे की गई है किन्तु सर्वत्र यह ध्यान रखा गया है कि श्लोकों की पूर्ति इस ग्रन्थ की अपेक्षा प्राचीन पाठों के सहारे ही की जाए। यथास्थान सन्दर्भ इस ग्रन्थ को हमारी ग्रन्थ परम्परा से संयुक्त करता हुआ प्रतीत होगा, ऐसा मैंने अपनी समझ के अनुसार प्रयत्न किया है।

विषयानुक्रमणिका गन्धमादनो नाम प्रथमं सूत्रम् ॥ १ ॥ 1-10 ग्रन्थस्य निर्बाधपरिसमाप्त्यर्थं परम्परानुमितश्रुतिबोधितकर्त्तव्यताकं स्वाभीष्ट गणाधीशादिदेवानामाशीर्वादस्वरूपं मङ्गलम् - 1 ग्रन्थार्थं गन्धमादनपर्वताश्रये प्रवर्तनमाह - 1 तत्रोद्भूत सरितादीनां - 2 अष्टाशीतितापसानां तपश्चर्या - 4 तत्र वनस्पतिवर्णनं - 5 तत्र विश्वकर्मदिव्याश्रमवर्णनम् - 5 तत्र सङ्गीतादीनामाह - 7 भवनशोभावर्णनमाह - 7 तत्र भगवान् विश्वकर्मवर्णनमाह - 8 विश्वकर्मनामपर्यायदीनां - 9 अपराजित प्रश्नं - 9 सूत्रलक्षणं द्वितीयं सूत्रम् ॥ २ ॥ 10-14 सूत्रधारेण ज्ञातव्य विषयाः - 10 ब्रह्माण्डोत्पत्तिर्नाम तृतीयं सूत्रम् ॥ ३ ॥ 14-19 ब्रह्माण्डोत्पत्ति वर्णनमाह - 15 पातालद्वीपार्णवसूत्रणं (सूचनं) चतुर्थ सूत्रम् ॥ ४ ॥ 20-25 रुद्रभागोद्भवालोकादीनां - 20 पृथ्वीविस्तारवर्णनं - 21 पातालवर्णनं - 21 द्वीपनामवर्णनञ्च - 22 सागरनामानि - 23 कुलादीनां शैलनामानि - 23 अथाङ्गुलात्योजनप्रमाणम् - 25 सप्तोर्ध्वलोको नाम पञ्चमं सूत्रम् ॥ ५ ॥ 25-29 सप्तोर्ध्वलोकवर्णनं - 25

xxxvi अष्टशक्त्युद्भवो नाम षष्ठं सूत्रम् ॥ ६ ॥ 29-32 अथाष्टशक्तिनामावलिः — 30 तस्यवंशाः — 30 विप्रक्षत्रियवैश्यशूद्राणां गोत्रसंख्याः — 32 सृष्टिसंसारावतारणं सप्तमं सूत्रम् ॥ ७ ॥ 32-36 सप्तपातालराज्योद्भवो नामाष्टमं सूत्रम् ॥ ८ ॥ 36-41 नवकुलनागराजनामावली — 36 पद्मेशराज्यवासिनामाह — 37 कर्कोटकराज्यवासिनामाह — 38 पुण्डरीकराज्यनिवासिनामाह — 39 अथानन्तराज्यनिवासिनामाह — 39 रसातलनिवासिनामाह — 40 इत्यमनन्तर पातालनिवासिनामाह — 40 भूराज्यनिवेशानो नाम नवमं सूत्रम् ॥ ९ ॥ 42-45 जम्बूद्वीपवर्णनमाह — 43 नवक्षेत्रनामानि — 43 तत्रैव गन्धर्वविद्याधराक्षनिवासिनामाह — 44 संसारभूतग्रामोत्पत्तिपञ्चतत्त्वनिर्णयो नाम दशमं सूत्रम् ॥ १० ॥ 45-50 षडाश्रयाः — 48 एवं योगादीनामाह — 48 पञ्चतत्त्वपञ्चगुणनिर्णयो नामैकादशं सूत्रम् ॥ ११ ॥ 50-54 पिण्डनिर्माणचरणमाह — 51 इत्यमनन्तरमहाभूतादिकमाह— 53 गर्भविज्ञानोद्भवो नाम द्वादशं सूत्रम् ॥ १२ ॥ 54-57 कृतयुगानुरूपेणज्ञानमाह — 55 कर्मज्ञानोद्भवो नाम त्रयोदशं सूत्रम् ॥ १३ ॥ 58-62 हंसयोगसाधनमाह — 60 हृदयकमलमाह — 61 शरीरस्थगुणदोषादीनां — 62

xxxvii शिवशक्तिब्रह्मज्ञानं चतुर्दशं सूत्रम् ॥ 14 ॥ 62-67 शक्त्याप्रमाणानि — 65 गीतासद्भावोऽपरेऽपराजितबोधनार्थं पञ्चदश सूत्रम् ॥ 15 ॥ 67-70 गुरुपूजननिर्देशमाह — 68 गुरुमाहात्म्यमाह — 69 सत्वरजस्तमः षोडश सूत्रम् ॥ 16 ॥ 70-73 ग्रहादिध्रुवमण्डलं सप्तदश सूत्रम् ॥ 17 ॥ 73-78 सूर्यचन्द्रवंशानुकीर्तनम् — 74 इत्थमनन्तरकेत्वादीनामाह — 75 पञ्चाङ्गलक्षणानि — 76 ग्रहनामादीनां — 76 तत्रैव मण्डलपृथुत्वञ्च बिम्बमानमाह — 76 ग्रहगतिमानमुहूर्तादिप्रमाणमष्टादश सूत्रम् ॥ 18 ॥ 78-82 सूर्यादिग्रहाणां बिम्बप्रमाणमाह — 79 ध्रुवस्य प्रदक्षिणागतिक्रमह — 80 तिथिमासर्तुकालसंवत्सरो नामैकोनविंशं सूत्रम् ॥ 19 ॥ 82-88 तिथ्यादीनामाह — 83 तथा च स्पष्टाह — 83 षोडशचन्द्रकलामाह — 84 मासनामानि — 84 कार्त्तिक्यात्षडृतवः — 85 वार्षिकात्मकद्वैर्तुकालमाह — 85 त्र्यर्तुकालमाह — 85 प्रभवादिषष्टिसंवत्सरनामानि — 86 एतद्विंशत्यानि — 87 कल्पान्तो नाम विंशं सूत्रम् ॥ 20 ॥ 88-94 युग प्रमाणमाह — 88 कल्पान्तचिह्नादीनामाह — 91 अक्षयलिङ्गसृष्ट्युद्भवो नामैकविंशं सूत्रम् ॥ 21 ॥ 94-98

xxxviii केतुमालादि लिङ्गोद्भवक्षेत्राणि — 95 तथा च काश्यपीय सृष्टिवर्णनमाह — 97 पञ्चलिङ्गोद्भवकाश्यपसृष्ट्युद्भवो नाम द्वाविंश सूत्रम् ॥ 22 ॥ 98-102 प्रथमहरि-मत्स्यावतारो नाम त्रयोविंश सूत्रम् ॥ 23 ॥ 102-106 दशावतारनामानि — 103 अवतीर्णकालावधिमाह — 103 कूर्मावतारे मन्दरार्णवमन्थनं चतुर्विंशं सूत्रम् ॥ 24 ॥ 106-114 कूर्मावतारमासतिथ्यादीनां — 108 क्षीरार्णवात् निर्गतरत्नद्रव्यादीनां — 109 कल्पवृक्षवर्णनमाह — 110 पुनर्मन्थनात् अलक्ष्मीनिर्गतनं — 112 तथा च मन्थने विषप्राप्तिं — 113 इत्यमनन्तर वारुणी कलिकोद्भवं — 113 वराहावतारो नाम पञ्चविंशं सूत्रम् ॥ 25 ॥ 114-118 वराहावतार वर्णनं — 116 नृसिंहवामनावतारो नाम षड्विंशं सूत्रम् ॥ 26 ॥ 119-123 नरसिंहावतार कालादीनां — 119 नरसिंहवर्णनं — 120 पञ्चम वामनावतारणवर्णनम् — 121 रामावतारो नाम सप्तविंशं सूत्रम् ॥ 27 ॥ 123-126 परशुराममाहात्म्यमाह — 124 दाशरथीरामचरित्रं — 124 हरेष्टमः कृष्णावतारो नामाष्टाविंशं सूत्रम् ॥ 28 ॥ 126-133 अवतारप्रयोजनोपरान्तकृष्णलीलावर्णनं — 126 द्वारकापुरीवर्णनं — 130 बलादीनां वर्णनं — 131 केदारमाहात्म्य — 133 विष्णोर्जन्मरहस्यदशमोऽवतारो नाम नवविंशं सूत्रम् ॥ 29 ॥ 134-138 केवलिन चतुर्विंशतितीर्थङ्कराः — 135 तस्यानुयायी कथनं — 135

xxxix युगवर्णनमाह — 136 कल्कि अवतारवर्णनं — 137 वैष्णवावतारकीर्तन फलमाह — 138 विष्णुवाक्योद्धवारण्ये श्रीसोमेश्वरनिर्णयो नाम त्रिंशं सूत्रम् ॥ 30 ॥ 139-145 अथाश्रमवर्णनमाह — 141 विष्णुवाक्योद्धवसोमनाथोक्तद्वादशशिवरात्रि निर्णयो नामैकत्रिंशं सूत्रम् ॥ 31 ॥ 146-152 शिवरात्र्युत्सवविधिं — 149 द्वादशोत्सवनामानि — 150 मासानुसारं चतुर्दश्यां सफलञ्च — 150 शिवरात्रिमाहात्म्यमाह — 152 विश्वकर्मावतारो नाम द्वात्रिंशं सूत्रम् ॥ 32 ॥ 153-156 पृथुपृथिवीसंवादे भूर्लोके विश्वकर्मागमनं त्रयस्त्रिंशं सूत्रम् ॥ 33 ॥ 157-160 जयविजयसिद्धार्थपृच्छा नाम चतुस्त्रिंशं सूत्रम् ॥ 34 ॥ 160-164 जयपृच्छादीनां परिचयमाह — 161 ग्रन्थोत्पत्तिवर्णनं — 163 एकविंशतिस्वर्गा नाम पञ्चत्रिंशं सूत्रम् ॥ 35 ॥ 164-169 पृथ्वीप्रमाणमाह — 164 स्वर्गपातालनामादीनां — 165 नागकुलनामश्च — 166 धरत्यां द्वीपनामानि — 167 सागरनामानि — 168 स्वर्गनामानि — 168 महापर्वतप्रमाण षट्त्रिंशं सूत्रम् ॥ 36 ॥ 169-172 विश्वकर्मोवलोकितपृथ्वीनवखण्डानिं सप्तत्रिंश सूत्रम् ॥ 37 ॥ 172-176 दिव्यवर्षवर्णनम् — 174 भारतक्षेत्रग्रामसङ्ख्यानृपराज्यप्रमाणमष्टात्रिंशं सूत्रम् ॥ 38 ॥ 176-180 वनयात्रानामैकोनचत्वारिंशं सूत्रम् ॥ 39 ॥ 180-185 उपवनदीनां लक्षणं — 180

xl नानाविधानिमित्तानि — 182 अयं मन्त्रः — 184 वनयात्राशिलापरीक्षा नाम चत्वारिंशं सूत्रम् ॥ 40 ॥ 185-190 शिलालक्षणं, युवावृद्धाबालावयपरीक्षणम् — 186 छेदनावसरेमण्डलादीनां दर्शनफलं — 187 हस्तकम्बीप्रमाणमेकचत्वारिंशं सूत्रम् ॥ 41 ॥ 190-195 ज्येष्ठादीना हस्तभेदाः — 192 अथ रुद्रगायत्री — 192 हस्तोपयोगीकाष्ठादीनां — 193 नगरादीनामानार्थहस्तप्रमाणम् — 194 गणितशब्दनिघण्टुर्नाम द्विचत्वारिंशं सूत्रम् ॥ 42 ॥ 196-203 अथाङ्कज्ञानमाह — 196 ज्योतिषपञ्चाङ्गवासना नाम त्रयश्चत्वारिंशं सूत्रम् ॥ 43 ॥ 203-212 ज्योतिषमाहात्म्याह — 203 संवत्सरानयनं — 204 नाडीज्ञानमाह — 207 धनर्ऋणकल्पनाह — 208 अथार्कनाड्यानुक्रमाह — 209 सङ्क्रान्तिवर्तमानाधिकारमाह — 209 दिननक्षत्राधिकारः — 210 महानक्षत्रभुक्त्यधिकारः — 211 योग आनयनाधिकारः — 211 करणाधिकारः — 212 अवकहोडाचक्रज्योतिषं चतुश्चत्वारिंशं सूत्रम् ॥ 44 ॥ 213-217 तिथ्यादीनामाह — 213 योगनामानि — 214 करणनामानि — 214 अथावहकडाचक्रमाह — 215 राशिचरणविचारमाह — 216 राशिनामानि — 217

xli अवकहोडाचक्रज्योतिषं ज्योतिषफलं पञ्चचत्वारिंशं सूत्रम् ॥ 45 ॥ 217-226 योनिवैरमाह — 218 अथाष्टकवर्गमाह — 219 अथोष्टतरीदशामाह — 220 सूर्यदशाफलमाह — 221 चन्द्रदशाफलमाह — 221 अथाङ्गारकदशाफलमाह — 221 बुधदशाफलमाह — 222 शनिदशाफलमाह — 222 गुरुदशाफलमाह — 222 राहवादशाफलमाह — 222 शुक्रदशाफलमाह — 222 चन्द्रस्य द्वादशावस्थामाह — 223 तस्यफलमाह — 223 जन्मानुसारेणचन्द्रशासफलमाह — 224 चन्द्र-ताराबलमाह — 225 ज्योतिषलक्षणत्मकं षट्चत्वारिंशं सूत्रम् ॥ 46 ॥ 227-233 अधोमुखीनक्षत्रं — 227 ऊर्ध्वमुखीनक्षत्रं — 227 राक्षसगुणप्रधानाः — 228 मनुष्यगुणप्रधानाः — 228 देवगुणप्रधानाः — 228 सूर्यपातस्ययोगमाह — 229 क्षेत्राधिपत्याह — 229 ग्रहमैत्री — 230 लग्नघटिकाप्रमाणं — 231 दिवानिशालग्नानि — 231 विप्रादीनाभिधानं — 231 गणितक्षेत्रनिर्णयो नाम सप्तचत्वारिंशं सूत्रम् ॥ 47 ॥ 233-239 गणितपादं — 234

xlii एकात्पर्द्धादीनां गणनामाह — 234 संख्यापद नामानि च — 235 वृत्तदीनां फलानयनं — 237 भूपरीक्षाग्रहपूजा नामाष्टचत्वारिंशं सूत्रम् ॥ 48 ॥ 240-245 ग्रहणयोग्यपर्वताश्रितभूप्रदेशमाह — 240 नद्यादीनां भूक्षेत्रं — 240 सूत्रधारलक्षणम् — 242 सूत्रधारपरीक्षा नामैकोनपञ्चाशं सूत्रम् ॥ 49 ॥ 245-249 चतुर्विधपरीक्षणं — 246 भृत्यलक्षणं — 246 इत्यमनन्तर सुभाषितानि — 248 सूत्रधारलक्षणात्मकं पञ्चाशं सूत्रम् ॥ 50 ॥ 249-253 भूपरीक्षाग्रहकीलकारोपणमेकपञ्चाशं सूत्रम् ॥ 51 ॥ 254-271 आचार्यप्रशंसाह — 254 प्रथमपरीक्षणं — 255 प्लवानुसारेण गुणदोषादीनां — 256 आग्नेयप्लवभूमिफलमाह — 257 दक्षिणप्लवाफलं — 257 नैर्ऋतिप्लवाफलं — 257 पराप्लवाफलं -- 257 वायव्यप्लवाफलमाह — 258 उत्तरप्लवाभूफलं — 258 ईशानप्लवाभूफलं — 258 पुनरपि प्राक्प्लवाभूमिप्रशंसामाह — 259 गृहप्रासादोचितभूमिलक्षणं — 259 द्रुमानुसारेणभूगुणदोषं — 260 भूमिस्थनिधिसाधनं — 262 अथाहिबलचक्रम् — 263 सूर्यचन्द्रनक्षत्रसाधनम् — 265 इत्यमनन्तर वर्णानुसारेणयोग्यायोग्यभूमिलक्षणं — 266

xliii गन्धानुसारेणभूमिलक्षणं — 266 स्वादानुसारेणभूमिः — 266 दिशानुसारेण रेणुपतनफलं — 267 कीलकरोपणविचार — 268 कीलकस्य आयामप्रमाणं — 268 सूत्रलक्षणं — 269 सूत्रपातनमाह — 269 कूर्मप्रमाणपदप्रतिष्ठा नाम द्विपञ्चाशं सूत्रम् ॥ 52 ॥ 271-277 दिङ्मूढनिषेधमाह — 271 जीर्णप्रासादलक्षणं — 275 मर्मवेधविचार — 273 खातपूर्वकशल्यादीनोद्धारनिर्देशं — 274 तत्र कूर्मलक्षणं — 274 इत्यमनन्तर प्रासादस्य कूर्मलक्षणं — 275 कनिष्ठादित्रिविधकूर्मप्रमाणं — 276 धातुवानुसारेणकूर्मफलं — 276 देवासुरसङ्ग्रामादिवास्तूद्भवो नाम त्रिपञ्चाशं सूत्रम् ॥ 53 ॥ 277-284 पुराख्यानं कथ्यते — 277 देवासुरमहाघोरसङ्ग्रामवर्णनं — 278 शैलेन्द्रात् दैत्येन्द्रागमनं — 280 वास्तूत्पत्तिर्नाम चतुःपञ्चाशत्तमं सूत्रम् ॥ 54 ॥ 284-290 वास्तूत्पत्त्यधिकारे देवतान्यासो नाम पञ्चपञ्चाशत्तमं सूत्रम् ॥ 55 ॥ 290-292 वास्तोत्पत्ति अङ्गमाह — 292 वास्तुदेवतानिघण्टुर्नाम षट्पञ्चाशत्तमं सूत्रम् ॥ 56 ॥ 293-295 वास्तुक्षेत्रात्मकं सप्तपञ्चाशं सूत्रम् ॥ 57 ॥ 296-300 इत्यमनन्तर वास्तुस्थानमाह — 297 षट्क्षेत्राणिवर्णनम् — 299 वास्तुपददेवताभिधाननिर्णयो नामाष्टपञ्चाशं सूत्रम् ॥ 58 ॥ 300-305 वास्तुमर्मोपमर्मनिर्णयो नामैकोनषष्टितमं सूत्रम् ॥ 59 ॥ 305-308 वास्तुमर्मस्थानज्ञानफलयोर्विशेषमाह — 305

xliv उपवंशादीनां मर्मफलमाह — 307 ब्रह्मकर्णेषु महामर्ममाह — 307 वास्तुपुरुषस्य शिरोखातफलमाह — 308 दिक्पालादिवास्तुदेवपूजाबलिकर्मयुक्तिर्नाम षष्टितमं सूत्रम् ॥ 60 ॥ 309-315 अन्य देवताः — 309 तथा चान्य देवताः — 310 चरक्यादीनामष्टदेव्यां पूजासम्भाराह — 310 दिक्पालक्षेत्रपालश्च बलिं — 311 प्राचीं इन्द्रपूजानिर्देशमाह — 311 आग्नेयां अग्निदेवपूजानिर्देशमाह — 311 दक्षिणदिशायां यमदेवपूजानिर्देशमाह — 312 नैर्ऋत्यायां पूजानिर्देशमाह — 312 परदिशायां जलेश्वरपूजानिर्देशमाह — 312 वायव्यकोणायां वायुदेवपूजानिर्देशमाह — 313 उत्तरदिशायां निधिराजपूजानिर्देशमाह — 313 ईशान्यां रुद्रदेवपूजानिर्देशमाह — 313 अधस्तात्तु विष्णुदेवपूजानिर्देशमाह — 314 अधोर्ध्वायां ब्रह्मदेवपूजानिर्देशमाह — 314 आचार्यसूत्रधारपूजानिर्णयो नामैकषष्टितमं सूत्रम् ॥ 61 ॥ 315-319 सूत्रधारप्रशंसामाह — 316 शिल्पिनसम्मानाह — 317 सूत्रधारसम्मुखे प्रार्थनानिवेदनम् — 318 वास्तुपरिभ्रमणादिगुणदोषनिर्णयो नाम द्वाषष्टितमं सूत्रम् ॥ 62 ॥ 319-324 वास्तुदिशामुक्तिमानं रव्यानुसारेण वास्तुमुखस्थितिं — 320 इत्यमनन्तर एषां फलमाह — 320 दिक्विदिक वास्तुवेधमाह — 322 अन्यान्य दोषमाह — 323 गृहारम्भप्रतिष्ठादिनमासनिर्णयो नाम त्रिषष्टितमं सूत्रम् ॥ 63 ॥ 325-332 मासानुसारेणगृहारम्भफलमाह — 325 तिथ्यानुसारेणगृहारम्भफलमाह — 326