अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें192 अपराजितपृच्छा निर्णय किए गए हैं। अस्तु, हस्त में अर्थात् गज के प्रमाण में इनको बताए गए नियमों से न्यूनाधिक रखने पर महान भय उत्पन्न हो सकता है, अतः पूरा ध्यान रखना चाहिए। ज्येष्ठादीना हस्तभेदाः — ज्येष्ठं चाष्टयवैः ₈ प्रोक्तं मध्यमं सप्तभिर्यवैः ₇ । स्यात्कनिष्ठं षड् ₆ यवैस्तच्च्यतुर्विंशतिभिः ₂₄ करः ॥ 9 ॥¹ आठ यव के प्रमाण के 24 भागों वाले गज को ज्येष्ठ गज कहा जाता है। सात यव के प्रमाण के चौबीस भागों वाले गज को मध्यम और छह यव के प्रमाण के चौबीस भागों वाले गज को कनिष्ठ गज कहा जाता है। यहाँ गज को ही कर अथवा हस्त या हाथ कहा है। एवं मानोद्भवो हस्त उदितश्च त्रिधा क्रमात् । अङ्गुष्ठाग्रे पर्वरैखा पुष्पकं त्रिभिरङ्गुलैः ॥ 10 ॥ इस प्रकार के मान अर्थात् नाप से ही उद्भव होने वाले अर्थात् बनने वाले हस्त का उदित भी तीन प्रकार का होता है— हस्त या गज के अङ्गूठे से दबे भाग के आगे से पर्व रेखाएँ आरम्भ होती है उनमें तीन अङ्गुल यव प्रमाणानुसार बने भाग पर पुष्पचिह्न बनाए जाते हैं² और निम्न रुद्र गायत्री मन्त्र के चौबीस अक्षरों के अनुसार ये चौबीस भाग बनते हैं— अथ रुद्रगायत्री — ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि । तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्............ ॥ 11 ॥ (वह तत्पुरुष जिसका का कि रूप महादेव है, उसका ध्यान करते हैं, वह रुद्र हमारी बुद्धियों को आलोक के मार्ग पर प्रेरित करें।) इसमें चौबीस अक्षर हैं।³
- यह श्लोक समराङ्गण. से तुलनीय है— अष्टाभिः सप्तभिः षड्भिरङ्गुलानि यवोदरैः । ज्येष्ठमध्यकनिष्ठानि तच्चतुर्विंशतिः करः ॥ (समराङ्गण. 9, 5)
- राजवल्लभ में कहा गया है कि एक मात्रा या अङ्गुल बिना छिलके के छह उत्तम यवों के मध्य को संयुक्त करने से होती है। हस्त के पूर्व भाग में एक-एक अङ्गुल की दूरी पर चार पुष्प, इसके बाद हस्त के मध्य से अङ्गुल आठों पर्व पर्यन्त पुष्प करने चाहिए— हस्तः पर्वाष्टयुक्तो मुनिवररचितः पर्व चैकं त्रिमात्रम् मात्रा षण्णां यवानामुदरविमिलिता निस्त्वचामुत्तमानाम् । (राजवल्लभ. 1, 33)
- यह मन्त्र लिङ्गपुराण में (खण्ड 2, 27, 45; 2, 48, 7 तथा 2, 48, 7 पर) आया है। साधकों के लिए इसके जाप का नियम इस प्रकार कहा गया हैं— ॐ तत्पुरुषाय से अङ्गुष्ठ, विद्महे से तर्जनी, महादेवाय से मध्यमा, धीमहि से अनामिका, तन्नो रुद्रः से कनिष्ठिका का स्पर्श करें, प्रचोदयात् से करतलकर पृष्ठ स्पर्श करें। इसके लिए अङ्गन्यास - ॐ तत्पुरुषाय से हृदय, विद्महे से सिर, महादेवाय से शिखा, धीमहि से कवच, तन्नो रुद्रः से नेत्रत्रय, प्रचोदयात् से अस्त्र हथेली में दो अङ्गुलि ताडन करे।