भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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188 अपराजितपृच्छा राख जैसी शिला में तिमिरी (मत्स्य तुल्य रचना) हो सकती है और श्वेत भस्म के समान दिखाई देने वाली शिला में वारला अर्थात् बर्रे होते हैं और चितकबरी शिला में बिच्छू होता है। शहद जैसे वर्ण वाली शिला में जुगुन्नू होता है।¹ पञ्चाल्यां खेचरा ज्ञेयाः श्वेतवर्णे नरो भवेत्। एतैर्दोषैस्त्यजेल्लिङ्गं प्रतिमादोषमेव च॥ 16॥ पञ्चाली शिला में खेचर और श्वेतवर्णी में नर होता है। ये सभी शिलाएँ सदोष हैं और लिङ्ग एवं प्रतिमा निर्माण में दोषपूर्ण कही गई है। ऐसे में इनका प्रयोग नहीं करना चाहिए। उत्तमाधमवर्णैश्च पाषाणानुपलक्षयेत्। श्वेतश्च पद्मवर्णश्च कुमुदो मुद्गसन्निभः॥ 17॥ पाण्डरो माक्षिकवर्णः कपोतो भृङ्गसन्निभः। उत्तम, अधम रङ्गों के आधार पर ही शिलाओं की पहचान करनी चाहिए। सामान्यतया इनका रङ्ग श्वेत, पद्मवर्ण, कुमुद, मूंग जैसा, पाण्डुर, मधुमक्खी के शहद जैसा, कपोत जैसा, भौंरे जैसा होता है। श्वेते विप्राश्च वर्द्धन्ते राजन्याः पद्मवर्णके॥ 18॥ वैश्याश्च कुमुदाभेन मुद्गभे शूद्रजातयः। अन्ये तु शेषवर्णेषु वृद्धिमेवं तु लक्षयेत्॥ 19॥ श्वेत रङ्ग के पाषाणों का प्रयोग लिङ्ग, प्रतिमादि के लिए किया जाने पर ब्राह्मणों की वृद्धि होती है। पद्मवर्णी शिलाओं के प्रयोग से राजन्यवर्ग की वृद्धि होती है। कुमुद की आभा वाली शिलाओं के प्रयोग से वैश्य समुदाय की और मूँग के रङ्ग जैसी शिलाओं से शूद्र जाति की वृद्धि होती है। अन्य शेष वर्णों की शिलाओं से तो केवल वृद्धि मात्र लक्षित होगी। आरोग्यं पाण्डुवर्णेषु माषाभे विजयः स्मृतः। कपोते चार्थवृद्धिश्च भृङ्गाभेषु प्रजाश्रियः॥ 20॥ पाण्डु वर्ण की शिला से आरोग्य और उड़द के रङ्ग वाली शिला से विजय समझें और कपोत वर्ण की शिला से अर्थवृद्धि तथा भृङ्ग जैसी आभा वाली शिला से

  1. विष्णुधर्मोत्तरपुराण में आया है— सगर्भां तां विजानीयाद् यत्नेन च विवर्जयेत्। माञ्जिष्ठवर्ण संकाशे गर्भे भवति दर्दुरः॥ पीतके मण्डले गोधा कृष्ण विद्याद्भुजङ्गमम्। कपिले मूषकं विद्यात् कृकलासं तथारुणे॥ गुडवर्णे तु पाषाणं कापोते गृहगोधिका। आपो निर्त्रिशवर्णाभे भस्मे वर्णे तु बालुका॥ (तृतीयखण्ड 90, 11-13; विशेष द्रष्टव्य — प्रतिष्ठा लक्षण सार समुच्चय, पूर्वार्द्ध)