अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-४१ 191 परमाणुः प्रमाणं तत् समुद्दिष्टं समन्ततः। परमाणुरष्टगुणमेकत्र पिण्डलक्षणम्॥ ४॥ रजोभिरष्टगुणितं केशाग्रं च प्रसिद्ध्यति। केशाग्रैरष्टगुणितैर्लिक्षाक्रमं तु योजयेत्॥ ५॥ केशाग्रैश्चाष्टगुणितैर्लिक्षा चैका तु सिद्ध्यति। लिक्षाभिरष्टभिर्यूका यूकाभिश्चाष्टभिर्यवः॥ ६॥ किसी अन्धेरे कक्ष में सूर्योदय के बाद छप्पर के किसी जालान्तरगत छिद्र से जो रश्मि आती है, उस रश्मि में अन्धकार कमरे में सूक्ष्मातिसूक्ष्म धूलिकण प्रकाशित होते दिखाई पड़ते हैं, ऐसे सूक्ष्म धूलीकणों को परमाणु कहते हैं और इस तरह के आठ परमाणु की मात्रा का एक रेणु का प्रमाण कहा गया है। इस परमाणु का आठ गुणा एक पिण्ड अर्थात् एक रज कहा गया है। ऐसे रज का आठ गुना केशाग्र अर्थात् बाल की नोक प्रमाण प्रसिद्ध है। केशाग्र का आठ गुना एक लिक्षा बनती है तथा ऐसी लिक्षा का आठ गुना एक यूका होती है और यूका का आठ गुना यव अथवा जौ होता है।¹ तथाष्टगुणितैश्चैव यवैर्मानं प्रसिद्ध्यति। निर्दोषं मानमेतं च स्यात्परमाणुमूलकम्॥ ७॥ इस तरह आठ-आठ गुणित करते हुए रेणु से यव मान प्रसिद्ध हुआ। इस प्रकार यह परमाणु मूलक मान निर्दोष मान कहा गया है। उत्तममध्यमाधमं त्रिविधो माननिर्णयः। न्यूनाधिके कृते हस्ते दोषः स्याच्च महाभयम्॥ ८॥ ऐसे मानों के भी तीन प्रकार कहे गए हैं जिन्हें उत्तम, मध्यम तथा अधम त्रिविध मान
- इसी प्रकार वराहमिहिर ने कहा है— जालान्तरगे भानो यदणुतरं दर्शनं रजो याति। तद्विन्द्यात् परमाणुं प्रथमं तद्धि प्रमाणानाम्॥ परमाणुरजो वालाग्रलिक्षायूकं यवोऽङ्गुलं चेति। अष्टगुणानि यथोत्तरमङ्गुलमेकं भवति संख्या॥ (बृहत्संहिता 58, 1-2) इसकी टीका में उत्पलभट्ट ने निम्न प्रमाण उद्धृत किया है— जालान्तरगते भानौ यत् सूक्ष्मं दृश्यते रजः। प्रथमं तत्प्रमाणं परमाणुं प्रचक्षते॥ तस्माद्रजः कचाग्रं च लिक्षा यूका यवोऽङ्गुलम्। क्रमादष्टगुणं ज्ञेयं जिनसङ्ख्याङ्गुले करः॥ (सविवृत्तिबृहत्संहितायाम् 57, 2) कौटलीयार्थशास्त्र में आया है— अष्टौ परमाणवो रथचक्रविप्रुट्। अष्टौ लिक्षा। ता अष्टौ यूकामध्यः। ते अष्टौ यवमध्यः। अष्टौ यवमध्या अङ्गुलम्॥ अर्थात्- आठ परमाणु एक स्थरेणु के बराबर होते हैं, आठ स्थरेणु एक लिक्षा, आठ लिक्षा एक यूकामध्य, आठ यूकामध्य एक यवमध्य तथा आठ यवमध्य एक अङ्गुलमान के बराबर होते हैं। इसी प्रकार मत्स्यपुराण में कहा गया है— जालान्तरप्रविष्टानां भानूनां यद्रजः स्फुटम्। त्रसरेणुः स विज्ञेयो बालाग्रं तैरथाष्टभिः॥ तदष्टकेन लिख्या तु यूका लिक्ष्याष्टकैर्मता। यवो यूकाष्टकं तद्वष्टभिस्तैस्तदङ्गुलम्॥ (अध्याय 258, 17-18)