भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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सूत्र-४२ 199 होती हैं) और आहुति क्रम (विष्णुस्मृति में आया है कि आहुति के क्रमशः बाईस क्रम हैं) — ये बाईस के पर्याय हैं। त्रिकात्रीयंकास्तीर्णा त्रयोविंशतिः। संख्या 23 के लिए त्रिकात्रीयं कास्तीर्णा — ये तेबीस के पर्याय हैं। तीर्था जिनमहाद्विशासनी चतुर्विंशतिः। संख्या 24 के लिए तीर्थ, जिन, महाद्विशासनी — ये चौबीस के पर्याय हैं। तत्त्वगुणयुग्मात् पञ्चविंशतिः। संख्या 25 के लिए तत्व, गुण₅ युग्म₂ — ये पच्चीस के पर्याय हैं। एकाङ्गुलादि हस्तान्ता समाः शब्दाः प्रकीर्तिताः। निघण्टौ एतावन्तश्च पर्यायकाः सुदीपकः॥ 18 ॥ इस प्रकार एक अङ्गुल से आरम्भ करके हस्त-गज के अन्त तक के लिए समान शब्दों को कहा गया। निघण्टु¹ में इनको पर्याय शब्द से स्पष्ट किया जाता है।

  1. 'सङ्गीतदामोदर' नामक ग्रन्थ में विस्तृत अङ्कप्रतीक कोष आया है। अपराजित. के प्रस्तुत अध्याय के खण्डित होने के कारण यह उद्धृत करना अप्रासङ्गिक नहीं होगा। संख्या सूचक पारम्परिक शब्द निम्नानुसार होंगे— एकः शान्तरसः शुक्लः रोचनी रजनीमणिः। आत्मा गजास्यवदनः स्वाराड् गजत्तुरङ्गमौ॥ द्वयं शृङ्गारपङ्कासिधारा श्रीरामनन्दनाः। आश्विनेय नदीकूलस्तनदन्तच्छदध्रुवः॥ त्रयं वीरस्वरग्रामग्रीवारेखागुणाग्रयः। गङ्गाधरहरदृक् कालवलिशूलशिखाजगत्॥ वामनाङ्घ्रिमहीकोणरामज्वरशिरःपुरः। मेरुशृङ्गं कालिदासकाव्यं सन्ध्याथ पुष्करम्॥ अर्थात् : एक होता है— शान्तरस, शुक्ल (शिव), (रजनीमणि), आत्मा, गणेश (गजवदन), इन्द्र (स्वाराट्), गज (ऐरावत) तथा तुरङ्गम (उच्चैः श्रवा)। दो संख्या के सूचक है— शृङ्गार (द्विविध), पङ्क, असिधारा, राम के पुत्र (लव-कुश), अश्विनीकुमार, नदीकूल, स्तन, अधरोष्ठ, भौंहें। तीन हैं— वीर (त्रिविध), स्वरग्राम, गर्दन की रेखाएँ, गुण, अग्नियाँ, गङ्गाधर शिव के नेत्र, काल, वलि, शूल, शिखा जगत्, वामन के चरण, मही के कोण, राम, ज्वर, मस्तक, पुर, मेरु के शिखर, कालिदास के काव्य, सन्ध्याएँ तथा पुष्कर। चत्वारि मार्गा वर्गाब्धिवेदब्रह्मामुखाश्रमाः। उपायवर्णसेनाङ्गयामविष्णुभुजायुगम्। पशुपादेन्द्रमातङ्गदन्तशास्त्रदशादयः॥ पञ्च हास्यरसस्वर्द्रुभूतरौद्रास्यपाण्डवाः। व्रताग्नीन्द्रियवर्गाङ्गानिलप्रेतमहामखाः॥ पुराणलक्षणं पूर्वमहापापेन्द्रियार्थकाः॥ षट् चक्रवर्तितर्काङ्गसेनानीमुखदर्शनम्। त्रिशिरोदृग्वज्रकोणो हास्यं रसगुणर्तवः॥ अर्थात्— चार होते हैं- मार्ग, वर्ग, समुद्र, वेद, ब्रह्मा के मुख, आश्रम, उपाय, सेना के अङ्ग, याम, विष्णु की भुजाएँ, युग, पशु के चरण, इन्द्र के मातङ्ग, उसके दाँत, शास्त्र और दशा आदि। पाँच के बोधक हैं— हास्य रस, स्वर्द्रु (स्वर्ग के वृक्ष), भूत, रुद्र के मुख, पाण्डव, व्रत, अग्नि, इन्द्रिय, वर्ग, अङ्ग, अनिल (प्राण), प्रेत, महायज्ञ, पुराण के लक्षण, पूर्व, महापाप एवं इन्द्रियार्थ। छह होते हैं— चक्रवर्ती, तर्क के अङ्ग, सेनानी-मुख, (कार्तिकेय के मुख), दर्शन, त्रिशिरा के नेत्र, वज्र के कोण, हास्य-भेद, रस, गुण तथा ऋतुएँ।