भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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सूत्र-४० 189 प्रजा का भला होता है।¹ अपराजित उवाच - यदि तत्प्राप्यते चिह्नं यथोक्तं च द्रुमाः शिलाः। तेषां विधिं क्रियायुक्तं कथयस्य परेश्वर ॥ 21 ॥ अपराजित ने पूछा कि यदि आपने जितने चिह्न बताए हैं, वे चिह्न पेड़ों और शिला में पाए जाएँ तो हे परमेश्वर! उनकी दुरुस्ती की विधि और क्रिया के बारे में भी बताने की कृपा करें। विश्वकर्मोवाच - पुनश्चेत्राप्यते चिह्नमानीत्वा नगरोत्तरे। आरोपयेत्ततो वृक्षं क्षिपेद् भूमध्यतः शिलाम् ॥ 22 ॥ विश्वकर्मा बोले कि पुनः यदि लाए गए वृक्ष नगर के उत्तर में रखे हों और उनमें ये चिह्न पाए जाएँ, उन वृक्षों को भूमध्य में डाली गई शिला के पास आरोपित कर दें। शिलोपरि स्थण्डिलं च वृक्षं चोत्तरमाश्रितम्। मृत्युञ्जयजपं चाष्टाधिकं कुर्यात्तथायुतम् ॥ 23 ॥ और, शिला पर मिट्टी का ढेर लगा लें और

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