अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
188 अपराजितपृच्छा राख जैसी शिला में तिमिरी (मत्स्य तुल्य रचना) हो सकती है और श्वेत भस्म के समान दिखाई देने वाली शिला में वारला अर्थात् बर्रे होते हैं और चितकबरी शिला में बिच्छू होता है। शहद जैसे वर्ण वाली शिला में जुगुन्नू होता है।¹ पञ्चाल्यां खेचरा ज्ञेयाः श्वेतवर्णे नरो भवेत्। एतैर्दोषैस्त्यजेल्लिङ्गं प्रतिमादोषमेव च॥ 16॥ पञ्चाली शिला में खेचर और श्वेतवर्णी में नर होता है। ये सभी शिलाएँ सदोष हैं और लिङ्ग एवं प्रतिमा निर्माण में दोषपूर्ण कही गई है। ऐसे में इनका प्रयोग नहीं करना चाहिए। उत्तमाधमवर्णैश्च पाषाणानुपलक्षयेत्। श्वेतश्च पद्मवर्णश्च कुमुदो मुद्गसन्निभः॥ 17॥ पाण्डरो माक्षिकवर्णः कपोतो भृङ्गसन्निभः। उत्तम, अधम रङ्गों के आधार पर ही शिलाओं की पहचान करनी चाहिए। सामान्यतया इनका रङ्ग श्वेत, पद्मवर्ण, कुमुद, मूंग जैसा, पाण्डुर, मधुमक्खी के शहद जैसा, कपोत जैसा, भौंरे जैसा होता है। श्वेते विप्राश्च वर्द्धन्ते राजन्याः पद्मवर्णके॥ 18॥ वैश्याश्च कुमुदाभेन मुद्गभे शूद्रजातयः। अन्ये तु शेषवर्णेषु वृद्धिमेवं तु लक्षयेत्॥ 19॥ श्वेत रङ्ग के पाषाणों का प्रयोग लिङ्ग, प्रतिमादि के लिए किया जाने पर ब्राह्मणों की वृद्धि होती है। पद्मवर्णी शिलाओं के प्रयोग से राजन्यवर्ग की वृद्धि होती है। कुमुद की आभा वाली शिलाओं के प्रयोग से वैश्य समुदाय की और मूँग के रङ्ग जैसी शिलाओं से शूद्र जाति की वृद्धि होती है। अन्य शेष वर्णों की शिलाओं से तो केवल वृद्धि मात्र लक्षित होगी। आरोग्यं पाण्डुवर्णेषु माषाभे विजयः स्मृतः। कपोते चार्थवृद्धिश्च भृङ्गाभेषु प्रजाश्रियः॥ 20॥ पाण्डु वर्ण की शिला से आरोग्य और उड़द के रङ्ग वाली शिला से विजय समझें और कपोत वर्ण की शिला से अर्थवृद्धि तथा भृङ्ग जैसी आभा वाली शिला से
- विष्णुधर्मोत्तरपुराण में आया है— सगर्भां तां विजानीयाद् यत्नेन च विवर्जयेत्। माञ्जिष्ठवर्ण संकाशे गर्भे भवति दर्दुरः॥ पीतके मण्डले गोधा कृष्ण विद्याद्भुजङ्गमम्। कपिले मूषकं विद्यात् कृकलासं तथारुणे॥ गुडवर्णे तु पाषाणं कापोते गृहगोधिका। आपो निर्त्रिशवर्णाभे भस्मे वर्णे तु बालुका॥ (तृतीयखण्ड 90, 11-13; विशेष द्रष्टव्य — प्रतिष्ठा लक्षण सार समुच्चय, पूर्वार्द्ध)
सूत्र-४० 189 प्रजा का भला होता है।¹ अपराजित उवाच - यदि तत्प्राप्यते चिह्नं यथोक्तं च द्रुमाः शिलाः। तेषां विधिं क्रियायुक्तं कथयस्य परेश्वर ॥ 21 ॥ अपराजित ने पूछा कि यदि आपने जितने चिह्न बताए हैं, वे चिह्न पेड़ों और शिला में पाए जाएँ तो हे परमेश्वर! उनकी दुरुस्ती की विधि और क्रिया के बारे में भी बताने की कृपा करें। विश्वकर्मोवाच - पुनश्चेत्राप्यते चिह्नमानीत्वा नगरोत्तरे। आरोपयेत्ततो वृक्षं क्षिपेद् भूमध्यतः शिलाम् ॥ 22 ॥ विश्वकर्मा बोले कि पुनः यदि लाए गए वृक्ष नगर के उत्तर में रखे हों और उनमें ये चिह्न पाए जाएँ, उन वृक्षों को भूमध्य में डाली गई शिला के पास आरोपित कर दें। शिलोपरि स्थण्डिलं च वृक्षं चोत्तरमाश्रितम्। मृत्युञ्जयजपं चाष्टाधिकं कुर्यात्तथायुतम् ॥ 23 ॥ और, शिला पर मिट्टी का ढेर लगा लें और
190 अपराजितपृच्छा उत्तर में आश्रित या खड़ा करें। इसके बाद एक अयुत से आठ अधिक अर्थात् दस हजार आठ महामृत्युञ्जय जप करने चाहिए। अष्टोत्तरसहस्रं च हुत्वापामार्गसमिद्भिः। दिक्षु चिन्हैः पूरितं च समुद्धरेत्पुनर्नवम् ॥ २४॥ इसी प्रकार एक हजार आठ आहुतियाँ अपामार्ग या चिचड़ा की समिधा से हवन में देनी चाहिए। उनके सभी दिशाओं में प्राप्त चिह्नों को पूरित करके उन सबको पुनः नए बनाकर उनका उद्धार कर लें। अनेन विधिना वत्स उद्धरेच्च शिलाद्रुमम्। अप्रशस्तं प्रशस्तं स्यादनेन विधिनान्वितम् ॥ २५॥ हे वत्स ! इस विधि से तुम शिला और वृक्षों के काष्ठ का उद्धार करके अप्रशस्त को भी प्रशस्त कर सकते हो। यह विधि अप्रशस्त को प्रशस्त करने वाली है। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तृश्रीभुवनदेवाचर्त्तोक्तेअपराजितपृच्छायां वनयात्राशिलापरीक्षाधिकारो नाम चत्त्वारिंशत्तमं सूत्रम् ॥ ४० ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में वनयात्रा शिलापरीक्षा अधिकार नामक चालीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ४० ॥ हस्तकम्बीप्रमाणमेकचत्वारिंशं सूत्रम् ॥ ४१॥ विश्वकर्मोवाच — हस्तलक्षणमानं च गायत्रीमानसम्भवः₂₄। मानोन्मान-प्रमाणं च सर्वकर्मसु कारणम् ॥ १ ॥ विश्वकर्मा बोले कि हस्त लक्षण मान अर्थात् गज के लक्षणमान गायत्री छन्द के चौबीस अक्षरों की तरह ही चौबीस खण्डों का होता है और यह गजमान, उन्मान, प्रमाण आदि के लिए सभी कर्मों में, कारणरूप में प्रयुक्त होता है। विज्ञेयं सूत्रधारेण हस्तमानं च लक्षणम्। मानोन्मानप्रमाणाख्यं वास्तुशास्त्रादिदीपकम् ॥ २ ॥ अतः सूत्रधार के हस्तमान अर्थात् गज के मान के लक्षण जानने चाहिए जो मान, उन्मान, प्रमाणादि वास्तुशास्त्र को प्रकाशित करने वाले दीपक के समान हैं। भास्करोदयनाद् दिष्टः किरणैश्च प्रकाशितः। जालान्तरगते रश्मौ सूक्ष्मेरेणुर्व्वष्टमांशकः ॥ ३॥
सूत्र-४१ 191 परमाणुः प्रमाणं तत् समुद्दिष्टं समन्ततः। परमाणुरष्टगुणमेकत्र पिण्डलक्षणम्॥ ४॥ रजोभिरष्टगुणितं केशाग्रं च प्रसिद्ध्यति। केशाग्रैरष्टगुणितैर्लिक्षाक्रमं तु योजयेत्॥ ५॥ केशाग्रैश्चाष्टगुणितैर्लिक्षा चैका तु सिद्ध्यति। लिक्षाभिरष्टभिर्यूका यूकाभिश्चाष्टभिर्यवः॥ ६॥ किसी अन्धेरे कक्ष में सूर्योदय के बाद छप्पर के किसी जालान्तरगत छिद्र से जो रश्मि आती है, उस रश्मि में अन्धकार कमरे में सूक्ष्मातिसूक्ष्म धूलिकण प्रकाशित होते दिखाई पड़ते हैं, ऐसे सूक्ष्म धूलीकणों को परमाणु कहते हैं और इस तरह के आठ परमाणु की मात्रा का एक रेणु का प्रमाण कहा गया है। इस परमाणु का आठ गुणा एक पिण्ड अर्थात् एक रज कहा गया है। ऐसे रज का आठ गुना केशाग्र अर्थात् बाल की नोक प्रमाण प्रसिद्ध है। केशाग्र का आठ गुना एक लिक्षा बनती है तथा ऐसी लिक्षा का आठ गुना एक यूका होती है और यूका का आठ गुना यव अथवा जौ होता है।¹ तथाष्टगुणितैश्चैव यवैर्मानं प्रसिद्ध्यति। निर्दोषं मानमेतं च स्यात्परमाणुमूलकम्॥ ७॥ इस तरह आठ-आठ गुणित करते हुए रेणु से यव मान प्रसिद्ध हुआ। इस प्रकार यह परमाणु मूलक मान निर्दोष मान कहा गया है। उत्तममध्यमाधमं त्रिविधो माननिर्णयः। न्यूनाधिके कृते हस्ते दोषः स्याच्च महाभयम्॥ ८॥ ऐसे मानों के भी तीन प्रकार कहे गए हैं जिन्हें उत्तम, मध्यम तथा अधम त्रिविध मान
- इसी प्रकार वराहमिहिर ने कहा है— जालान्तरगे भानो यदणुतरं दर्शनं रजो याति। तद्विन्द्यात् परमाणुं प्रथमं तद्धि प्रमाणानाम्॥ परमाणुरजो वालाग्रलिक्षायूकं यवोऽङ्गुलं चेति। अष्टगुणानि यथोत्तरमङ्गुलमेकं भवति संख्या॥ (बृहत्संहिता 58, 1-2) इसकी टीका में उत्पलभट्ट ने निम्न प्रमाण उद्धृत किया है— जालान्तरगते भानौ यत् सूक्ष्मं दृश्यते रजः। प्रथमं तत्प्रमाणं परमाणुं प्रचक्षते॥ तस्माद्रजः कचाग्रं च लिक्षा यूका यवोऽङ्गुलम्। क्रमादष्टगुणं ज्ञेयं जिनसङ्ख्याङ्गुले करः॥ (सविवृत्तिबृहत्संहितायाम् 57, 2) कौटलीयार्थशास्त्र में आया है— अष्टौ परमाणवो रथचक्रविप्रुट्। अष्टौ लिक्षा। ता अष्टौ यूकामध्यः। ते अष्टौ यवमध्यः। अष्टौ यवमध्या अङ्गुलम्॥ अर्थात्- आठ परमाणु एक स्थरेणु के बराबर होते हैं, आठ स्थरेणु एक लिक्षा, आठ लिक्षा एक यूकामध्य, आठ यूकामध्य एक यवमध्य तथा आठ यवमध्य एक अङ्गुलमान के बराबर होते हैं। इसी प्रकार मत्स्यपुराण में कहा गया है— जालान्तरप्रविष्टानां भानूनां यद्रजः स्फुटम्। त्रसरेणुः स विज्ञेयो बालाग्रं तैरथाष्टभिः॥ तदष्टकेन लिख्या तु यूका लिक्ष्याष्टकैर्मता। यवो यूकाष्टकं तद्वष्टभिस्तैस्तदङ्गुलम्॥ (अध्याय 258, 17-18)
192 अपराजितपृच्छा निर्णय किए गए हैं। अस्तु, हस्त में अर्थात् गज के प्रमाण में इनको बताए गए नियमों से न्यूनाधिक रखने पर महान भय उत्पन्न हो सकता है, अतः पूरा ध्यान रखना चाहिए। ज्येष्ठादीना हस्तभेदाः — ज्येष्ठं चाष्टयवैः ₈ प्रोक्तं मध्यमं सप्तभिर्यवैः ₇ । स्यात्कनिष्ठं षड् ₆ यवैस्तच्च्यतुर्विंशतिभिः ₂₄ करः ॥ 9 ॥¹ आठ यव के प्रमाण के 24 भागों वाले गज को ज्येष्ठ गज कहा जाता है। सात यव के प्रमाण के चौबीस भागों वाले गज को मध्यम और छह यव के प्रमाण के चौबीस भागों वाले गज को कनिष्ठ गज कहा जाता है। यहाँ गज को ही कर अथवा हस्त या हाथ कहा है। एवं मानोद्भवो हस्त उदितश्च त्रिधा क्रमात् । अङ्गुष्ठाग्रे पर्वरैखा पुष्पकं त्रिभिरङ्गुलैः ॥ 10 ॥ इस प्रकार के मान अर्थात् नाप से ही उद्भव होने वाले अर्थात् बनने वाले हस्त का उदित भी तीन प्रकार का होता है— हस्त या गज के अङ्गूठे से दबे भाग के आगे से पर्व रेखाएँ आरम्भ होती है उनमें तीन अङ्गुल यव प्रमाणानुसार बने भाग पर पुष्पचिह्न बनाए जाते हैं² और निम्न रुद्र गायत्री मन्त्र के चौबीस अक्षरों के अनुसार ये चौबीस भाग बनते हैं— अथ रुद्रगायत्री — ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि । तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्............ ॥ 11 ॥ (वह तत्पुरुष जिसका का कि रूप महादेव है, उसका ध्यान करते हैं, वह रुद्र हमारी बुद्धियों को आलोक के मार्ग पर प्रेरित करें।) इसमें चौबीस अक्षर हैं।³
- यह श्लोक समराङ्गण. से तुलनीय है— अष्टाभिः सप्तभिः षड्भिरङ्गुलानि यवोदरैः । ज्येष्ठमध्यकनिष्ठानि तच्चतुर्विंशतिः करः ॥ (समराङ्गण. 9, 5)
- राजवल्लभ में कहा गया है कि एक मात्रा या अङ्गुल बिना छिलके के छह उत्तम यवों के मध्य को संयुक्त करने से होती है। हस्त के पूर्व भाग में एक-एक अङ्गुल की दूरी पर चार पुष्प, इसके बाद हस्त के मध्य से अङ्गुल आठों पर्व पर्यन्त पुष्प करने चाहिए— हस्तः पर्वाष्टयुक्तो मुनिवररचितः पर्व चैकं त्रिमात्रम् मात्रा षण्णां यवानामुदरविमिलिता निस्त्वचामुत्तमानाम् । (राजवल्लभ. 1, 33)
- यह मन्त्र लिङ्गपुराण में (खण्ड 2, 27, 45; 2, 48, 7 तथा 2, 48, 7 पर) आया है। साधकों के लिए इसके जाप का नियम इस प्रकार कहा गया हैं— ॐ तत्पुरुषाय से अङ्गुष्ठ, विद्महे से तर्जनी, महादेवाय से मध्यमा, धीमहि से अनामिका, तन्नो रुद्रः से कनिष्ठिका का स्पर्श करें, प्रचोदयात् से करतलकर पृष्ठ स्पर्श करें। इसके लिए अङ्गन्यास - ॐ तत्पुरुषाय से हृदय, विद्महे से सिर, महादेवाय से शिखा, धीमहि से कवच, तन्नो रुद्रः से नेत्रत्रय, प्रचोदयात् से अस्त्र हथेली में दो अङ्गुलि ताडन करे।
सूत्र-४१ 193 एते अङ्गुलाक्षराणि क्रमशश्चैव संस्थितः। पुष्पके देवतास्तिस्रः प्रतिष्ठाप्या यथाक्रमम्॥ १२॥ ये इतने अङ्गुल अक्षरोंके अनुसार क्रमशः बनते हैं और प्रत्येक पुष्प चिह्न के स्थान पर तिस्र पर यथाक्रम देवताओं की प्रतिष्ठा करके स्थापना करनी चाहिए। आदौ विष्णुरग्रे रुद्रो ब्रह्मा मध्ये च संस्थितः। भूर्भुवः त्वर्बीजत्रयं स्युराद्यस्वरदेवताः॥ १३॥ हस्त-गज के अन्त में विष्णु, आगे की ओर रुद्र और मध्य में ब्रह्मा स्थित होते हैं तथा भूर्भुवः स्वः की बीजत्रयं की आद्यस्वर देवता रूप में प्रतिष्ठा है। ईश्वरो वायुविश्वे च वह्निर्ब्रह्मा दिवाकरः। रुद्रौ यमो विरूपाक्ष्यो वसुरिन्द्रो जलाधिपः॥ १४॥ स्कन्द इच्छा क्रियाज्ञानं धनदो विजयस्तथा। वासुदेवो बलभद्रः प्रद्युम्नश्चानिरुद्धकः॥ १५॥ एते च वासुदेवांशाः कम्बिकानिश्चला स्मृताः। आगमैर्वेद मन्त्रैश्च पूज्याश्च परमाः कलाः॥ १६॥ ईश्वर, वायु, विश्वेदेव, वह्नि, ब्रह्मा, दिवाकर, रुद्र, यम, विरुपाक्ष, वसु, इन्द्र, वरुण, स्कन्द, इच्छा, क्रिया, ज्ञान, कुबेर, विजय, वासुदेव, बलभद्र, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध— इतने सभी वासुदेव के अंश इस कम्बिका, गज में निश्चल रूप से अवस्थित है, ऐसा माना जाता है। अस्तु, आगमों और वेद मन्त्रों से इस परमा शिल्प कला को पूजा जाता है। रुद्रश्च पवनस्त्वष्टाऽनलो ब्रह्मा तथा यमः। वरुणो धनदो विष्णुर्मूलतश्चान्ततः स्थिताः॥ १७॥ रुद्र, पवन, त्वष्टा, अनल, ब्रह्मा, यम, वरुण, कुबेर, विष्णु आदि मूल से लेकर अन्त तक गज में स्थित है। हस्तोपयोगीकाष्ठादीनां — अञ्जनैः खदिरैर्वंशैः कनिष्ठाः सर्जपादपैः। हेमरौप्यताम्रमयाः श्रेष्ठा लौहाश्च मध्यमाः॥ १८॥ हस्त जिन-जिन धातु, काष्ठादि से बनाए जा सकते हैं उनके नाम हैं— अञ्जन वृक्ष की लकड़ी, खदिर, बाँस तथा सर्जपादप या सहजना के कनिष्ठ तथा स्वर्ण, चाँदी, ताम्र के श्रेष्ठ और लोहे के हस्त-गज मध्यम कहे गए हैं।¹
- राजवल्लभ. में कहा गया है- पुष्पैः चत्वारि पूर्वं तदनु च विभजेत्तुलैः पर्वपुष्पैर्निग्रन्थी रक्तकाष्ठो मधुमय
ुलानां क्रमेण नवदेवताः ॥ 23 ॥ * Line 22:सिद्धार्थ अङ्गुल अर्थात् मध्यमा अङ्गुल के समान मोटाई का पिण्ड करके, * Line 23:उसके आधे से चौबीस अङ्गुल के क्रम से नव देवता हैं। * Line 24:रुद्राद्या ब्रह्मापर्यन्तं देवाः स्थानेषु पुष्पके । * Line 25:ब्रह्मतो विष्णुपर्यन्तं रेखाः स्युर्द्वादशाङ्गुलैः ॥ 24 ॥ * Line 26:इनमें रुद्र से आरम्भ करके ब्रह्मा तक के देवों के पुष्पक होते हैं और ब्रह्मा से * Line 27:विष्णु पर्यन्त के बारह अङ्गुल में रेखा होती है। * Footnotes: उदितः खदिरो वंशाधात्वोः ॥ (राजवल्लभ. 1, 33) समराङ्गण. में आया है— तस्य निर्माणदारूणि देवताश्च प्रचक्ष्महे ॥ खदिराञ्जनवंशादिशूक्ष्णरूपं मनोरमम् । सारवच्च भवेदिष्टं दारु हस्तप्रकल्पने ॥ ग्रन्थिलं लघु निर्दग्धं जीर्णं स्फुटितं तथा ।
सूत्र-४१ 195 ब्रह्मादिस्थानपञ्चकं द्विभक्तं चाङ्कितं त्रिधा। अष्टतङ्गुलं कार्यं चतुर्था द्वादशाङ्कितम् ॥ २५ ॥ ब्रह्मा से आरम्भ होने वाले स्थान पञ्चक को दो भागों में बाँटे और अष्टम स्थान को तीन भाग में बाँटे तथा बारहवें अङ्गुल स्थान को चार भाग में बाँटकर अङ्कित कर देना चाहिए। इत्युक्तमानप्रमाणं प्रयुक्तं वास्तुवेदिभिः । वास्तोरुत्तरपार्श्वेऽर्च्यं कम्बिकाकलशादिकम् ॥ २६ ॥ इस प्रकार मान प्रमाण को वास्तुशास्त्र के विद्वानों ने प्रयुक्त किया है। इस कम्बिका- गज की और कलशों की वास्तु के उत्तर की ओर स्थापना करके पूजा करनी चाहिए। आच्छादयेद्वस्त्रयुग्मैः कम्बिकां कलशांस्तथा । सुगन्धधूपपुष्पैश्च देवतार्थार्नादिकैः ॥ २७ ॥ इसके बाद, दो वस्त्रों से कम्बिका-गज और कलश को अलग-अलग ढक दे और सुगन्धित धूप, पुष्पों से देवताओं का पूजन, अर्चादिक करें। समुद्धरेत् पूजयित्वा स्तोत्रैर्याम्यकरोत्तमैः । उच्चाटनं व्याधी रोगस्तथा सन्तापकारणम् ॥ २८ ॥ अग्निभयं प्रजापीडा मृत्युर्व्याधिः पुनस्तथा । निधनं नरकपातं रुद्रादि विष्णुतुस्तथा ॥ २९ ॥ इसी प्रकार स्तोत्र का पाठ करते हुए दाहिने उत्तम हाथ से उनको उठाएँ। कम्बिका-गज के रुद्र से आरम्भ करके ब्रह्मा भाग तक (पीड़ित होने पर) होने वाले विघ्न हैं— 1. उच्चाटन, 2. व्याधि, 3. रोग, 4. सन्ताप, 5. अग्निभय, 6. प्रजापीड़ा, 7. मृत्यु व्याधि, 8. निधन और 9. नरक में गिरना। एकाङ्गुलौ मानप्रयोग एवं सङ्ख्याशब्दादिकोत्तमः ? । पर्यायशब्दा व्यवहारयोगे समीरिताः सूत्रकलाप्रवीणैः ॥ ३० ॥ एक अङ्गुल से बनने वाले मान, माप का प्रयोग एवं शब्दादिकों के द्वारा समझी जाने वाली संख्या के उत्तम पर्याय शब्द जो व्यवहार में लाने के योग्य हैं, ऐसे सूत्र कला के प्रवीण विद्वानों ने निर्धारित किए हैं। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां हस्तकम्बीप्रमाणाधिकारो नामैकचत्वारिंशत्तमं सूत्रम् ॥ 41 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में हस्तकम्बी प्रमाण अधिकार नामक इकतालीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 41 ॥
196 अपराजितपृच्छा गणितशब्दनिघण्टुर्नाम द्विचत्वारिंशं सूत्रम् ॥ ४२ ॥ विश्वकर्मोवाच - शब्दा उक्ता अङ्गुलाद्या निघण्टौ भाषितानि च। भूयोजनप्रमाणानि प्रवक्ष्यामि यथार्थतः ॥ १ ॥ विश्वकर्मा बोले कि निघण्टु में भाषित जो शब्द अङ्गुल से आरम्भ करके भूमि के योजन प्रमाणों के लिए कहे गए हैं, उनको मैं ठीक-ठीक तरह से कहता हूँ। अथाङ्कज्ञानमाह - क्ष्माक्षितितनुशब्दरूप-मन्त्रचन्द्राश्चैकपर्यायाः। पक्षयुग्मनेत्रद्वन्दगोलकं दस्त्राश्विन्यौविषाणचरणा द्वयोः ॥ २ ॥ एकादि संख्याओं के पर्यायार्थक शब्द क्रमशः ये हैं- संख्या 1 के लिए क्ष्मा, क्षिति, तनु, शब्द, रूप, मन्त्र और चन्द्रमा शब्दों का प्रयोग होता है। इसी प्रकार संख्या 2 के लिए - पक्ष, युग्म, नेत्र, द्वन्द, गोलक, हस्त, अश्विनौ, विषाण और चरण होते हैं। अग्नयो गुणरामाश्च कालसङ्ख्याविधिस्तथा। शक्तयो हरनेत्राणि त्रयाणां वाचका इमे ॥ ३ ॥ संख्या 3 के लिए अग्नि, गुण, राम, काल, संख्या, विधि, शक्ति-त्रिशूल, हरनेत्र - इतने तीन के पर्याय हैं। कृतकोणयुगविध्यास्य तुर्याम्बुधि दिग्विदिग्मङ्गला। गोचरणमार्गाख्यातं भागाः श्रुतयश्च सङ्ख्या चतुर्णाम् ॥ ४ ॥ संख्या 4 के लिए कृत, कोण, युग, विधिमुख या आस्य, तुर्य, अम्बुधि, दिक्- विदिक्, मङ्गल, गोचरण, मार्ग, भाग, श्रुतियाँ— ये संख्या चार के पर्याय हैं। इषुविषयतत्त्वेन्द्रियधृषण ? (स्वर्द्रु !)शम्भुवक्त्र क्षेत्राणि। वास्तुलिङ्ग प्रतीता हत ? (व्रत !)भवमुखानि च पञ्चानाम् ॥ ५ ॥ संख्या 5 के लिये इषु, विषय, तत्त्व, इन्द्रिय, (धृषण ? स्वर्दु), भूषण, शम्भुवक्त्र, क्षेत्र, वास्तुलिङ्ग, प्रतीत, हत ? भवमुख - ये पाँच के पर्याय हैं। गायत्रीदर्शनखण्डरसर्तुयान कर्णिक ? ( कोणक! ) रागषण्मिश्रम्। द्विशक्ति काणगण रत्नशक्त्या ननामृत ग्रन्थ स्कन्दवक्त्रं षण्णाम् ॥ ६ ॥ संख्या 6 के लिए गायत्री, दर्शन, खण्ड, रस, ऋतु, यान, कर्णिक ? (कोणक), राग, षण, मिश्र, द्विशक्ति, काणगण, रत्नशक्ति, नानामृत, ग्रन्थ, स्कन्दवक्त्र (कार्तिकेय के मुख, षडानन) - इतने छह संख्या के पर्याय हैं।
सूत्र-४२ 197 समुद्राद्रिद्वीपनगा कन्या यक्ष स्वर नाद खण्डाग्रम ? (खण्डाङ्गम्)। ऋषिमुनीन्द्रसप्तलोकसूर्याश्व (श्व ?) पातालानि सप्तानाम् ॥ ७ ॥ संख्या 7 के लिए समुद्र, अद्रि, द्वीप, नग, कन्या, यक्ष, स्वर, नाग खण्डाग्र ?, खण्डाङ्गम, ऋषि, मुनीन्द्र, सप्तलोक, सूर्याश्व, पाताल— ये सात संख्या के पर्याय हैं। शैलान्वय वसुपद्मदल जातिक्रमच्छन्दांसि ? । व्यक्तिगम स्वराप्रमानशंभव अष्टानाम् ? ॥ ८ ॥ संख्या 8 के लिए शैल, अन्वय, वसु, पक्षदल, जातिक्रम, छन्द ? व्यक्तिगम, स्वर, आप्रमान— ये संख्या आठ के पर्याय हैं। अलङ्कार रन्ध्र प्रदेश अङ्गस्थान कत्याहस्ताङ्गलवण( ?कुलमुद्रणां )। भू वरिष्ठं ताराष्टैक क्रमोद्भव नवानाम् ? ॥ ९ ॥ संख्या 9 के लिए अलङ्कार, रन्ध्र, प्रदेश, अङ्गस्थान, कत्या, हस्ताङ्ग, लवण, भू, वरिष्ठ, ताराष्टैक— ये संख्या नौ के पर्याय हैं। निस्वरादिकविष्ण्वतारप्रदेशैकनखार्धस्वरताल दशानाम ? संख्या 10 के लिए निस्वरादिक्, विष्णु के अवतार, प्रदेश, नख, अर्धस्वर और ताल— ये दस की संख्या के पर्याय है। दशैकरुद्रभूताद्विगोकर्णशातत्वेकादशानाम् ? संख्या 11 के लिए दशैक (दस + एक), रुद्र, भूताद्विगोकर्णशतत्वे ?— ये ग्यारह के पर्याय हैं। तालवितस्तिमुखवदनसूर्यमासा केशं च भानु रुद्रैक शिव द्वादशानाम् ? संख्या 12 के लिए ताल, वितस्ति, मुख, वदन, सूर्य, मास, केश, भानु, रुद्रैक व शिव— ये बारह संख्या के पर्याय हैं। दैत्यादि सुरेन्द्रादित्या सूर्यैक खात त्रिदशास्त्रयोदशसुवाचकाः ? संख्या 13 के लिए दैत्य, सुरेन्द्र, आदित्य, सूर्यैक, खात, त्रिदशा, त्रयोदश अर्थात् तेरह संख्या के पर्याय हैं। भुवनमनुव्यक्ति शाक्तेन्द्र खण्डल द्विसप्तमन्वन्तर चतुर्दशानाम् ? इसी प्रकार संख्या 14 के लिए भुवन, मनु, व्यक्ति, शाक्तेन्द्र, खण्डल, द्विसप्त और मन्वन्तर— ये चौदह संख्या के पर्याय हैं। तिथिर्मासार्ध पञ्चदशानाम्।
198 अपराजितपृच्छा संख्या 15 के लिए तिथि और मासार्ध को पर्याय कहा गया है। कला द्विरष्ट तृपभृङ्गा पक्षैक बिन्दुषोडशानाम्। संख्या 16 के लिए कला, द्विरष्ट, तृपभृङ्ग, पक्षैक, बिन्दु और षोडश ये सोलह के पर्याय हैं। जन्मपक्षरंभोभ्यासश्चेति द्विरष्टैकन्यून सप्तदशानाम्। संख्या 17 के लिए जन्मपक्षरंभोभ्यास ? द्विरष्टैकन्यून (8 + 8 + 1 = 17) — ये सप्तदश संख्या के पर्याय (स्पष्ट नहीं है)। वेदाङ्गस्मृति शान्ति विभूति पौराण्यभवोद्भव महाव्रत मेघराजश्चाष्टादशानाम्। संख्या 18 के लिए वेदाङ्ग, स्मृति, शान्ति (आहुति- वैष्णवी, ऐन्द्री, ब्राह्मी, रौद्री, वायव्या, वारुणी, कौबेरी, भार्गवी, प्राजापत्या, त्वाष्ट्री, कौमारी, वह्निदेवता, मारुद्गणा, गान्धारी, नैर्ऋतकी, आङ्गिरसी, याम्या, सर्वकामदा, पार्थिवी- अग्निपुराण 264, 7-9), विभूति, पुराण, भवोद्भव, महाव्रत, मेघराज— ये अठारह संख्या के पर्याय हैं। अधृति अतृप्ति विफला अमोघात्वेकोनविंशतिः। संख्या 19 के लिए अधृति, अतृप्ति, विफला, अमोघा— ये एकोनविंशति यानी उन्नीस के पर्याय हैं। नखविश्वा विश्वपार स्वन्ती धृतीप्ति स्याद्विंशतिः। संख्या 20 के लिए नख, विश्वा, विश्वपार, स्वन्ती, धृतीप्ति— ये बीस संख्या के पर्याय हैं। त्रिषाक्रान्तामूर्च्छनास्तेकविंशतिः। कृष्णाक्रान्ता भूर्ध्यानां त्वेकविंशतिः। संख्या 21 के लिए त्रिषाक्रान्ता, मूर्च्छना, कृष्णाक्रान्ता, भूर्ध्याना— ये इक्कीस संख्या पर्याय है। श्रुत्याऽहुत्याक्रमानां द्वाविंशत्तिः।¹ संख्या 22 के लिए श्रुतियाँ (सङ्गीत में तीव्रा, कुमुद्वती, मन्दा, छन्दोवती, दयावती, रञ्जनी, रक्तिका, रौद्री, क्रोधी, वज्रिका, प्रसारिणी, प्रीति, मार्जनी, क्षिति, रक्ता, सन्दीपिनी, आलापिनी, मदन्ती, रोहिणी, रम्या, उग्रा एवं क्षोभिणी श्रुतियाँ
- तृसृतां स्वामारोप्या द्वाविंशतिः ? इति प्रकाशित पाठः।
सूत्र-४२ 199 होती हैं) और आहुति क्रम (विष्णुस्मृति में आया है कि आहुति के क्रमशः बाईस क्रम हैं) — ये बाईस के पर्याय हैं। त्रिकात्रीयंकास्तीर्णा त्रयोविंशतिः। संख्या 23 के लिए त्रिकात्रीयं कास्तीर्णा — ये तेबीस के पर्याय हैं। तीर्था जिनमहाद्विशासनी चतुर्विंशतिः। संख्या 24 के लिए तीर्थ, जिन, महाद्विशासनी — ये चौबीस के पर्याय हैं। तत्त्वगुणयुग्मात् पञ्चविंशतिः। संख्या 25 के लिए तत्व, गुण₅ युग्म₂ — ये पच्चीस के पर्याय हैं। एकाङ्गुलादि हस्तान्ता समाः शब्दाः प्रकीर्तिताः। निघण्टौ एतावन्तश्च पर्यायकाः सुदीपकः॥ 18 ॥ इस प्रकार एक अङ्गुल से आरम्भ करके हस्त-गज के अन्त तक के लिए समान शब्दों को कहा गया। निघण्टु¹ में इनको पर्याय शब्द से स्पष्ट किया जाता है।
- 'सङ्गीतदामोदर' नामक ग्रन्थ में विस्तृत अङ्कप्रतीक कोष आया है। अपराजित. के प्रस्तुत अध्याय के खण्डित होने के कारण यह उद्धृत करना अप्रासङ्गिक नहीं होगा। संख्या सूचक पारम्परिक शब्द निम्नानुसार होंगे— एकः शान्तरसः शुक्लः रोचनी रजनीमणिः। आत्मा गजास्यवदनः स्वाराड् गजत्तुरङ्गमौ॥ द्वयं शृङ्गारपङ्कासिधारा श्रीरामनन्दनाः। आश्विनेय नदीकूलस्तनदन्तच्छदध्रुवः॥ त्रयं वीरस्वरग्रामग्रीवारेखागुणाग्रयः। गङ्गाधरहरदृक् कालवलिशूलशिखाजगत्॥ वामनाङ्घ्रिमहीकोणरामज्वरशिरःपुरः। मेरुशृङ्गं कालिदासकाव्यं सन्ध्याथ पुष्करम्॥ अर्थात् : एक होता है— शान्तरस, शुक्ल (शिव), (रजनीमणि), आत्मा, गणेश (गजवदन), इन्द्र (स्वाराट्), गज (ऐरावत) तथा तुरङ्गम (उच्चैः श्रवा)। दो संख्या के सूचक है— शृङ्गार (द्विविध), पङ्क, असिधारा, राम के पुत्र (लव-कुश), अश्विनीकुमार, नदीकूल, स्तन, अधरोष्ठ, भौंहें। तीन हैं— वीर (त्रिविध), स्वरग्राम, गर्दन की रेखाएँ, गुण, अग्नियाँ, गङ्गाधर शिव के नेत्र, काल, वलि, शूल, शिखा जगत्, वामन के चरण, मही के कोण, राम, ज्वर, मस्तक, पुर, मेरु के शिखर, कालिदास के काव्य, सन्ध्याएँ तथा पुष्कर। चत्वारि मार्गा वर्गाब्धिवेदब्रह्मामुखाश्रमाः। उपायवर्णसेनाङ्गयामविष्णुभुजायुगम्। पशुपादेन्द्रमातङ्गदन्तशास्त्रदशादयः॥ पञ्च हास्यरसस्वर्द्रुभूतरौद्रास्यपाण्डवाः। व्रताग्नीन्द्रियवर्गाङ्गानिलप्रेतमहामखाः॥ पुराणलक्षणं पूर्वमहापापेन्द्रियार्थकाः॥ षट् चक्रवर्तितर्काङ्गसेनानीमुखदर्शनम्। त्रिशिरोदृग्वज्रकोणो हास्यं रसगुणर्तवः॥ अर्थात्— चार होते हैं- मार्ग, वर्ग, समुद्र, वेद, ब्रह्मा के मुख, आश्रम, उपाय, सेना के अङ्ग, याम, विष्णु की भुजाएँ, युग, पशु के चरण, इन्द्र के मातङ्ग, उसके दाँत, शास्त्र और दशा आदि। पाँच के बोधक हैं— हास्य रस, स्वर्द्रु (स्वर्ग के वृक्ष), भूत, रुद्र के मुख, पाण्डव, व्रत, अग्नि, इन्द्रिय, वर्ग, अङ्ग, अनिल (प्राण), प्रेत, महायज्ञ, पुराण के लक्षण, पूर्व, महापाप एवं इन्द्रियार्थ। छह होते हैं— चक्रवर्ती, तर्क के अङ्ग, सेनानी-मुख, (कार्तिकेय के मुख), दर्शन, त्रिशिरा के नेत्र, वज्र के कोण, हास्य-भेद, रस, गुण तथा ऋतुएँ।
200 अपराजितपृच्छा सप्त स्वराब्धिगमकपातालार्कतुरङ्गमाः। वारव्रीहिमुनिद्वीपराज्याङ्गत्रिदशालयाः। वैश्वानरशिखामुक्तिनगरीभुवनादयः॥ अष्टौ गीतगणब्रह्माकर्णयोगाङ्गदिग्गजाः। कुलाचलव्याकरणवसुसिद्धिभुजङ्गमाः॥ दिक्कालशरभाङ्घ्रीशमूर्तयो गोखुरादयः। नवाङ्क रसभाखण्डपत्रीज्वरदृशो ग्रहाः॥ उत्कृत्तो रावणशिरोऽङ्कद्राक्षकुलमुद्रणाः। सुधाकुण्डोपवीतीय- गुणव्याघ्रीस्तना निधिः॥ अर्थात्- सात के सूचक हैं- स्वर, समुद्र, गमक, पाताल, सूर्य के अश्व, वार, चावल (व्रीहि), ऋषि, द्वीप, राज्य के अङ्ग (सप्तप्रकृति), देवताओं के आलय, वैश्वानर की शिखाएं, मुक्तियां, नगरी, भुवन आदि। अष्ट की संख्या के ज्ञापक हैं- गीत, गण, ब्रह्मा के कान, योग के अङ्ग, दिग्गज, कुलपर्वत, व्याकरण, वसु, सिद्धियां, भुजङ्ग (महानाग), दिक्, काल, शरभ के पैर (अष्टापद), ईश की मूर्तियाँ (अष्टमूर्ति), गाय के खुर आदि। नवाङ्क वाचक शब्द हैं- रस, भूखण्ड, पत्र, ज्वर, नेत्र, ग्रह, कटे हुए रावण के मस्तक, अङ्कद्वार, कुलमुद्रणा, सुधा-कुण्ड, उपवीती के गुण, व्याघ्री के स्तन तथा निधियाँ। दशानङ्गदशहरस्ताङ्गुलिरावणमस्तकाः। शङ्करश्रुतिदिग्विदेवशीतांशुवाजिनः। कृष्णावतारगिरिजाबाहुदायार्जुनाभिधः॥ एकादश महादेवाः सेनाः कुरुमहीपतेः॥ द्वादशादित्यसंक्रान्तिसारिकोष्ठकराशयः। सेनानीबाहुनयनमासक्षौणीशमण्डलाः॥ अर्थात् - दस की संख्या में हैं- अनङ्ग के दस हाथ, अङ्गुलियां, रावण के मस्तक, शङ्कर के कान, दिशाएँ, विश्वेदेव, चन्द्रमा के घोड़े, कृष्ण के अवतार, गिरिजा की भुजाएं, दाय तथा अर्जुन के नाम। एकादश होते हैं-रुद्र (महादेव) तथा कुरुराज की सेनाएं (ग्यारह अक्षौहिणी)। बारह हैं-आदित्य, उनकी संक्रान्तियाँ, सारियों (गोटियों) के कोष्ठक और राशियाँ, सेनानी (कार्तिकेय) की भुजाएं और नयन, मास तथा राजा के मण्डल। त्रयोद
सूत्र-४२ 201 वास्तुशास्त्रोद्भवं वेदेशे मानसङ्ख्या मानं सङ्ख्यायाश्च प्रमाणतः । पद्मपदेकः ? प्रमाणशास्त्रतः वास्तुशास्त्रार्थदीपकाः ॥ 19 ॥ वेदेश के द्वारा वास्तुशास्त्रोद्भव करते समय मापने के लिए प्रयोग करने हेतु प्रमाणतः मान संख्याओं को पद्म प(त्र)क रूप में प्रमाण शास्त्र को वास्तुशास्त्र के लिए अर्थ को समझने के लिए दीपिका या प्रकाश स्वरूप बनाया है । हस्तः करो जिनाङ्गुलो द्वितालो मानदण्डकः । वर्णवभुजोमाख्याता तमुशास्त्रास्तुया ग्रहस्ताना ? ॥ 20 ॥ हस्त, गज, कर आदि संज्ञा से कम्बिका मानदण्ड का जिनाङ्गुल अर्थात् 24 अङ्गुल प्रमाण का द्विताल अर्थात् 12 + 12 ताल अर्थात् 24 अङ्गुल प्रमाण का होता है। इसी को वर्णवभुज भी कहते हैं। इसी से ये शाश्वत हाथ-हस्त-गज-कर भी कहा जाता है। ( वर्णचतुष्क विख्यातः तत्तु शाखासु या गृहस्थानाम ? ) घन निबिड निर्घूट शिलार्थ ? द्विकरो दण्डार्थः युग्महस्तावदार्धा ? ॥ 21 ॥ (यह वर्ण चतुष्क विख्यात है। इससे शा(स्त्रा)स्तु या गृहस्थों को) ? घन निबिड़ निर्घूट शिलार्थ को ? दो हाथ को दण्डार्थ युग्महस्ता, दो हाथ के बराबर अर्थात् आधा ? द्विगुण द्विहस्तानां तुत्र इषु जिनन्य इषु त्रिपाद दण्ड पा ( प्रा ) दु ( द ) नश्च ।
षष्ठिसहस्राणि सगरस्य महात्मनः । लक्षमिन्दीवराक्षीणां शशबिन्दोरभूदिति। पूर्णं षष्टिसहस्रेण पुत्रलक्षं मुरद्विषः ॥ अर्थात्— सौ की संख्या में सौ भिषक्, तारेन्द्र, यज्ञपुरुष की आयु, रावण की अङ्गुलियाँ, शतदल (कमल), धृतराष्ट्र के पुत्र कौरव, समुद्र के योजन। हजार हैं- शेष नाग के मस्तक, गङ्गा के मुख, कमल के पत्र (दल), सूर्य की रश्मियाँ, सहस्रार्जुन के हाथ, वेद की शाखाएँ और इन्द्र की आँखें। दो सहस्र गिनी जाती है वासुकि और शेषनाग की जिह्वाएँ। अयोध्यावासियों की आयु दस हजार वर्ष की होती थी। पुष्पवाहन भूपति के पुत्रों की संख्या भी 'अयुत' (दस हजार) थी। महात्मा सगर के आठ हजार पुत्र थे। शशबिन्दु (विष्णु या चन्द्र) की एक लाख कमललोचना पत्नियाँ थीं। साठ हजार से पूर्ण एक लाख पुत्र मुररिपु (विष्णु) के थे। सङ्गीत में भरत का मत यही है। लक्षाणि षट् प्रचक्ष्यन्ते काकायुर्वत्सराः किल। नवलक्षं रामरुद्रनरेन्द्रस्य धनुर्धराः ॥ पुरोक्तः शशबिन्दूयों दशलक्षाणि तत्सुताः। रन्तिदेवस्य नृपतेः पुत्राः कोटितयोदिताः ॥ छलात् प्रकाशिता संख्या प्रायो ज्योतिर्विदां मुदे ॥ अर्थात्— कौए की आयु के वर्ष छह लाख कहे जाते हैं। राम और रुद्र नरेन्द्र के नौ लाख धनुर्धर थे। शशबिन्दु के दस लाख पुत्र थे। राजा रन्तिदेव के करोड़ पुत्र कहे गए हैं। इस प्रकार गणितज्ञों के चित्र के आनन्द हेतु ये संख्याएँ प्रकाशित की गई हैं। (पं. शुभङ्कर लाहिड़ी कृत सङ्गीतदामोदर स्तबक पञ्चम)
202 अपराजितपृच्छा द्वासमभ्याङ्गुलं प्रोक्तं पक्षहस्तनि ( द्वि ) हस्तानाम ? ॥ 22 ॥ दो हाथ से दुगुना ( यह श्लोक भ्रष्ट है । ) दण्डश्चापो धनुः स्मृतर्भुमाप्य बृहद्करशिलायाम् ? । मविघ्न ( धन ) श्र ( स्य ) तु हस्तानामेव च ? ॥ 23 ॥ दण्ड को चाप और धनु भी कहा जाता है जिनसे भूमि और बड़ी-बड़ी शिला को मापते हैं......( शेष श्लोक भ्रष्ट होने से अर्थ अस्पष्ट है ।) अन्वयसन्ताकश्च सन्तानोद्भव मानतः । सृष्ट्युद्भवं दण्डाग्र आदिछन्द पर्वनिष्काशः ? ॥ 24 ॥ एकोद्भवमालाक्ष आद्योक्त माप्य घराक्ष घ ( र ) न्यम ! । करतलवंश विंशतिहस्तानां च ? ॥ 25 ॥ ( उक्त दोनों श्लोक भ्रष्ट होने से अर्थ अस्पष्ट है ।) यवान्तं प्रमाणं मध्यं प्रयुक्तं परमाणुतः । मध्याङ्गुलस्य कथये अंशाश्चैव प्रमाणतः ॥ 26 ॥ अङ्गुलस्याष्टमांशं यद् तन्मानं निन्यशो यवः । द्विरष्टांशो भवेच्छिख्या ? अंशानां चतुर्विंशतिः ॥ 27 ॥ परमाणु को आधार मानकर यव-जौ मोटाई तक माप के प्रयोग से मध्यमा अङ्गुलि की मोटाई अंश का माप बना इस प्रमाण से मध्यमा अङ्गुलि के अष्टमांश से जो माप बनता है उसे यव कहते है। दो अष्टांश के बराबर शिख्या ? होती है। अंश चौबीस होते हैं। अङ्गुलस्याष्टमांशेन यवो यूका तदंशतः । लिक्षा यूकाष्टमांशेन केशां तदष्टमांशकम् ॥ 28 ॥ अङ्गुलि मध्यमा की मोटाई का अष्टमांश यव होता है, यव का अष्टमांश यूका तथा यूका का अष्टमांश लिक्षा और लिक्षा का अष्टमांश केशाग्र होता है। रेणुः केशस्याष्टमांशः प्रमाणं तत्तदंशतः । तस्याष्टमांशे छाया च कथिताश्च क्रमेण तु ॥ 29 ॥ उक्त केशाग्र का अष्टमांश रेणु और रेणु का अष्टमांश परमाणु तथा परमाणु का अष्टमांश छाया क्रमवार कह दिया गया है। प्रयुक्तं मानमुद्दिष्टं प्रमाणशास्त्रदीपकम् । निघण्टु भाषोत्तमाख्या प्रयुक्ता वास्तुवेदिभिः ॥ 30 ॥
सूत्र-४३ 203 ये मान अर्थात् माप करने की लम्बाई प्रमाण पूर्वक बता दी है। वास्तुशास्त्र के दीपक की तरह काम करके ज्ञान का प्रकाश होगा। इसी उद्देश्य से वास्तुवेत्ताओं ने भाषा में बड़े उत्तम तरीके से यह निघण्टु-शब्द पर्यायकोश प्रयुक्त किया है। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचोक्तापराजितपृच्छायां गणिशब्दनिघण्टवधिकारो नाम द्विचत्वारिंश सूत्रम् ॥ 42 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में गणित शब्द निघण्टु अधिकार नामक बयालीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 42 ॥ ज्योतिषपञ्चाङ्गवासना नाम त्रयश्चत्वारिंशं सूत्रम् ॥ 43 ॥ विश्वकर्मावाच — ज्योतिषं च प्रवक्ष्यामि ¹पञ्चपदार्थकोत्तमम्। यतः समस्तमुत्पन्नं चन्द्रार्कद्रुतिवेदनम् ॥ 1 ॥ विश्वकर्मा बोले कि अब मैं ज्योतिष के बारे में कहता हूँ जो उत्तम पाँचवें पदार्थ की तरह है (चार पदार्थ- धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष है), ज्योतिष इनमें पाँचवाँ कहा है जिससे चन्द्र, सूर्य आदि की द्रुत गति आदि जानने की समस्त जानकारी प्राप्त होती है। अथ ज्योतिषमाहात्म्याह — यथा दिनं विना सूर्य शशाङ्कं शर्वरी विना। कुटुम्बिनो विना पुत्र शास्त्रं वै ज्योतिषं विना ॥ 2 ॥ ज्योतिष का महत्व बताने के लिए कहा है कि जिस प्रकार सूर्य के अभाव में दिन का होना व्यर्थ है, चन्द्र के प्रकाश बिना रात्रि होना व्यर्थ है, कुटुम्ब में पुत्र बिना सब व्यर्थ है उसी प्रकार समस्त शास्त्र भी ज्योतिष के अभाव में व्यर्थ लगते हैं। तिथिवारंश्च नक्षत्रं योगः करण एव च। ²चन्द्रार्कयोश्च सङ्क्रान्त्या वक्ष्ये पञ्चाङ्गवासनाः ॥ 3 ॥
- 'ज्योतिषं च प्रवक्ष्यामि पञ्चमादार्थकोत्तमम्। यतोद्भव समस्तवेदं चन्द्रार्कमिववाछति' इति न. पाठः। इस श्लोक में 'पञ्चपञ्चाङ्गकोत्तमं' पाठ सम्भव है क्योंकि सूत्र का शीर्षक भी इसे कहता है। ज्योतिषपञ्चाङ्ग में तिथि, वार, योग, करण और नक्षत्रों की गणना होती है। महर्षि गर्ग का मत है— ज्योतिश्चक्रे तु लोकस्य सर्वस्योक्तं शुभाशुभम्। ज्योतिर्ज्ञानं च यो वेद स याति परमां गतिम् ॥ (मुहूर्तचिन्तामणि, पीयूषधाराटीका 1, 2)
- 'सङ्क्रान्ति चन्द्रसूर्यश्च कथयपञ्चाङ्गसना' इति न. पाठः।
अपराजितपृच्छा तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण में चन्द्र और सूर्य की जब-तब संक्रान्ति होती है, उसे ही पञ्चाङ्ग-वासना कहते हैं। अथ संवत्सरानयनं — कल्पन्तस्था कृताद्या च प्रतिष्ठाप्येव भुक्तिका। संवत्सरैर्हरिद्भागं लब्धं शेषैक कृताः ? ॥ ४ ॥ संवत्सरैः पुनर्भार्गं लब्धं सूत्र समुद्धरेत ? । एकनवट्याष्टशताभिष्टश्रं ? तदाङ्कः शाक उच्यते¹ ॥ ५॥ कृत् अर्थात् सतयुग से लेकर कलियुग के अन्त तक जितने वर्ष अर्थात् संवत्सर भुक्त हुए, उनको प्रतिष्ठित करें। भुक्त संवत्सर को घटाने-हरने से जो भाग शेष बचता है लब्ध होता है एक कृता ?। संवत्सरों, वर्ष के पुनः भाग करके जो लब्ध आए उससे सूत्र समुद्धरेत, बनाएँ। इससे जो मान बनता है वह एकानवे के ऊपर आठ सौ (891 इष्टश्र ?) होते हैं, इस अङ्क को 'शक' कहते है।² तथाङ्कं नखाङ्गहीनमर्कगणचैत्रादियुक्³ ? । त्रिस्थानैः स्थापयेच्चैवं नन्दयुग्मयमैस्तथा ॥ ६ ॥ फलवेदगुणा मध्याः पातं वाष्टनियोजिताः। शून्यरामेन्दुभिर्भागैर्योजयेत् प्रथमं फलम् ॥ ७॥ अनष्टकारे शेषः ? पञ्चरामनिशाकराः⁴। मासे धनोभ्यनष्टहीना षष्ठिभागैः शेषमृणम् ॥ ८ ॥
- 'कृतान्यो कृति क्रंतस्था उक्तिमेवं प्रतिष्ठयेत्। संवत्सरे हरेद्भागं लघुशेषा कृत कृता॥ संवत्सरो पुनर्भागं लब्धं सूत्रं समुद्धरेत्। एकनवट्याष्टाशतमिष्टेश्च तदशंकश उच्यते॥' इति न. पाठः।
- यहाँ पाठ भ्रष्ट होने से यह विधि युक्तिसंगत प्रतीत होती है कि कल्पोक्तगत वर्ष में 1972947179- 1706430 घटाने पर 195583617 ये सृष्टि से शकादि तक सौर वर्ष हुए। इसमें इष्ट शक जोड़ने पर अभीष्ट शक के प्रारम्भ में सृष्टि से वर्ष संख्या होती है : नन्दान्द्रीन्दुगुणाष्टाष्टबाणपञ्चनवेन्दवः (1972947179)। संयुक्ताः शककालेन सृष्टिसंवत्सरा गताः॥ (बृहद्दैवज्ञरञ्जनम् 3, 28) श्रीपति के अनुसार शक संख्या जानकर बार्हस्पत्य संवत्सर की संख्या और वर्तमान नाम जानने की रीति यह है कि जिस शक में बार्हस्पत्य संवत्सर का नाम जानना हो उसे शाके की संख्या को पृथक रखकर, 22 से गुणा कर प्राप्त गुणनफल में 4291 का योग करें उपरान्त उसमें 1875 का भाग दें। वर्ष-मास आदि जो प्राप्त हो उसको अलग रखे हुए शाक संख्या में जोड़े और 60 से तष्टित करने से शाकारम्भ समय में प्रभव आदि 60 संवत्सर के भुक्त वर्षादि समझना चाहिए। भुक्त वर्षादि को 60 में घटाने से भोग्य वर्षादि होते हैं— शकेन्द्रकालः पृथगाकृतिघ्नः₂₂ शशाङ्कनन्दाक्षियुगैः₄₂₉₁ समैतः। शराद्रिवस्विन्दु₁₈₇₅ हतः सलब्धः षष्ट्यासशेषे प्रभवादयोऽब्दाः॥ (ज्योतिषरत्नमाला 1, 3)
- 'तथायां ततथंणहीनं अर्कगणा चैत्रादिमासपूत्' इति न. पाठः।
- 'अनष्टकारे शेषः सवरामनिशाकराः। मासे धनो अनष्टं हीनां कष्टभोगकं सिखरिणं' इति पाठः।
सूत्र-४३ {' '} 205 पूर्वोक्त अङ्क संख्या में नख (20) अङ्ग (9) अर्कगण से चैत्रादि युक् तीन स्थानों पर स्थापित करें और नन्द (9) युग्म (2) यम (1) फल वेद (4) गुण (3) घटाकर (पातं) आठ जोड़ दें। इसके बाद, शून्य, राम, इन्दुभि (130) भागों को जोड़ देने से प्रथम फल आता है। पुनः अनष्ट करे, शेष ? पञ्चराम निशाकर (135) मान के घन नष्टहीन साठ भागों में शेष को ऋण करें।¹ अमावास्या ध्रुवकस्य मासे मासे तथा पुनः ।² चारुभद्र ध्रुवकमासे द्विधा द्विरामधना ? ॥ 9 ॥ वेदान्वेन्दुभिर्भागैः फलोनेक षष्टिभाग- घटिकामाप्रोति तिथि विज्ञेय फलमासगुणामिश्रितः ? ॥ 10 ॥ अमावस्या ध्रुवक संख्या प्रति मास अर्थात् हर एक मास में पुनः बारम्बार चारुभद्र ध्रुवक मासों में दो प्रकार से द्विर्राम (6) अथवा (32) धन बना ? वेदान्वेन्दु भिर्भागै (194) भागों में फलाने से षष्टिभाग (60) भाग की घटिका (आप्रोति) आती है, इसको तिथि कहते हैं, जिसमें फल मास गुणा मिश्रित (312) होगी। सप्तमे स्थितारन्येन्द्र वार उदये यमहरे मासगणे ?। द्विसङ्गच्छेद्धिसार्धभाग पिण्डामग्रिलबुद्धाद्विके। युक्तोवसयमसेसा ?³ ॥ 11 ॥ इति नष्टध्रुवकायनम् । इसी प्रकार सातवें अन्य इन्द्रादि से वार उदय होते हैं, यम हरे मासगणे ? दो के साथ ढाई भाग को पिण्ड अर्थात् मिलाकर अग्नि (3) लव आदि युक्तो वस यम सेसा ? होता है। अमावास्या ⁴ध्रुवमासे मासे मासे तथा पुनः। एवं युक्तिर्विधातव्या वर्तते चाङ्गवासना ॥ 12 ॥ मास-मास में अमावस्या को ध्रुवक मानें और इसी युक्ति से वासना अङ्गों का विचार किया जाता है।
- पाठ भ्रष्ट होने से यह अर्थ अस्पष्ट है, केवल शब्दार्थ मात्र किया गया है। यदि 'चैत्रादियुक्' पाठ माना जाए तो मकरन्द (बृहद्दैवज्ञरंजनम् 4, 12-13) की तरह की गणित हो सकती है।
- 'अमास्या ध्रुवस्य माध्यं मासे तथा पुनः। एवं युक्ति विधातव्या वर्तेपेत्येवांग वासना॥ कंसभद्रधूकमासं द्विधारामध्वाना इन्दुभिभागैः फलैःनि कष्टीभाग घटिका प्रोतिथी यज्ञेफल मासगुणामिश्रित।' इति न. पाठः।
- 'सप्तासा सत्तारख्ये द्वार सदयेवसहाय। मासगणे द्विसंगस्थे सिद्धाभागपिडांग्रिलबुध्वा। द्विके युक्ते वसुव मास सा। इति नष्टध्रुवकामयंत।' इति न. पाठः।
- 'ध्रुवमासे न मासे मासे तथा पुनः। एवं युक्तिविध्यातवर्तावेत्पज्ञाङ्गवासिनी।' इति न. पाठः।
206 अपराजितपृच्छा एकोत्तरे ध्रुवमध्ये द्वात्रिंशद् घटिकायुतम् । पक्षपिण्डं च युग्मर्क्षं घटिके चन्द्रसङ्ख्यया¹ ॥ १३ ॥ इस अमावस्या से अमावस्या तक के स्थिर मान में ध्रुवमध्य से साठ घटिका युक्त दो पक्ष पिण्डों मे चौपन (युग्मर्क्षे) घटिका की चन्द्रसंख्या होती है। प्रथमं स्थापयेद्वारं वारघट्यस्तदूर्ध्वतः । पिण्डकेषु अधरताच्च ऋक्षं च घटिकार्धतः ॥ १४ ॥ पहले वार लिख कर स्थापित करें, उस वार की घटिका उसके ऊपर की ओर लिखें, इन दोनों के पिण्ड के नीचे नक्षत्र और उनकी घटिका आधी घटिका तक लिखें। एवं भुक्ती रवेः ख्याता सङ्क्रान्त्याद्युपलक्षयेत् । एषा त्वन्तरयुक्तीश्च लक्ष्याः पञ्चाङ्गवासनाः ॥ १५ ॥ इस युक्ति से सूर्य की संक्रान्ति आदि उपलक्षित होती है। इस प्रकार की अन्तर युक्तियों को लक्ष्य में रखकर पञ्चाङ्ग-वासना का विचार किया जाता है। मासान्ते पूर्वध्रुवके योज्याऽमावास्यिकान्ततः । वारसप्तभागं त्यक्त्वा घटिकाः षष्टि वारोच्यते ॥ १६ ॥ मास के अन्त में पहले के स्थिरमान ध्रुवक अङ्क में इनको अमावस्या के अन्त तक जोड़ कर सात भागों में वार को छोड़कर साठ घटिका को वार कहते हैं। एवं वारो ध्रुवे साध्यो घटिकाः षष्टिरग्रतः । अष्टाविंशतिभिर्भाग्यं शेषैः स्याद् ध्रुवसाधका ॥ १७ ॥ इस प्रकार फिर वार स्थिर हो जाने पर आगे भी साठ साठ घटिका साधते जाए और अट्ठाईस से भाग देकर शेष को ध्रुव-स्थिर साधक बनाएँ। अमावास्या ध्रुवमासे मासे मासे तथा पुनः । एवं युक्तिर्विधातव्या वृत्ता पञ्चाङ्गवासना ॥ १८ ॥ इस तरह अमावस्या को ध्रुवक बनाकर प्रतिमास इसी तरह करते हुए आवृत्ति से पञ्चाङ्ग-वासना का विचार किया जाता है। सप्तविंशतिभागैस्तु घटिकाः षष्टिरेव च । एवमृक्षं साध्यं घटिकाषष्टिरग्रतः ॥ १९ ॥ सताईस भागों की साठ घटिकाओं वाले नक्षत्रों को स्थिर अङ्क साध्य बनाकर आगे की घटिका षष्टि इसी तरह बनाएँ।
- 'वेकोतार ध्रुवकामध्या योज्या द्वाविंशघटिका युतां। क्षययन युग्मं रक्षं घटिकाचन्द्रसंख्यया' इति न. पाठः ।
सूत्र-४३ 207 एवं ध्रुवः क्रमात्साध्यो मासान्तेषु पुनः पुनः। अमान्ते च ध्रुवः साध्यस्तिथिं पश्चात् प्रवर्तयेत् ॥ 20 ॥ इस प्रकार ध्रुव स्थिराङ्क क्रमपूर्वक, साधते हुए मास के अन्त में बारम्बार अमावस्या तक स्थिराङ्क बनाएँ जिससे तिथियाँ बनती हैं। वारस्थाने तिथियोंज्या ?¹ हरेद्भागं तु सप्तभिः । यच्छेषं लभ्यते वारस्तेषु तिथिं तद्भाषिता ? ॥ 21 ॥ वार के स्थान पर तिथि को लगाकर ? उसमें सात का भाग दें और जो शेष बचें उसे वार और उसी से तिथि कही जाती है ?। तिथिपिण्डं पुनर्भक्त्या भागं स्याद्वै द्विसप्तभिः । भागमध्ये धनं ख्यातं लब्धिमध्ये ऋणं तथा ॥ 22 ॥ तिथियों की पिण्ड राशि बनाकर उसे चौदह से भाग दें और योग के बीच धन विख्यात् होता है और लब्धि मध्य में ऋण विख्यात होता है। द्वितीयोर्ध्वं धनं ख्यातं तृतीयोर्ध्वमृणं तथा । चतुर्थोर्ध्वे धनं चैव षष्ठात्परं न विद्यते ॥ 23 ॥ भागात्परं वदेद्वाचः ? यच्छेषं तत्र तिष्ठति । शब्दयोगं च सन्त्यज्य शब्दाख्यं चैव स्थापयेत् ॥ 24 ॥ द्वितीया के ऊपर धन और तृतीया के ऊपर ऋण विख्यात् होता है, फिर चतुर्थी के ऊपर धन और छह से परे धन नहीं होता। भाग के बाद वाच कहे ? जहाँ चाहे वहाँ रखे और शब्दयोग को छोड़ कर शब्दाख्य को भी स्थापित करें। नाड़ीज्ञानमाह — आद्ये त्रयोदशे पञ्च द्वितीये द्वादशे दश । एकादशे तृतीये च नाड्यः पञ्चदश स्मृताः ॥ 25 ॥ चतुर्थे दशमे तु स्यादेकोनविंशतिस्तु ताः । पञ्चमे नवमे नाड्यो द्वाविंशतिरुदाहृताः ॥ 26–1 ॥ पहली से तेरह तक पाँच, दूसरी से बारह तक दस, तीसरी से ग्यारह तक नाड़ी पन्द्रह होती है। चौथे से दशम तक उन्नीस होती हैं। पाँचवें से नवें तक नाड़ी बाईस कही गई है। षष्ठेऽष्टमे च घटिकाश्चतुर्विंशतिरीरिताः । १. 'वारस्थानैर्विदैवोंत्य' इति न. पा.।