भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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200 अपराजितपृच्छा सप्त स्वराब्धिगमकपातालार्कतुरङ्गमाः। वारव्रीहिमुनिद्वीपराज्याङ्गत्रिदशालयाः। वैश्वानरशिखामुक्तिनगरीभुवनादयः॥ अष्टौ गीतगणब्रह्माकर्णयोगाङ्गदिग्गजाः। कुलाचलव्याकरणवसुसिद्धिभुजङ्गमाः॥ दिक्कालशरभाङ्घ्रीशमूर्तयो गोखुरादयः। नवाङ्क रसभाखण्डपत्रीज्वरदृशो ग्रहाः॥ उत्कृत्तो रावणशिरोऽङ्कद्राक्षकुलमुद्रणाः। सुधाकुण्डोपवीतीय- गुणव्याघ्रीस्तना निधिः॥ अर्थात्- सात के सूचक हैं- स्वर, समुद्र, गमक, पाताल, सूर्य के अश्व, वार, चावल (व्रीहि), ऋषि, द्वीप, राज्य के अङ्ग (सप्तप्रकृति), देवताओं के आलय, वैश्वानर की शिखाएं, मुक्तियां, नगरी, भुवन आदि। अष्ट की संख्या के ज्ञापक हैं- गीत, गण, ब्रह्मा के कान, योग के अङ्ग, दिग्गज, कुलपर्वत, व्याकरण, वसु, सिद्धियां, भुजङ्ग (महानाग), दिक्, काल, शरभ के पैर (अष्टापद), ईश की मूर्तियाँ (अष्टमूर्ति), गाय के खुर आदि। नवाङ्क वाचक शब्द हैं- रस, भूखण्ड, पत्र, ज्वर, नेत्र, ग्रह, कटे हुए रावण के मस्तक, अङ्कद्वार, कुलमुद्रणा, सुधा-कुण्ड, उपवीती के गुण, व्याघ्री के स्तन तथा निधियाँ। दशानङ्गदशहरस्ताङ्गुलिरावणमस्तकाः। शङ्करश्रुतिदिग्विदेवशीतांशुवाजिनः। कृष्णावतारगिरिजाबाहुदायार्जुनाभिधः॥ एकादश महादेवाः सेनाः कुरुमहीपतेः॥ द्वादशादित्यसंक्रान्तिसारिकोष्ठकराशयः। सेनानीबाहुनयनमासक्षौणीशमण्डलाः॥ अर्थात् - दस की संख्या में हैं- अनङ्ग के दस हाथ, अङ्गुलियां, रावण के मस्तक, शङ्कर के कान, दिशाएँ, विश्वेदेव, चन्द्रमा के घोड़े, कृष्ण के अवतार, गिरिजा की भुजाएं, दाय तथा अर्जुन के नाम। एकादश होते हैं-रुद्र (महादेव) तथा कुरुराज की सेनाएं (ग्यारह अक्षौहिणी)। बारह हैं-आदित्य, उनकी संक्रान्तियाँ, सारियों (गोटियों) के कोष्ठक और राशियाँ, सेनानी (कार्तिकेय) की भुजाएं और नयन, मास तथा राजा के मण्डल। त्रयोद