भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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190 अपराजितपृच्छा उत्तर में आश्रित या खड़ा करें। इसके बाद एक अयुत से आठ अधिक अर्थात् दस हजार आठ महामृत्युञ्जय जप करने चाहिए। अष्टोत्तरसहस्रं च हुत्वापामार्गसमिद्भिः। दिक्षु चिन्हैः पूरितं च समुद्धरेत्पुनर्नवम् ॥ २४॥ इसी प्रकार एक हजार आठ आहुतियाँ अपामार्ग या चिचड़ा की समिधा से हवन में देनी चाहिए। उनके सभी दिशाओं में प्राप्त चिह्नों को पूरित करके उन सबको पुनः नए बनाकर उनका उद्धार कर लें। अनेन विधिना वत्स उद्धरेच्च शिलाद्रुमम्। अप्रशस्तं प्रशस्तं स्यादनेन विधिनान्वितम् ॥ २५॥ हे वत्स ! इस विधि से तुम शिला और वृक्षों के काष्ठ का उद्धार करके अप्रशस्त को भी प्रशस्त कर सकते हो। यह विधि अप्रशस्त को प्रशस्त करने वाली है। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तृश्रीभुवनदेवाचर्त्तोक्तेअपराजितपृच्छायां वनयात्राशिलापरीक्षाधिकारो नाम चत्त्वारिंशत्तमं सूत्रम् ॥ ४० ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में वनयात्रा शिलापरीक्षा अधिकार नामक चालीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ४० ॥ हस्तकम्बीप्रमाणमेकचत्वारिंशं सूत्रम् ॥ ४१॥ विश्वकर्मोवाच — हस्तलक्षणमानं च गायत्रीमानसम्भवः₂₄। मानोन्मान-प्रमाणं च सर्वकर्मसु कारणम् ॥ १ ॥ विश्वकर्मा बोले कि हस्त लक्षण मान अर्थात् गज के लक्षणमान गायत्री छन्द के चौबीस अक्षरों की तरह ही चौबीस खण्डों का होता है और यह गजमान, उन्मान, प्रमाण आदि के लिए सभी कर्मों में, कारणरूप में प्रयुक्त होता है। विज्ञेयं सूत्रधारेण हस्तमानं च लक्षणम्। मानोन्मानप्रमाणाख्यं वास्तुशास्त्रादिदीपकम् ॥ २ ॥ अतः सूत्रधार के हस्तमान अर्थात् गज के मान के लक्षण जानने चाहिए जो मान, उन्मान, प्रमाणादि वास्तुशास्त्र को प्रकाशित करने वाले दीपक के समान हैं। भास्करोदयनाद् दिष्टः किरणैश्च प्रकाशितः। जालान्तरगते रश्मौ सूक्ष्मेरेणुर्व्वष्टमांशकः ॥ ३॥