भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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सूत्र-४१ 193 एते अङ्गुलाक्षराणि क्रमशश्चैव संस्थितः। पुष्पके देवतास्तिस्रः प्रतिष्ठाप्या यथाक्रमम्॥ १२॥ ये इतने अङ्गुल अक्षरोंके अनुसार क्रमशः बनते हैं और प्रत्येक पुष्प चिह्न के स्थान पर तिस्र पर यथाक्रम देवताओं की प्रतिष्ठा करके स्थापना करनी चाहिए। आदौ विष्णुरग्रे रुद्रो ब्रह्मा मध्ये च संस्थितः। भूर्भुवः त्वर्बीजत्रयं स्युराद्यस्वरदेवताः॥ १३॥ हस्त-गज के अन्त में विष्णु, आगे की ओर रुद्र और मध्य में ब्रह्मा स्थित होते हैं तथा भूर्भुवः स्वः की बीजत्रयं की आद्यस्वर देवता रूप में प्रतिष्ठा है। ईश्वरो वायुविश्वे च वह्निर्ब्रह्मा दिवाकरः। रुद्रौ यमो विरूपाक्ष्यो वसुरिन्द्रो जलाधिपः॥ १४॥ स्कन्द इच्छा क्रियाज्ञानं धनदो विजयस्तथा। वासुदेवो बलभद्रः प्रद्युम्नश्चानिरुद्धकः॥ १५॥ एते च वासुदेवांशाः कम्बिकानिश्चला स्मृताः। आगमैर्वेद मन्त्रैश्च पूज्याश्च परमाः कलाः॥ १६॥ ईश्वर, वायु, विश्वेदेव, वह्नि, ब्रह्मा, दिवाकर, रुद्र, यम, विरुपाक्ष, वसु, इन्द्र, वरुण, स्कन्द, इच्छा, क्रिया, ज्ञान, कुबेर, विजय, वासुदेव, बलभद्र, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध— इतने सभी वासुदेव के अंश इस कम्बिका, गज में निश्चल रूप से अवस्थित है, ऐसा माना जाता है। अस्तु, आगमों और वेद मन्त्रों से इस परमा शिल्प कला को पूजा जाता है। रुद्रश्च पवनस्त्वष्टाऽनलो ब्रह्मा तथा यमः। वरुणो धनदो विष्णुर्मूलतश्चान्ततः स्थिताः॥ १७॥ रुद्र, पवन, त्वष्टा, अनल, ब्रह्मा, यम, वरुण, कुबेर, विष्णु आदि मूल से लेकर अन्त तक गज में स्थित है। हस्तोपयोगीकाष्ठादीनां — अञ्जनैः खदिरैर्वंशैः कनिष्ठाः सर्जपादपैः। हेमरौप्यताम्रमयाः श्रेष्ठा लौहाश्च मध्यमाः॥ १८॥ हस्त जिन-जिन धातु, काष्ठादि से बनाए जा सकते हैं उनके नाम हैं— अञ्जन वृक्ष की लकड़ी, खदिर, बाँस तथा सर्जपादप या सहजना के कनिष्ठ तथा स्वर्ण, चाँदी, ताम्र के श्रेष्ठ और लोहे के हस्त-गज मध्यम कहे गए हैं।¹

  1. राजवल्लभ. में कहा गया है- पुष्पैः चत्वारि पूर्वं तदनु च विभजेत्तुलैः पर्वपुष्पैर्निग्रन्थी रक्तकाष्ठो मधुमय